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बदलाव के दू बछर: छत्तीसगढ़ी अस्मिता का सवाल

बदलाव के दू बछर: छत्तीसगढ़ी अस्मिता का सवाल

सुभाष मिश्र

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ के माटीपुत्र हैं। खेती-किसानी और लोकजीवन से उनका गहरा नाता है। लोकसंस्कृति के प्रति उनका अनुराग स्वाभाविक है। यह उनकी कार्यशैली से जब-तब प्रकट भी होता रहा है। गांव और किसान उनकी प्राथमिकता में हैं। नरवा-घुरूवा-गरुवा-बाड़ी जैसी योजनाओं में इसे देखा जा सकता है। दो वर्ष पूर्व सत्ता की बागडोर सम्हालते ही सरकार की मुद्रा किसान-हितैषी और उसकी दिशा ग्राम विकास की ओर उन्मुख दिखाई दी थी। इन दो वर्षों में सरकार किसान और गांव के करीब भी हुई है। एक नजऱ ऊपर से देखने पर इसे छत्तीसगढ़ी अस्मिता के प्रति आग्रह के रूप में भी देखा जा सकता है लेकिन यह किसी भी लोककल्याणकारी शासन का मूल दायित्व है जिसका निर्वाह भूपेश सरकार ने किया है। इसे महज़ अस्मिता के उभार के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं है। अस्मिता की राजनीति एक सीमा के बाद अपने ही घेरे में कैद होकर रह जाती है। इस खतरे की तरफ भी गौर किया जाना चाहिये। इसलिए यह लोककत्र्तव्य का तकाजा है कि सरकार छत्तीसगढ़ की आत्मा को, गाँव और किसान को अपने एजेंडे के केंद्र में रखती है।

स्वतन्त्र भारत के राजनीतिक विमर्श में अस्मिता के अर्थ बदल चुके हैं। आज़ादी के संघर्ष के दौरान राष्ट्रीय अस्मिता का जिस तरह से उभार हुआ। उससे राष्ट्रीय एकता सशक्त हुई थी। स्वतंत्र भारत में विभिन्न प्रदेशों में विकास की असमानता के चलते क्षेत्रीय भावना का उभार होने लगा जो राजनीतिक स्तर पर अस्मिता-बोध के रूप में अभिव्यक्त हुई। फलस्वरूप लोकतांत्रिक आकांक्षाएं क्षेत्रीय या आंचलिक अस्मिता के रूप में प्रकट होने लगीं। छोटे राज्यों के निर्माण के लिए हुए आंदोलन इसी का परिणाम थे। इन आंदोलनों के ज़रिये जनता की गोलबंदी के साथ अस्मिता की राजनीति का एक नया दौर शुरू हुआ।  धर्म के आधार पर जनता को गोलबंद करने के लिये अस्मिता की एक भिन्न राजनीति स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले से ही सक्रिय थी जिसकी परिणिति देश विभाजन में हुई थी। नये भारत में क्षेत्रीय अस्मिता के उभार तो हो रहा था लेकिन इसके समानांतर धार्मिक अस्मिता की राजनीति ने अंध राष्ट्रवाद का दामन थाम लिया और बहुसंख्यकवादी रुख अख्तियार कर धर्म के आधार पर जनता के ध्रुवीकरण का व्यापक अभियान छेड़ दिया। यही आज की वर्चस्वशाली राजनीति है जो सत्ता पर न सिर्फ  काबिज है बल्कि तेज़ गति से आगे बढ़ रही है। छत्तीसगढ़ में पंद्रह वर्षों तक सत्ता पर मज़बूत पकड़ रखने के बाद जब उसका शिकंजा टूटा तो कॉंग्रेस उसका स्वाभाविक विकल्प के रूप में मौजूद था लेकिन आज कांग्रेस को प्रदेश की सत्ता पर अपनी पकड़ मज़बूत करने और 2023 के विधानसभा चुनाव में प्रतिपक्ष का मुकाबला करने के लिए अस्मिता की राजनीति की शरण में जाने में ही अपनी भलाई दिखाई देती है। उसकी दुविधा भी साफ  दिख रही है। एक तरफ भाजपा के बहुसंख्यकवादी धार्मिक अस्मिता पर आधारित राष्ट्रवाद का मुकाबला करने के लिये कांग्रेस को बहुसंख्यक धार्मिक अस्मिता का ही इस्तेमाल करने में हिचक नहीं है इसलिए वह राम वन गमन पथ के विकास के लिये प्रतिबद्धता व्यक्त करती है। दूसरी तरफ  इसे प्रतिपक्षी का हथियार जान कर क्षेत्रीय छत्तीसगढ़ी अस्मिता का भी प्रयोग करती है। यह दुचित्तापन उसके आगे भाजपा का नरम संस्करण बन जाने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं छोड़ता। कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ी अस्मिता को लोकसंस्कृति की उत्सवधर्मिता में रिड्यूस कर दिया है। लोक जीवन की संघर्षधर्मिता को सीधे सम्बोधित करने और अंधराष्ट्रवाद का मुकाबला लोक के सहज राष्ट्रबोध से करने और लोकहित के व्यापक परिसर में बेहिचक दाखिल होने की बजाय वह पॉपुलिस्ट तरीक़े से हस्तक्षेप करती है।  

