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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- छुट्टियां जो आपको डरा सकती हैं

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- छुट्टियां जो आपको डरा सकती हैं

 
काम से छुट्टी मिले, स्कूल से छुट्टी मिले तो किसे अच्छा नहीं लगेगा। आराम हराम है नारे के बावजूद सरकारी क्षेत्र में आराम की बड़ी महत्ता है। सरकारी महकमे के जो लोग निर्धारित काम के घंटों में भी काम नहीं करके यहां वहां मटरगश्ती करते हैं, वे जब किसी से मजदूरी करवाते हैं, काम करवाते हैं तो पूरे समय काम की उम्मीद करते हैं। मनरेगा जैसी योजना में भी काम के बदले भुगतान के दौरान बहुत से लोगों की कोशिश यही रहती है कि काम में अधिक भुगतान हो जाए।

किसान, गृहिणी और दैनिक मजदूरी कर कमाने-खाने वाले लोगों के हिस्से में छुट्टी का सुख वैसा नहीं होता जैसा संगठित और सरकारी क्षेत्र में काम करना वालों के हिस्से में होता है। ऐसे में उन लोगों की चांदी हो जाती है तो काम के मूल्यांकन कार्य में लगे रहते हैं। हमारे देश में बहुत से कामों में विलंब या भ्रष्टाचार इसलिए भी होता है कि इसका निरीक्षण, मानिटरिंग करने वाले ज्यादा हो गए हैं। अब हो सकता है कि आने वाले दिनों में कुछ लोगों को ज्यादा छुट्टियां डराने न लगे।
 
निदा फाजली साहब का एक शेर है-
सारे दिन भगवान के क्या जुम्मा क्या पीर
जिस दिन सोये देर तक भूखा रहे फकीर

केन्द्र सरकार आने वाले दिनों में तीन दिन की छुट्टी और चार दिन काम के लिए नया श्रम कानून लाने जा रही है। लोगों की अगले साल सैलरी जरूर बढ़ेगी लेकिन सैलरी में बढ़ोतरी के साथ ही केंद्र सरकार के इस फैसले से आपकी टेक होम सैलरी पर कैंची चलने वाली है। ऐसे में उन लोगों की सैलरी अभी के मुकाबले और घट जाएगी, जिनकी सैलरी में अगले साल बढ़ोतरी नहीं हो पाएगी। केंद्र सरकार चारों श्रम कानूनों को लागू करने जा रही है जो  अगले वित्त वर्ष तक इसे लागू होने की संभावना है। इस कानून को लागू होते ही आपके टेक होम सैलरी और पीएफ स्ट्रक्चर में बदलाव हो जाएगा जिससे टेक होम सैलरी घट जाएगी, जबकि भविष्य निधि यानी पीएफ में बढ़ोतरी हो जाएगी। इस कानून के लिए भी 13 राज्यों में मसौदा तैयार भी हो चुका है।

मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक संबंध और व्यवसाय सुरक्षा तथा स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति पर चार श्रम संहिताओं को अगले वित्त वर्ष तक लागू किए जाने की संभावना है। केंद्र ने इन संहिताओं के तहत नियमों को अंतिम रूप दे दिया है और अब राज्यों को अपनी ओर से नियम बनाने हैं, क्योंकि श्रम समवर्ती सूची का विषय है। केन्द्र ने फरवरी 2021 में इन संहिताओं के मसौदा नियमों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया पूरी कर ली थी, राज्य भी इसे एक साथ लागू करें। इस नये कानून से कर्मचारियों के मूल वेतन (बेसिक) और भविष्य निधि की गणना के तरीके में उल्लेेखनीय बदलाव आएगा। नई वेतन संहिता के तहत भत्तों को 50 फीसदी पर सीमित रखा जाएगा। इसका मतलब है कि कर्मचारियों के कुल वेतन का 50 फीसदी मूल वेतन होगा। भविष्यनिधि की गणना मूल वेतन के फीसदी के आधार पर की जाती है, इसमें मूल वेतन और महंगाई भत्ता शामिल रहता है। इस कानून के लागू हो जाने से पीएफ की हिस्सेदारी में बढ़ोत्तरी होगी। नई वेतन संहिता में भविष्य निधि योगदान कुल वेतन के 50 प्रतिशत के हिसाब से तय किया जाएगा। पीएफ में कर्मचारियों का योगदान बढऩे से कंपनियों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा। इसके साथ ही ज्यादा बेसिक सैलरी का मतलब है कि ग्रैच्युटी की रकम भी अब पहले से ज्यादा होगी और ये पहले के मुकाबले एक से डेढ़ गुना ज्यादा हो सकती है।
वहीं केंद्रीय श्रम मंत्री भूपेंद्र यादव ने राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति पर श्रम संहिता के मसौदा नियमों को कम से कम 13 राज्य तैयार कर चुके हैं। इसके अलावा 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने मजदूरी पर श्रम संहिता के मसौदा नियमों को तैयार किया है। औद्योगिक संबंध संहिता के मसौदा नियमों को 20 राज्यों ने और सामाजिक सुरक्षा संहिता के मसौदा नियमों को 18 राज्यों ने तैयार कर लिया है।

किसी कर्मचारी की Cost To Company में तीन से चार कंपोनेंट होते हैं। बेसिक सैलरी, हाउस रेंट अलाउंस, रिटायरमेंट बेनेफिट्स जैसे, ग्रेच्युटी और पेंशन और टैक्स बचाने वाले भत्ते जैसे- एलटीए और एंटरटेनमेंट अलाउंस। अब नए वेज कोड में ये तय हुआ है कि भत्ते कुल सैलरी से किसी भी कीमत पर 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकते। ऐसे में अगर किसी कर्मचारी की सैलरी 40,000 रुपये महीना है तो उसकी बेसिक सैलरी 20,000 रुपये होनी चाहिए और बाकी के 20,000 रुपये में उसके भत्ते आने चाहिए। नए वेज कोड में कई ऐसे प्रावधान दिए गए हैं, जिससे ऑफिस में काम करने वाले सैलरीड क्लास, मिलों और फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों तक पर असर पड़ेगा। कर्मचारियों की सैलरी से लेकर उनकी छुट्टियां और काम के घंटे भी बदल जाएंगे। नए वेज कोड के तहत काम के घंटे बढ़कर 12 हो जाएंगे। श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने बताया कि प्रस्तावित लेबर कोड में कहा गया है कि हफ्ते में 48 घंटे कामकाज का नियम ही लागू रहेगा। इस प्रावधान को लेकर कुछ यूनियन ने 12 घंटे काम और 3 दिन की छुट्टी के नियम पर सवाल उठाए थे। सरकार ने इस पर अपनी सफाई में कहा कि हफ्ते में 48 घंटे काम का ही नियम रहेगा, अगर कोई दिन में 8 घंटे काम करता है तो उसे हफ्ते में 6 दिन काम करना होगा और एक दिन की छुट्टी मिलेगी।

ये तो बात हुई उनकी जो कामकाज के लिए घर से पीहर जाते हैं और कुछ घंटे काम करके वापस लौट आते हैं जिन्हें सैलरी, मजदूरी मिलती है, किंतु हमारे देश की घरेलू औरतें जो घर में रहकर घर के सारे काम निपटाती हैं, ना तो उनके काम के घंटों का कोई हिसाब होता है ना ही उन्हें कामकाजी मानकर उनके काम का मूल्यांकन ही होता है। उन्हें अपने घरेलू काम के बदले किसी तरह का मानदेय, मजदूरी सैलरी भी नहीं मिलती। ऐसी खांटी घरेलू औरतों को लेकर सुप्रसिद्घ लेखिका और कवियित्री ममता कालिया की कविता है-

कभी कोई ऊंची बात नहीं सोचती
खांटी घरेलू औरत
उसका दिन कतर-ब्योंत में बीत जाता है
और रात उधेड़बुन में
बची दाल के मैं पराठे बना लूं
खट्टे दही की कढ़ी
मुनिया की मैक्सी को ढूंढूं
कहां है साड़ी सितारों-जड़ी
सोनू दुलरुआ अभी रो के सोया
उसको दिलानी है पुस्तक
कहां तक तगादे करूं इनसे
छोड़ो चलो आज तोडूं ये गुल्लक...


