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स्मृतिशेषः नहीं रहे मोर भाखा संग दया-मया के अप्रतिम गीतकार मुकुंद कौशल

स्मृतिशेषः नहीं रहे मोर भाखा संग दया-मया के अप्रतिम गीतकार मुकुंद कौशल

 डुमन लाल ध्रुव

साहित्य संगीत सांस्कृतिक मंच मुजगहन धमतरी द्वारा वर्ष 2005 में मरहूम गीतकार, गजल गो मुकीम भारती अलंकरण से सम्मानित, आकाशवाणी-दूरदर्शन के एप्रूव्हड गीतकार एवं अपने साहित्यिक जीवन का 40 वर्षों से लगभग ढाई से अधिक कवि सम्मेलनों में शिरकत करने वाले तथा कवि सम्मेलनों में हास्य-व्यंग्य के तथा वीररस के ओजस्वी कवि एवं कुशल मंच संचालक के रूप में समादृत छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध कवि, गीतकार, गजलकार मुकुंद कौशल जी अब हमारे बीच नहीं रहे। उनकी रिक्तता से साहित्य जगत को बड़ी क्षति हुई है। 

संस्कार हे छत्तीसगढ़ के, ये बिन बोले बानी हे।

गोदना के टिपकी-बुंदिया मा कतको अकन कहानी हे।।

किसिम-किसिम के चित्रकला अऊ बुंदियन के फुलवारी हे। 

गोदना हावय तन के गहना, जिनगी के संगवारी हे।।

स्वातंन्न्यवीर सोनी जेठालाल जी के सुपुत्र के रूप में 07 नवम्बर 1947 को दुर्ग में जन्में कवि, गीतकार श्री मुकुंद कौशल जी हमारे समय के साहित्यिक जगत के एक ऐसे रचनाकार हैं, जिनकी युग दृष्टि बहुत पैनी और पारदर्शी है। इसके साथ ही वे साहित्य के उस केन्द्र बिंदु पर अधिष्ठित हैं, जहां कविता के नाम पर उसके अनेक मुक्त छंदरस रूप, आधुनिक और अत्याधुनिक, वैचारिक, आख्यान और ओढ़े हुए अनेक चोले अपनी चकाचैंध में सहज, सहृदय और संवेदनशील पाठक को लुभाते से प्रतीत होते हैं। छत्तीसगढ़ के महाविद्यालयों में बी.ए. के पाठ्यक्रमों में उनकी कविताएं सम्मिलित हैं तथा महाविद्यालयीन अनेक छात्र-छात्राओं ने कृतियों पर एम.फिल. किये हैं।

वैसे मुकुंद कौशल जी का रचना संसार बहुत वृहद है। उनके स्वयं के हिन्दी काव्य संग्रह ’’लालटेन जलने दो, शब्द क्रांति, चिराग गजलों के, गीतों का चंदनवन, देश हमारा भारत’’ और छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह ’’भिनसार, छत्तीसगढ़ी गजल, हमर मया हमर अगास, मया के मुंदरी’’ प्रकाशित और राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुई है। 

तैं हा आ जाबे मैना,

उड़त-उड़त तैं हा आ जाबे।

एक सार्थक रचना अपने समय से साक्षात्कार करती हुई उससे टकराने और मुठभेड़ करने का माद्दा भी रखती है। वह जमीनी हकीकत का सामना करते हुए परिवेशगत सच्चाइयों का समूचा परिदृश्य प्रस्तुत करती हुई और बेहतर जीवन जीने की तलाश का उपक्रम बन जाती है। 

साहित्य की कोई भी विधा सामाजिक दायित्व से किनाराकशी नहीं कर सकती और न बदलते युग के तेवरों को अनदेखा कर सकती है। वह बदलते समय की नई प्रचलित शब्दावली को भी अनसुना नहीं कर सकती। हमें इस सत्य को स्वीकारना होगा कि कला जीवन के लिए है। जीवन की विकासशील धारा में मनुष्य के आत्यांतिक कल्याण को ओझल नहीं किया जा सकता। 

मुकुंद कौशल जी अपनी बहुआयामी गीत-यात्रा में मानव हित, नैतिक मूल्य, अन्वेषण तथा ज्ञात से अज्ञात को जानने की कोशिश को सर्वोपरि मानते हैं रचनाकार का निर्विकार मन स्वतः ही संवेदनाओं की गहराई के साथ मानवता से जुड़ जाती है। मुकुंद कौशल के गीतों का भाव यही है- 

