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तकनीक ने हमें अपना ही नहीं शहर का भविष्य तय करने अवसर भी दिया

तकनीक ने हमें अपना ही नहीं शहर का भविष्य तय करने अवसर भी दिया

रोहिणी नीलेकणी
इस साल मैंने बेंगलुरु से काबिनी (कर्नाटक का एक वन्यजीव अभयारण्य) तक कई यात्राएं की हैं. हर बार जब मैं जंगल और देहात से लौटती हूं तो मेरी आंखें और दूसरी इंद्रियां ताज़गी से भर जाती हैं और मैं अपने गृहनगर को एक नई नजर से देखती हूं. फिलहाल बेंगलुरू एक पीड़ादायक बदलाव से भरा शहर दिखता है. ऊपर देखें तो हर तरफ डरावना कंक्रीट नजर आता है और नीचे मलबे के ढेर. इस धूसर कैनवास में ट्रैफिक से ठसाठस भरी सड़कों, मनमर्जी से काम करते सिग्नलों और पेंचीदा गोल चक्करों से जूझते हुए अपनी मंजिल पर पहुंचने की कोशिश करते असहाय लोग रंग-बिरंगे बिंदुओं जैसे दिखते हैं.
ऐसा लगता है जैसे भारत के कई दूसरे शहरों की तरह बेंगलुरू भी अपने बाशिंदों का इम्तहान ले रहा है. बुनियादी सुविधाओं के मोर्चे पर यहां हो रहे काम किसी ऐसे पोस्टर सरीखे दिखते हैं जिस पर बेहतर भविष्य का वादा लिखा होता है. शहर आपसे सब्र, भरोसा और उम्मीद रखने को कहता है. लेकिन लोग अब थक चुके हैं और उन्हें कुछ भी महसूस होना बंद होता जा रहा है.
अपने घर पहुंचने पर मैं उस जंगल के शहरी संस्करण में दाखिल हो जाती हूं जो मैं पीछे छोड़कर आई थी. मेरे आस-पड़ोस में पेड़ों की घनी हरियाली है. लेकिन पूरे बेंगलुरु में ऐसा नहीं है. बल्कि कभी गार्डन सिटी कहे जाने वाले इस शहर में मेरा इलाका अब अपवाद सरीखा है. बेंगलुरु विविध और विरोधाभासी पहचानों और स्वरूपों का मेल है जिसमें शीर्ष स्तर पर विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग हैं और नीचे बुनियादी अधिकारों से भी वंचित लोग. लेकिन शहर की बदहाली इस भेद को खत्म कर देती है. ट्रैफिक और प्रदूषण जैसी समस्याओं के सामने हमारा सुरक्षित खोल टूट जाता है और एक विकृत समानता पैदा हो जाती है.
लेकिन अब शहर के भविष्य के साथ जुड़ने के नए अवसर भी बन रहे हैं. बल्कि देखा जाए तो देश में हर जगह इस तरह के प्रयास हो रहे हैं जिनमें शहरों की फिर से कल्पना की जा रही है और नागरिकों को इसमें अपना योगदान देने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है. इसका मकसद यह है कि शहर लोगों को अपने से लगें. अब बहस का विषय ठोस तरीके से इस तरफ मुड़ चुका है कि क्या शहरों को मौजूदा स्वरूप में ही विकसित होना चाहिये या फिर इनमें कोई बदलाव होना चाहिए, और इस बदलाव में किसकी भागीदारी होनी चाहिए.
आज प्रौद्योगिकी ने शहरों का स्वरूप तय करने के काम में सामूहिक भागीदारी को संभव बना दिया है. महानगरों और दूसरे इलाकों में भी डिजिटल दौर के नागरिक समाज (सिविल सोसायटी) संगठन तकनीक की मदद से शहरों का भविष्य तय करने में राज्य व्यवस्था के एकाधिकार को चुनौती दे रहे हैं. इन संगठनों की कमान अक्सर सृजनशील युवाओं के हाथ में होती है. अब लगभग हर जगह मौजूद रेजीडेंट वेलफेयर एसोसिएशंस भी अपने शहरों की कमान अपने हाथ में लेने के लिए दृढसंकल्प लगती हैं.
उदाहरण के लिए लॉकडाउन के दौरान युगांतर नाम के एक संगठन ने सूचना के अधिकार के तहत एक आवेदन दाखिल करके यह जानकारी मांगी कि ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कॉरपोरेशन में कुल कितनी झुग्गियां और उनमें कितने लोग रहते हैं. फिर यह जानकारी स्थानीय गैर सरकारी संगठनों के साथ साझा की गई जिससे राहत कार्य और भी सटीक तरीके से संभव हुआ. इसी तरह हैय्या नाम के एक दूसरे संगठन ने ‘हेल्थ ओवर स्टिग्मा’ नाम से एक अभियान चलाया जिसके जरिये खास कर महिलाओं की सुरक्षित यौन और प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच सुनिश्चित करने की कोशिश की गई.
उधर, बेंगलुरु में रीप बेनिफिट नाम की एक संस्था ने शहर की समस्याओं के समाधान में भागीदारी का एक मंच विकसित किया है. सबके लिए खुला यह मंच एक वाट्सएप चैटबोट, वेब एप और सिविक फोरम का मेल है. चैटबोट लोगों को सरल और दिलचस्प तरीके से बताता है कि शहर के प्रशासन से जुड़ी चुनौतियों में अपनी भागीदारी वे कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं. मसलन अगर किसी सड़क पर कोई गड्ढा है तो सिर्फ उसकी फोटो खींचने के बजाय संबंधित विभागों को इसकी रिपोर्ट कैसे की जा सकती है. इस तरह देखें तो तकनीक लोगों के गुस्से और ऊर्जा को सही दिशा में मोड़ने में मदद कर रही है.

