breaking news New

मन की बात वीरां सुनते जाना रे - डॉ ममता व्यास

मन की बात वीरां सुनते जाना रे   - डॉ ममता व्यास


हमारी माँ, बरस भर रक्षा बंधन की प्रतीक्षा करती थी और जब राखी का त्यौहार आता तो खूब भावुक हो जाती अपने भाई को याद करके अक्सर ये गीत गाती “ अरे मैं महला वाली रे, अरे मैं पैसा वाली रे ..दो मनरा री बात वीरां सुनता जाजो रे ..मतलब मेरे भइया मैं बहुत पैसे वाली हूँ | बहुत बड़े महल में रहती हूँ मेरे पास किसी चीज की कोई कमी नहीं है , तुमसे कुछ नहीं चाहिए लेकिन मैं अपने मन की बात किसे सुनाऊं ? तू मेरी मन की बात सुनता जा .... ये है असली भाव , इस पवित्र त्यौहार का |

 

सावन के आते ही मन गहरे प्रेम से भर जाता है | मानो प्रकृति के साथ हम सबका मन भी हरा हो जाता है | इस धरती पर भला ऐसा कौनसा देश होगा जिसमें रुत, मौसम, महीनों को त्यौहारों के माध्यम से याद किया जाता हो|और इन त्यौहारों को रिश्तों के धागों से बाँधा जाता हो |

सिर्फ हमारे देश में हर त्यौहार किसी न किसी रिश्ते को गहरा करता है | हर पूजा, अर्चना चाहे वो होलीका दहन हो, दीपावली का त्यौहार, करवा चौथ हो या रक्षा बंधन हो | ये सब त्यौहार कहीं न कहीं हमारे परिवार के सदस्यों को आपस में जोड़े रखते हैं | करवा चौथ जहाँ पतिपत्नी के रिश्ते को गहरा करता है, तो रक्षा बंधन भाई बहन के रिश्ते को गहरा करता है | हमारे सभी त्यौहार, परम्पराओं संस्कारों से बुने हुए हैं इसलिए हर त्यौहार एक संदेश लेकर आता है

हम सभी के जीवन में त्यौहारों का बहुत महत्व है, हम सभी खुश होना, खुश रहना चाहते हैं | त्यौहारों के बिना जीवन नीरस और बेरंग हो जाता है | जीवन में त्यौहारों से रौनक है,उमंग है, तरंग है उल्लास है और आनन्द है | वैसे तो हम वर्ष भर ही किसी न किसी बहाने कोई न कोई त्यौहार मना ही लेते हैं लेकिन हमारे देश में सावन के महीने का विशेष महत्व है |

सावन में आने वाले सभी त्यौहार बरस भर की कठोरता को कोमलता में बदल देते है | सूखे को हरियाली में बदल देते हैं |

 

इस पूरे महीने कई छोटे बड़े त्यौहार आते हैं, लेकिन पूर्णिमा के दिन आने वाला रक्षा बंधन के त्यौहार का अपना विशेष महत्व है |

यही वजह है कि इस दिन हर बेटी अपने मायके जाने को आतुर दिखती हैं | जिन भाइयों ने साल भर से अपनी बहनों को नहीं देखा वे भी सावन में संदेश भेजते है या बहनों को खुद लेने जाते हैं |

त्यौहार का मतलब सिर्फ अच्छे -अच्छे पकवान बनाकर खाना या मंहगे कपडे पहनकर फोटो खिंचवा कर सोशल मीडिया पे पोस्ट करना नहीं होता |

इससे कहीं ज्यादा जरुरी है हम इस पवित्र त्यौहार के माध्यम से भाई /बहनों को याद करें | उन्हें अहसास कराये कि वे हमारी जिन्दगी में कितने ख़ास है |


उनसे कुछ मन की बातें की जाये |कुछ उनके मन की सुन ली जाये | यही तो महत्त्व है रिश्तों का, मेल जोल का और त्यौहारों का |