बांसुरी के तान सहीं, मने मन मा घुमरत रथे।

सबो कती दसमत के, फूल साहीं लहकत रथे।

झन कहा कुछू, ओंठ ले भलुन

आंखी सबो कहि देथे

तोर आंखी हा मोर जिया के 

काबर आरो लेथे 

चारों कति बरत-जरत घाम रे

ये निरमोही तोला देखि जीउ हर जुड़ाए।

मुकुंद कौशल के गीतों में हमेशा छत्तीसगढ़ के स्वाभिमान के प्रति एक ही विचार, भाव या घटनाक्रम की अन्विति का शुरू से अंत तक निर्वाह किया जाता है। मुकुंद कौशल अपनी अनुभूति जन्य वैचारिकता या विचारजन्य अनुभूति से यहां वहां नहीं भटक पाये। बल्कि अपनी गीतों की लोकप्रियता से समग्रता में प्रभावहीन बन जाते हैं। मशीनीकरण की युग में भी वे अपनी प्रकृतिजन्य संवेदना और विचारजन्य संवेदना को छोड़कर व्यवसायी संवेदना के शिकार नहीं हुए। 

मन मा चिरइया बोले, आंखी सुगना अस डोले।

जिउ मोर होवत हे उछाह

कब तैंह आबे राजा, अंगना मा बाजही बाजा

नैना मा लगे हे तोरे चाह

तोला आंखाी मा बसायेंव मैं ह जे दिन ले-

लागत हवै मोला सरी दिन ह तिहार।   ग् ग्  ग्

तोर सपना ला जोही आंखी मा लुकावौं

मन होथे मैना साही उड़ि के मैं आवौं

झरि-झरि आंसू मोरे चरन पखारे।

मोरे पतरेंगा मोला, काबर बिसारे।। 

मुकुंद कौशल के पास पैनी अभिव्यक्ति है। शब्द और अर्थ सहचर है। अबूझ को सहज बनाते हैं। पैनी अभिव्यिक्ति के लिए छत्तीसगढ़ी के सार्थक शब्दों का प्रयोग मितव्ययता से प्रयोग किये हैं। भारी भरकम शरीर और मधुर कंठ के धनि मुकुंद कौशल के पास अनुभवजन्य ईमानदारी है। संभवतः इसीलिए वह जीवन और स्थितियों की लय तोड़ने में विश्वास नहीं रखते हैं। अनचाही स्थितियों को आत्मसात करने के बावजूद उसका फूल सा मन त्रासदी के संस्मरण ढोता रहता है। संध्या से प्रातः पाने को गीतों पर प्राण चढ़ाता है। कुल मिलाकर बौद्धिकता और आक्रमकता से दूर पिराई जाती ईख का गुनगुना मीठा रस मुकुंद कौशल के गीतों की शक्ति है  - 

तोर रूप जस चंदा, सुग्घर दरपन मोर

मोर जिया मा तोर दिया के हवै अंजोर

हमर जलइया कतको अपन लगावैं जोर

ये परेम के डोरी ला झन देबे टोर

तोर मया ला, बांधेंव मैं अंचरा के छोर

लोक -लय मन को संस्कारित कर मनोभावों को पवित्र करती है। इसलिए कवि मुकंुद कौशल छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का समर्थक है। उनका विचार है कि ’’ आंचलिक भाषा शैली में छत्तीसगढ़ के लोकगीत अधिक संप्रेषणीय और अधिक स्पष्ट हुआ है। लोकगीत सांस्कृतिक-धार्मिक परम्पराओं के विशेष स्थलों पर गाये जाते रहे हैं। किंतु मानव सभ्यता के विकास के साथ -साथ इसके रूप भी बदले हैं। तब आज की तरह सामाजिक-राजनीतिक मूल्यांकन की बात न थी। और न ही आवश्यकता, आज प्रकारांतर से छत्तीसगढ़ के लोकगीत में सामयिक संदर्भ जुड़ने लगे हैं। छत्तीसगढ़ की लोकगीतों की परम्परा को जीवित रखने के लिए लोकगीत लिखे जाने चाहिए लेकिन रचनाकार को साहित्यिक मूल्यांकन की अपेक्षाओं के व्यामोह से दूर ही रहना चाहिए। 

मुकुंद कौशल ने अपनी बात को अभिव्यक्ति देने के लिए जनजीवन से पात्रों का चयन करते हैं और अपने पात्र भी गढ़ते हैं। 

बिन सुरूज के जग अंधियारी, बिन परेम के दुनिया।

बिना बजाए मया-पिरित के, नई बाजय हरमुनिया।।

आज संग नइ गा पाएन तौ अउ कब गाबोन वो।

छिन भर कहुंचो बइठ के सुख-दुख ला गोठियाबोन वो।।

छत्तीसगढ़ के सच्चे एवं निष्ठावान गीतधर्मी कवि मुकुंद कौशल जी की पावन स्मृति का शत्-शत् नमन। ’’मोर भाखा संग दया-मया के सुघ्घर हावय मिलाप रे, अइसन छत्तीसगढ़िया भाखा कोनो दया संग नाप रे’’ सदैव याद आते रहेंगे।

(प्रचार-प्रसार अधिकारी, जिला पंचायत-धमतरी)