सिविस समझता है कि पर्यावरण संबंधी तकनीकी कानून बनाने की प्रक्रिया में कभी-कभी नागरिक समाज को दरकिनार किया जा सकता है जबकि पर्यावरण को हो रहे नुकसान का हम सभी पर गहरा असर पड़ता है. मार्च 2020 में पर्यावरण मंत्रालय ने कई नए नियमों के साथ एक मसौदा अधिसूचना जारी की थी और इस पर लोगों से सुझाव मांगे थे. सिविस ने इन नियमों को सरल भाषा में लोगों के सामने रखा और इसका नतीजा यह हुआ कि कहीं ज्यादा लोग इस प्रक्रिया में सीधे शामिल हो सके.
हमें समाज आधारित ऐसी और कई दूसरी कोशिशों को बढ़ावा देना होगा. इससे भी ज्यादा अहम यह है कि हममें से हर एक को इन कवायदों में हिस्सा लेने का अपना तरीका खोजना पड़ेगा. लोकतंत्र में हमारी भागीदारी सिर्फ एक खेल के दर्शक जितनी नहीं हो सकती. सुशासन सिर्फ भोग की वस्तु नहीं बल्कि सह-निर्माण का उद्यम भी है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कौन हैं, आप किसी सरकारी विभाग के मुखिया हों या फिर कोई सफल कारोबार संभाल रहे हों - आप सबसे पहले एक नागरिक हैं, अपने समुदाय का एक हिस्सा. और मैं मानती हूं कि सिर्फ समाज और उसकी संस्थाएं ही शहरों को सबके रहने लायक बनाने जैसे व्यापक जनहित के कार्यों के प्रति राज्य व्यवस्था को जवाबदेह बना सकती हैं.
सौभाग्य से आज नई तकनीकों की मदद से हम इस काम में पहले के मुकाबले ज्यादा आसानी से, ज्यादा असरकारी भूमिका निभा सकते हैं. मैं ‘क्लिक्टीविज्म’ यानी सोशल मीडिया के जरिये समाज सेवा करने की बात नहीं कर रही हूं, बल्कि कैसे तकनीक से लैस एक सामाजिक तंत्र समस्याओं के हल ढूंढ़ने के काम में लोगों को शामिल कर सकता है. कैसे यह तंत्र नागरिकों की भागीदारी को लोकतांत्रिक बना सकता है और अपने शहर का भविष्य तय करने में उनकी मदद कर सकता है.
यहां पर एक अहम बात का ध्यान रखना जरूरी है. इस डिजिटल दौर में नागरिक समाज को और भी ज्यादा डिजिटल होना होगा. एक सक्रिय डिजिटल समाज ही तकनीक से जुड़े कारोबारी दिग्गजों को ज्यादा जवाबदेह बना सकता है और उन्हें ऐसे साधनों को अपनाने से रोक सकता है जो राजनीतिक और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का स्वरूप बिगाड़ते हैं या व्यक्ति और समुदाय की चेतना का नुकसान करते हैं. शहरी समाज के आंदोलन इस दिशा में बेहद अहम हैं.
मौजूदा महामारी ने हमें इस दिशा में और भी तेजी से सोचने को मजबूर किया है कि शहरों का भविष्य कैसा होना चाहिए. उनमें किसी विपदा से संभलने की सामर्थ्य पैदा करने के लिए नागरिकों के पास सक्रिय भागीदारी के अवसर अब पहले से ज्यादा हैं. युवा नेतृत्वकर्ता सजग नागरिकों को सशक्त बनाने के लिए के लिए नये-नये विकल्प तैयार कर रहे हैं. मकसद यह है कि जब हम जंगल से शहर की तरफ लौटें तो हमें जीवंतता से भरी हलचल महसूस होनी चाहिए, आंखों में जलन और सांस लेने में परेशानी नहीं.

(रोहिनी नीलेकणी अर्घ्यम की चेयरपर्सन हैं.)