जो औरतें कामकाज के लिए आफिस, स्कूल जाती हैं उन्हें हम नौकरी पेशा मानकर उनके काम का उल्लेख करते हैं किंतु जो औरतें एक गृहिणी हाऊस वाइफ के रुप में रोज 16-17 घंटे काम करती है जिन्हें हफ़्ते में किसी दिन छुट्टी नहीं मिलती, कोई सैलरी नहीं मिलती और इनके काम का मूल्यांकन भी नहीं होता उल्टे उनसे कई बार कहा जाता है कि तुम काम क्या करती हो?  

कर्नाटक हाइकोर्ट ने पिछले दिनों एक एक मामले में जो फैसला सुनाया, उसने इस विषय पर नई बहस को जन्म दिया है। एक दंपति के बीच तलाक़ का मामला चल रहा था और पत्नी को अदालत में पेश होने के लिए मुजफ़्फ़ऱनगर से बैंगलुरु आना था। वो फ़्लाइट से आना चाहती थी लेकिन पति चाहता था कि वो ट्रेन से आए क्योंकि वो हाउस वाइफ़ हैं और उसके पास बहुत खाली वक्त है। हालांकि जस्टिस राघवेंद्र एस. चौहान पति की दलील से सहमत नहीं हुए और उन्होंने कहा कि एक हाउस वाइफ़ भी उतनी ही व्यस्त होती है जितना बाहर जाकर नौकरी करने वाला कोई शख्स।  

ब्रिटन में ऑफि़स फ़ॉर नेशनल स्टैटिस्टिक्स की रिपोर्ट (2014) के मुताबिक़ अगर सिफऱ् घरों में लॉन्ड्री (कपड़े धोने और उनके रखरखाव) को गिना जाए तो इसकी क़ीमत 97 अरब से ज़्यादा होगी यानी ब्रिटेन की जीडीपी का 5.9 प्रतिशत। कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि गृहिणियों को उनके काम के पैसे भले न मिलते हों लेकिन इन्हें आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा माना जाना चाहिए।

विदेश की तरह हमारे देश में भी वीक एंड पर मौज-मस्ती, क्लबिंग, घूमने-फिरने का चलन बढ़ा है। खास करके वे लोग जो सोमवरा से शुक्रवार तक 5 दिन लगकर काम करते हैं फिर शुक्रवार की शाम से रविवार की सुबह तक मौज मस्ती और उसके बाद अगले वर्किंग डे की तैयारी। केन्द्रीय सेवा मेंं काम करने वालों के लिए साल भर में 52, शनिवार, रविवार के अलावा कुछ और सार्वजनिक अवकाश होते हैं। वहीं बहुत से राज्यों में सेकेंड और थर्ड सटरडे के साथ संडे का अवकाश रहता है। राज्य सरकारें अपने राज्य के विशेष तीज-त्यौहार, महापुरुष जयंती, मेले आदि को लेकर भी उदारता से अवकाश देते हैं। यदि हम छत्तीसगढ़ की बात करें तो सामान्य और सार्वजनिक अवकाश मिलाकर करीब 98 छुट्टियां मिली। साल 2021 में जिसमें 52 रविवार और सेकंड थर्ड शनिवार की छुट्टियों को मिलाकर कर्मचारियों के लिए कुल 76 सामान्य अवकाश हैं।