breaking news New

तांडव हिंदू विरोधी नहीं बल्कि कुछ जगहों पर प्रो-हिंदू है

तांडव हिंदू विरोधी नहीं बल्कि कुछ जगहों पर प्रो-हिंदू है

शुभम उपाध्याय

आखिरकार ‘तांडव’ में से विवादित सीन हटा लिए गए. एक दिन पहले ही इसके निर्देशक अली अब्बास जफर ने तमाम दबावों के आगे झुकते हुए ऐलान किया था कि जल्द ही ‘तांडव’ में जरूरी बदलाव किए जाएंगे. अगले ही दिन एमेजॉन प्राइम वीडियो ने अपनी इस वेब सीरीज में से ये तथाकथित विवादित दृश्य हटा दिए. 

ये ‘जरूरी बदलाव’ वे थे जिनकी वजह से पिछले कुछ दिनों से कथित रूप से हिंदुओं की भावनाएं आहत हो रही थीं. वेब सीरीज पर हिंदू विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाने का आरोप लग रहा था. साथ ही इसकी सोच को दलित विरोधी भी कहा जा रहा था. सत्ताधारी पार्टी के नेता बढ़-चढ़कर इस सीरीज का विरोध कर रहे थे/हैं और सोशल मीडिया पर ‘बैन ‘तांडव’’ से लेकर ‘माफी नहीं सजा’ जैसे हैशटैग्स लगातार ट्रेंड किए और करवाए जा रहे थे/हैं.

लेकिन, सवाल यह है कि क्या सच में गुणवत्ता के लिहाज से औसत से नीचे की इस वेब सीरीज को हिंदू या दलित विरोधी कहा जा सकता है?

पहले बात करते हैं इसके हिंदू विरोधी होने और भगवान शिव का अपमान कर हिंदुओं की भावनाएं आहत करने वाले आरोपों पर. यह पूरा विवाद सीरीज के पहले एपीसोड के एक-डेढ़ मिनट के सीन पर शुरू हुआ था (जिसे अब हटा लिया गया है).

इस सीन में मोहम्मद जीशान अय्यूब का किरदार शिवा भगवान शिव का वेश धरकर भगवान राम के मुकाबले अपनी गिरती लोकप्रियता पर तंज करता है और नारद मुनि बने एक छात्र के साथ सोशल मीडिया पर अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के प्रयासों पर हास्य-विनोद करता है. इस सीन में भगवान राम के राजनीतिक फायदों के लिए दोहन किए जाने पर भी तंज है और साथ ही ‘देश से आजादी नहीं चाहिए, देश में रहते हुए आजादी चाहिए’ जैसी गहरी राजनीतिक बात भी है. लेकिन अगर आप इन बातों से इत्तेफाक नहीं भी रखते, आपकी राजनीति इन बातों से अलग है, तब भी आप इसमें देवी-देवताओं का वह अपमान ढूंढ़ते ही रह सकते हैं जिसके आरोप तांडव पर लगाये जा रहे हैं. समझ नहीं आता कि इस सीन में मौजूद किस चीज़ से हिंदुओं की भावनाएं आहत हुई हैं? एक्जेक्टली किस चीज से?


मनुष्यों द्वारा भगवान का रूप धरकर हास्य-विनोद करना, या कोई पैनी बात कर जाना हमारी संस्कृति का हमेशा से हिस्सा रहा है. यह एक धर्म के सहिष्णु होने की पहचान है, जो अब बीते समय की बात होती जा रही है. अगर चिंता करनी है तो असली चिंता यह होनी चाहिए. सिर्फ सिनेमा के माध्यम में नहीं, रंगमंच से लेकर नुक्कड़ नाटकों तक में कलाकार भगवान का रूप धरकर जरूरी बातें करते आए हैं और कुछ समय पहले तक किसी को ईश्वर और नाट्य कला के इस संगम से दिक्कत नहीं होती थी. नाट्य कला के सृजन के शुरुआती दिनों से ही यह मान लिया गया था कि भगवान का रूप धरकर कोई मारक बात भी आसानी से आम जनता को समझाई जा सकती है. तो उसी कला का उपयोग कर ‘तांडव’ ने क्या गलत किया है?

हिंदी सिनेमा की सार्वकालिक महान फिल्मों में गिनी जाने वाली ‘शोले’ याद कीजिए. इसके एक दृश्य में हेमा मालिनी के किरदार को प्रभावित करने के लिए नायक धर्मेंद्र भगवान शिव की विशाल मूर्ति के पीछे खड़े होकर शिव की आवाज बनकर अपनी पैरवी हीरोइन से करते हैं. तो क्या हास्य-विनोद में रचे इस दृश्य की वजह से फिल्म को बैन करने और कलाकारों और निर्देशकों को जेल भेजने का उन्मादी माहौल तैयार हुआ कभी?

