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छत्तीसगढ़ एक खोज, 29वीं कड़ी: जगन्नाथ प्रसाद 'भानु’- रमेश अनुपम

छत्तीसगढ़ एक खोज, 29वीं कड़ी: जगन्नाथ प्रसाद 'भानु’- रमेश अनुपम


यह हम सबके लिए एक दुर्लभ संयोग है कि 8 अगस्त को छत्तीसगढ़ के महान सपूत जगन्नाथ प्रसाद ' भानु ’ जी की 162 वीं जयंती है। उनकी जयंती के अवसर पर छत्तीसगढ़ राज्य उनका पुण्य स्मरण करते हुए उनकी स्मृति को सादर नमन करता है.

" छंद प्रभाकर " और " काव्य प्रभाकर " जगन्नाथ प्रसाद ' भानु’ की दो अमूल्य कृतियां हैं। " छंद प्रभाकर " की रचना उन्होंने सन 1894 में की थी और " काव्य प्रभाकर " की रचना सन 1905 में।

" छंद प्रभाकर " में भानु जी ने छंदों के प्रमुख प्रकार और लक्षण पर विस्तारपूर्वक कार्य किया है। हिंदी के अनेक विद्वान आचार्यों का मानना है कि छंद शास्त्र पर इसकी बराबरी का अन्य कोई ग्रंथ हिंदी में उपलब्ध नहीं है। जगन्नाथ प्रसाद ' भानु ’ के इस ग्रंथ को हिंदी साहित्य में अपार ख्याति मिली। इस ग्रंथ के दस संस्करण निकले थे। उस जमाने में किसी ग्रंथ का दस संस्करण निकलना कोई साधारण घटना नहीं है।

" काव्य प्रभाकर " को जगन्नाथ प्रसाद ' भानु ’ का एक विलक्षण ग्रंथ माना जाता है। यह 800 पृष्ठों का एक वृहद काव्यग्रंथ है। इस ग्रंथ का प्रकाशन सन 1905 में वेंकटेश्वर प्रेस बम्बई द्वारा किया गया था। बाद में इसका प्रकाशन काशी नागरी प्रचारिणी सभा बनारस द्वारा भी किया गया।

संग्रह

" काव्य प्रभाकर ” को जगन्नाथ प्रसाद ' भानु ’ ने बारह मयूखों में विभक्त किया है, जो इस प्रकार है:

1. छंद वर्णन 2.ध्वनि भेद 

3. विभाव 4.उद्दीपन विभाव

5. अनुभाव 6. संचारी भाव

7. स्थायी भाव 8. रसवर्णन

9. अलंकार 10. काव्यदीप

11. काव्यनिर्णय 12. लोकोक्ति संग्रह।

जगन्नाथ प्रसाद ' भानु ' ने तुलसीदास के जीवन पर आधारित अपने ग्रंथ " तुलसीतत्व प्रकाश " में तुलसीदास की संक्षिप्त जीवनी के साथ ही मानस के सातों कांडों का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया है। यह लगभग दो सौ पृष्ठों का एक दुर्लभ ग्रंथ है, जो सन 1931 में जगन्नाथ प्रेस बिलासपुर से प्रकाशित हुआ था।


तुलसी पर ही केंद्रित " तुलसीभाव प्रकाश " उनकी दूसरी प्रसिद्ध पुस्तक है। जिसमें प्रश्न उत्तर शैली में " रामचरित मानस " संबंधी अनेक शंकाओं का समाधान प्रस्तुत किया गया है। 

बिलासपुर की उर्वर भूमि और अरपा नदी की अथाह जल राशि को अलविदा कहकर 25 अक्टूबर सन 1945 को भानु सदा-सदा के लिए नील गगन में अस्त हो गए। एक उल्का पिंड सुदूर अंतरिक्ष में कहीं विलीन हो गया ।

जगन्नाथ प्रसाद ' भानु ' छत्तीसगढ़ के महान सपूत थे। संपूर्ण हिंदी साहित्य को ' भानु ' ने अपने ग्रंथों के प्रकाश से आलोकित कर दिया था। उन्होंने ' छंद प्रभाकर ' और ' काव्य प्रभाकर ' जैसे बहुमूल्य ग्रंथ लिखकर संपूर्ण देश में हमारे छत्तीसगढ़ का मान बढ़ाया था।


हिंदी साहित्य और छत्तीसगढ़ राज्य उनके बहुमूल्य योगदान को कभी भुला नहीं सकेगा। छत्तीसगढ़ राज्य को अपने इस महान सपूत पर हमेशा गर्व रहेगा। 


जगन्नाथ प्रसाद ' भानु ’ जो उर्दू में " फैज ” उपनाम से नज्म लिखते थे, उनके द्वारा सन 1911 में लिखित उर्दू संग्रह " गुलजारे सुखन ", जिसका दुर्भाग्य से अब तक हिंदी तर्जुमा नहीं हो सका है। मेरी गुजारिश पर बिलासपुर के ही उर्दू प्रोफेसर मरहूम डॉक्टर मोहम्मद खालिद अली इकबाल ने उनकी कुछ रचनाओं का हिंदी तर्जुमा कर मुझे उपलब्ध करवाया था। उसमें से एक गजल यहां प्रस्तुत है :


" न मिलने के साहब बहाने बहुत हैं 

जो मिलने पे आओ ठिकाने बहुत हैं।


बहार आई फूलों से शाखें लदी हैं बहुत बुलबुलें-आशियाने बहुत हैं।


वह तीर व कमां घर से लेकर तो निकलें 

बहुत सर व कफ हैं निशाने बहुत हैं। 


वह सुनकर मेरा किस्सा-ए-दिल यह बोले 

उठा जिंदगी से न तू हाथ ऐ दिल अभी जुल्म उनके उठाने बहुत हैं। 


दिल व चश्म-ए-आशिक में घर है तुम्हारा 

जिगर व दिल हैं मुश्ताक नजरें मिलाएं 

कहा दर्द-ए-दिल मैंने तो हंसके बोले 

सुने हमने ऐसे फसाने बहुत हैं।

 दर-ए-“फैज" अगर फैज है बन्द उनका 

तो उठो चलो आस्ताने बहुत हैं। " 


अगले रविवार रतनपुर के रत्न साहित्यकार बाबू रेवाराम...