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ध्रुव शुक्ल की कविताः है कोई बात जो इक चुप में ढली जाती है

ध्रुव शुक्ल की कविताः है कोई बात जो इक चुप में ढली जाती है


कभी-कभी 

मेरी आवाज़ चली जाती है

है कोई बात जो

इक चुप में ढली जाती है


शाम झरती है

जैसे राख हो उजाले की

बची जो आग वो

रह-रह के चिलक जाती है

है कोई बात जो

इक चुप में ढली जाती है




कोई बादल है

अनमना-सा है

कभी उसी में कोई

बिजली चमक जाती है

है कोई बात जो

इक चुप में ढली जाती है


नज़र न आये कहीं

फिर भी कोई सूरत है

डूबते दिन के उजाले में

घुली जाती है

है कोई बात जो

इक चुप में ढली जाती है


वो साँवरी-सी

अकेली-सी सड़क जाती है

शाम ढलते मुझे

जाने कहाँ बुलाती है

है कोई बात जो

इक चुप में ढली जाती है