किसानों की ऋण माफी लोकप्रिय सरकारों द्वारा दी जाने वाली एक फौरी राहत है जो पेन कीलर की तरह काम करती है किन्तु जब तक कर्ज का असली मर्ज पकड़ में नहीं आयेगा तब तक यह ऋण माफी का सिलसिला अनवरत चलता रहेगा। भूपेश बघेल इस सच्चाई से बहुत अच्छे से वाकिफ हैं। वे स्वयं किसान हैं, इसलिए खेती को लाभकारी व्यवसाय में तब्दील करने की कवायद में लगे हैं। वहीं दूसरी ओर कृषि कानूनों में संशोधन लाकर जहां केन्द्र सरकार किसानों को सक्षम बनाने की बात कह रही है वहीं समूचा विपक्ष और बहुत से किसान संगठन इस कानून को रद्द करने की मांग पर अड़े हैं। 

छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने अपने दो साल के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ी अस्मिता को जागृत करने के लिए जिस तरह के निर्णय लिए हैं, काम किये हैं उससे यहां के छत्तीसगढिय़ा के मन में एक आत्मगौरव का भाव जागृत हुआ है। किसी भी राज्य की पहचान उसकी भाषा, संस्कृति, तीज-त्यौहार, खान-पान, उसके लोक व्यवहार इतिहास उसकी धरोहर को सहेजने संवारे जाने के छत्तीसगढ़ देश का अकेला ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस  केवल सत्ता पर काबिज है बल्कि उसके पास 90 में से 70 विधानसभा सीटें हैं। मध्य प्रदेश में सीटों का अंतर इतना कम था कि वहां भाजपा के चतुर नेताओं ने सत्ता ही पलट दी। राजस्थान में भी डांवाडोल की स्थिति बनी रहती है। पंजाब इस समय काबू में नहीं है। कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व इस समय बिहार की हार से उभरा नहीं है। पश्चिम बंगाल में भी उसकी स्थिति कोई अच्छी नहीं है। मोदी जी का कथित जादू, मीडिया मैनेजमेंट और भक्तों की भीड़ उनके विजयरथ को आगे ले जाने के लिए कुछ भी करने तैयार है। ऐसे में छत्तीसगढ़ अकेला ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस नेतृत्व को यह उम्मीद है कि वह 2023 में फिर से काबिज होगा। भूपेश बघेल सरकार के इस कांफिडेंस के पीछे जो कारक शामिल है, उनमें उनके द्वारा छत्तीसगढ़ में पिछले दो सालों में लिए गए वो निर्णय शामिल हैं, जो उससे दूसरों से अलग साबित करते हैं। 

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपने मजबूत इरादों और जमीनी सोच के साथ अपनी अस्मिता, अपने गांव और अपने छत्तीसगढ़ीपन के भाव को बरकरार रखते हैं। छत्तीसगढ़ में ना केवल अपना छत्तीसगढ़ का भाव जागृत किया है बल्कि यहां के लोगों को यह अहसास भी कराया है कि यह राज्य उनका है। भूपेश बघेल जमीनी नेता हैं, वे अच्छी तरह से जानते हैं कि सालों से कांग्रेस का गढ़ रहा छत्तीसगढ़ गांवों मेें बसता है। जिस नेता, पार्टी ने गांव के दुख दर्द, तकलीफ को समझ लिया, वही पार्टी यहां जीतेगी। यहां धर्म के नाम पर लोगों को बरगलाया, लड़ाया नहीं जा सकता। रामनामी चादर ओढ़कर हिन्दू वोट बैंक को एकजुट करने का भाजपा का देशव्यापी कार्ड भी यहां कौशल्या माता के ननिहाल और राम वन गमन पथ के माध्यम से निष्प्रभावी होता दिखता है। गोधन न्याय योजना के जरिये किसानों, पशुपालकों से दो रुपये किलो गोबर खरीदने का निर्णय हो या गांव-गांव में गौठान बनाने की बात, भूपेश बघेल इसके जरिये ग्रामीण क्षेत्र में अपनी अलग-अलग पहचान बनाते दिखते हैं। जब देश के किसान आंदोलित हैं, नये कृिष बिल को लेकर बवाल मचा है, मोदी जी के सारे नीतिकार धाराशाही हैं, ऐसे में छत्तीसगढ़ का किसान भूपेश बघेल के साथ खड़ा दिखाई देता है। भूपेश बघेल कहते भी हैं कि कृषि बिल का आंदोलन केवल किसानों का आंदोलन नहीं है। यह उपभोक्ताओं के खिलाफ भी है। इसलिए सबको मिलकर इसे निरस्त कराना चाहिए। राजीव न्याय योजना के जरिये 2500 रुपये में धान खरीदने, वाली भूपेश सरकार 400 यूनिट तक बिजली बिल भी हाफ करके बड़े संप्रदाय को प्रभावित करने में सफल रही है।  

भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली सरकार ने छत्तीसगढ़ राज्य की अस्मिता को जगाने वाला अपना राज्य गीत अरपा पैरी के धार, महानदी है अपार देकर गांव-गांव तक छत्तीसगढ़ महतारी की महिमा को पहुंचाया है। अजीत जोगी के बाद यदि किसी मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ी बोली भाषा के प्रति अपना प्रेम खुले रुप से जाहिर किया है तो वह है, भूपेश बघेल।