1983 में आई ‘जाने भी दो यारो’ का वह कालजयी महाभारत वाला सीन भी याद कीजिए, जिसे हिंदी सिनेमा में आइकॉनिक कॉमेडी सीन होने का दर्जा हासिल है. क्या द्रौपदी चीरहरण पर हास्य-विनोद करने वाले उस सीन से किसी भी हिंदू की भावनाएं 1983 से लेकर अब तक आहत हुई हैं?

खूब पसंद की गई अक्षय कुमार और परेश रावल की ‘ओह माय गॉड’ याद कीजिए. इसमें परेश रावल ईश्वर में विश्वास नहीं रखने वाले एक नास्तिक के रोल में हैं जिन्हें ईश्वर में विश्वास दिलवाने के लिए अक्षय कुमार भगवान विष्णु का मॉडर्न अवतार धारण करते हैं. पूरी फिल्म परेश रावल के उन रैशनल सवालों के इर्द-गिर्द घूमती है जो वे हिंदू धर्म से जुड़ी मान्यताओं और कर्म-कांडों को निशाना बनाकर पूछते हैं. क्या किसी ने परेश रावल के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की और अक्षय कुमार पर आरोप लगाए कि सूट-बूट पहनकर, मोटरसाइकिल चलाकर, उंगलियों में छल्ला घुमाकर उन्होंने भगवान विष्णु का अनादर किया है? इस फिल्म के एक सीन में तो भगवान कृष्ण बने अक्षय कुमार कुछ उसी तरह का संवाद बोलते हैं जैसा ‘तांडव’ के विवादित दृश्य में है. अपने नए मॉडर्न रूप पर वे कहते हैं, ‘क्या है न, हमारी लेटेस्ट फोटो अब तक फेसबुक पर अपडेट नहीं की है….’

ऐसे ढेरों उदाहरण आपको साहित्य से लेकर फिल्मों तक में मिलते हैं जिनमें ईश्वर और नाट्य कला को जोड़कर कोई गहरी बात की गई है या किसी खास समय व स्थान को रेखांकित किया गया है. केदारनाथ सिंह के उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ की आत्मा में शिव बसते हैं लेकिन उपन्यास में ढेरों गालियां हैं जो बनारस की ठेठ संस्कृति का आईना है. इसमें मौजूद शिव भक्त से लेकर राम भक्त किरदार तक हर बात की शुरुआत और अंत गालियों से करते हैं.

‘तांडव’ से कुछ महीने पहले ही ‘लूडो’ भी रिलीज हुई थी. उसमें आपको अभिषेक बच्चन और एक छोटी बच्ची वाली कहानी तो याद होगी? उस कहानी के कुछ दृश्यों और एक गाने में भी भगवान शिव और माता काली का रूप धरकर कुछ कलाकार छोटी बच्ची का दिल बहलाने की कोशिश करते हैं. तब भी बतौर हिंदू हमारी-आपकी भावनाएं आहत नहीं हुई थी. फिर ‘तांडव’ ने ऐसा क्या कर दिया कि ऐसा तूफान उठा कि सीरीज के कलाकारों से लेकर लेखक और निर्देशक तक को सोशल मीडिया पर भद्दी-भद्दी गालियां और मां-बहन के बलात्कार तक की धमकियां मिलने लगीं? 

सत्ताधारी पार्टी के कुछ नेताओं के तांडव का विरोध करने के तुरंत बाद सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने एमेजॉन प्राइम वीडियो के अधिकारियों को समन भेजा था. इसके तुरंत बाद सीरीज के निर्देशक अली अब्बास जफर ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को सहयोग करते हुए विवादित दृश्यों को हटाने की हामी भर दी थी. हिंदुस्तानी ओटीटी की दुनिया में दबाव में आकर अपने कंटेंट में बदलाव करने का यह पहला बड़ा मामला है. जानकारों को लगने लगा है कि इसके बाद इस तरह की सेंसरशिप ओटीटी मंचों पर अब बहुतायत में देखने को मिल सकती है. और बहुत जल्द ओटीटी संसार भी थियेटरों में रिलीज होने वाली फिल्मों की तरह सेंसर बोर्ड की जद में आकर कसमसाता हुआ मिलेगा.