..... हमारी माँ, बरस भर रक्षा बंधन की प्रतीक्षा करती थी और जब राखी का त्यौहार आता तो खूब भावुक हो जाती अपने भाई को याद करके अक्सर ये गीत गाती “ अरे मैं महला वाली रे, अरे मैं पैसा वाली रे ..दो मनरा री बात वीरां सुनता जाजो रे ..मतलब मेरे भइया मैं बहुत पैसे वाली हूँ | बहुत बड़े महल में रहती हूँ मेरे पास किसी चीज की कोई कमी नहीं है , तुमसे कुछ नहीं चाहिए लेकिन मैं अपने मन की बात किसे सुनाऊं ? तू मेरी मन की बात सुनता जा .... ये है असली भाव , इस पवित्र त्यौहार का |

कितना दर्द कितनी मिठास कितनी गहराई है, कितनी प्यारी मनुहार है सावन के गीतों में , अबके बरस भेज भैया को बाबुल, सावन में लीजो बुलाय ....इस गीत को सुनकर हर भारतीय स्त्री की रुलाई फूट पड़ती है | पूरे बरस इस सावन के महीने का इंतजार किया जाता है, साड़ियाँ, गहने सँजोये जाते हैं और अपने सुख दुख की गठरियाँ बांध कर बेटियाँ अपने पिता से मनुहार करतीहैं कि भैया को भेज कर उसे ससुराल से लिवा ले जाओ |

बेशक हम आज बहुत बड़े हवेलीनुमा घर में रह रहे हों हमारे पास बहुत बड़ी गाडी हो | सोशल मीडीया में हमारे हजारों दोस्त हों लेकिन मन की बात कहने के लिए आज भी हमारा मन, भाई या बहन को ही ढूंढ़ता है | राखी का त्यौहार इस लिए भी खास माना जाता है कि इस दिन बहने अपने भाई कि कलाई पर रेशम की डोरी से बांध देती हैं ये डोरी नाजुक जरूर होती है लेकिन इस डोरी से बंधकर भाई जीवन भर अपनी बहन का साथ देने का वचन देता है |


भाई –बहन का रिश्ता ऐसा रिश्ता है जिसमें मन से मन की बात होती है | एक ऐसा रिश्ता जो बिन कहे हमारी बात समझ ले, जो हमारी रूचि, पसंद नापसंद को जानता हो, जिसे हम सुख दुःख में याद कर सकें जिसे हमारी सच्ची परवाह हो | ऐसे भाई /बहन, जो मित्र जैसे होते हों , जिससे अपना दुःख –सुख साझा किये जाये |

यही मिठास है , यही सुंदरता है और यही महत्व है रक्षा बंधन का |

जिन्दगी की चुभन और तपन से निकल कर रिश्तों की बारिश में कुछ हरा हुआ जाये | थोडा सा नम हुआ जाये | इस रक्षाबंधन क्यों ना अपने रिश्तों को फिर से ताजा किया जाए |

त्यौहारों के बहाने ही तो हम खुद का मन टटोलते हैं , खुद को तौलते हैं कि भीतर कितनी नमी बची है शेष, कितना खत्म हुए हम, कितने जीवित है |

ये त्यौहार, ये रिश्ते ही हमारा जीवन हैं | सूख गए, रूठ गए , खुरदरे हो गए रिश्तों को फिर से प्रेम और आत्मीयता के लेप से कोमल किया जाए | थोड़ी सी तुरपाई की जाए | थोड़ा सा हरा हुआ जाये | थोड़ा सा सावन -सावन हुआ जाये | रिश्तें कहीं नहीं जाते बस उन पर जिन्दगी अपनी धूल चढ़ा देती है | सावन की बौछारे धूल हटाने के लिए ही आती है | चलिए कुछ हरियाली बोते है | कुछ सावन से सीखते हैं कुछ टूटे पुल जोड़ते हैं | किसी को अपना बना लेते है किसी को अपना कहते हैं . किसी सूखी डाली को हरा करते हैं |

इस भागमभाग भरी जिन्दगी में दौड़ते भागते हम कितना थक चुके हैं | बहुत पैसा कमाया , बहुत नाम कमाया | बदले में बहुत दुःख , संताप , पीड़ा ही पायी | बड़े बड़े मकानों में हम कितने अकेले हो गए | हमने हंसना छोड़ दिया, हमें तो याद ही नहीं हमने अपने मन में कितनी गांठे बांध ली है | चलिए इस रक्षाबंधन पर पुरानी बातों को भुला कर कुछ नया जोड़ा जाए |

 

(लेखिका मनोविश्लेषक एवं साहित्यकार है)