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सिर्फ कागजों पर आबंटित जमीन : बस्तर में उद्योग विभाग व प्रशासन की लापरवाही का खामियाजा बस्तर के निजी भू स्वामी क्यों भुगते -मुक्तिमोर्चा

सिर्फ कागजों पर आबंटित जमीन : बस्तर में उद्योग विभाग व प्रशासन की लापरवाही का खामियाजा बस्तर के निजी भू स्वामी क्यों भुगते -मुक्तिमोर्चा

सरकार के सयन्त्र लगाने के सभी वादे व अनुबंध हवा -हवाई ,राहुल गांधी व प्रधानमंत्री के हाथों हुए ,अलग -अलग संयंत्र शिलान्यास ,जमीन पर गायब-मुक्तिमोर्चा

जगदलपुर। बस्तर में उद्योगों को बढ़ावा देने की बात करने वाले केंद्र व राज्य सरकार द्वारा किये गए घोषणा व शिलान्यास व योजनाओं के क्रियान्वयन की नीतियों को बस्तर अधिकार मुक्तिमोर्चा के संयोजक नवनीत चाँद ने आड़े हाथ लेते हुए बयान जारी कर कहा कि बस्तर में उद्योगों को लगवाने व उनके संचालन की बाते सरकार के चुनावी व राजनीतिक भाषण का हिस्सा है। क्योंकि बस्तर के जमीनी धरातल में सरकार की कथनी व करनी में बड़ा फर्क दिख रहा है। बस्तर में संचालित उद्योग विभाग को सन 1998 में आबंटित हजारों एकड़ जमीनों में आज पर्यन्त तक विभाग का कब्जा ,सरकार व प्रशासन दिलाने में कामयाब नहीं हुई है।

आबंटित जमीनों का हाल कुछ इस तरह है अधिकांश हिस्सों में वन अधिकार पट्टा वितरण किया गया है  तो कुछ सरकारी निर्माण में ,तो कहीं अवैध रूप से कब्जा किया गया है  बात यही खत्म नहीं हुई  हुई दोनों ही राष्ट्रीय पार्टी के बड़े नेता राहुल गांधी द्वारा बस्तर जिले लोहंडीगुडा ब्लॉक के धुरागाँव मे फ्रूट प्रोसिंग प्लांट वही  देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा दरभा व तोकापाल ब्लाक में मेगा स्टील प्लांट लगवाने के घोषणा के साथ बस्तर में उद्योगों  को बढ़ावा देने की नीयत से कम्पनियों से किये गए सरकारी हजारों करोड़ रुपये के एम ओ यू  की हवा जमीनी नही होने से निकल रही है। 

बस्तर में अधिकाश जमीन वन विभाग के आपत्ति पर लटकी हुई है। तो कही राजस्व विभाग  रिकार्ड में लंबे समय से मत परिवर्तन नहीं किये जाने व सही सीमांकन नही किये जाने से लटके हुए है। हालात यह है राज्य सरकार के बस्तर में सयन्त्र लगाने के हर घोषणा के साथ बस्तर प्रशासन के हाथ- पांव फूलने  लगते है।

ताजा उदाहरण के रूप में विगत दिनों राज्य सरकार के मुख्यमंत्री द्वारा बस्तर में 5 नए सयन्त्र लगाने की घोषणा के बाद से सम्पूर्ण प्रशासन व जनप्रतिनिधियों द्वारा राजस्व  जमीन व उद्योग विभाग  सरकारी कागज पर आबंटित भूमि को खोजने का असफल प्रयास किया जा रहा है। जिसमे सफलता अब तक हाथ नहीं लगी है।

राज्य सरकार व प्रशासन की नीतिगत चूक का खामियाजा बस्तर के निजी भू स्वामियों को उठाना पड़ता है। सरकार अपनी नाकामी को छुपाने के लिए बस्तर के भोले भाले किसानों व निवासियों को बस्तर में विकास रोजगार व मूल -भूत सुविधाओ का  ख्वाब दिखा कर झुठा वादा कर ग्राम सभा को प्रभावित कर जमीनों का अधिग्रहण कर लेती है। बाद में सयन्त्र लगाने वाली कम्पनियों द्वारा सयन्त्र संचालन में असमर्थता सरकारो को जाहिर कर नुकशान बता निजीकरण करने सयन्त्र बेचने के प्रकिया को प्रारंभ किया जाता है।

जिसका बस्तर में सबसे बड़ा उदाहरण नगरनार में लगा स्टील प्लांट है। जहाँ हजारों प्रभावित किसानों से किये गए सरकारी वादों को ताक में रख बस्तर के विकास व रोजगार के अवसर से भरे सपनो को निजी हाथों में बेच सरकार अपनी जिमेदारी ब कर्तव्य से नजरे फेर रही है।इन सभी गम्भीर विषयों पर केंद्र व राज्य सरकार द्वारा कोई सफाई जनता के समक्ष नही रखी जाती है।

बस्तर के संचालित पार्टियों की टिकिट पर चुनाव जीते जनप्रतिनिधियों द्वारा यह सवाल संसद व विधानसभा में पूछे जाते है। बस्तर अधिकार मुक्तिमोर्चा ने जारी बयान में आगे कहा की मोर्चा द्वारा आगामी दिनों में राज्य के उधोग मंत्री जो बस्तर से आते है। उन से मुलाकात कर उक्त समस्याओं के निराकरण हेतु ज्ञापन सौप बस्तर उधोग हित मे उचित कार्यवाही की मांग करेगी।