प्रधान संपादक सुभाष मिश्र बता रहे हैं कि धर्म चालाक आदमी के शोषण का हथियार है और भोले आदमी के लिये भाग्यवाद की अफीम!

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र बता रहे हैं कि धर्म चालाक आदमी के शोषण का हथियार है और भोले आदमी के लिये भाग्यवाद की अफीम!
  • सुभाष मिश्र

मिर्जा गालिब का एक मशहूर शेर है

जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर

या वो जगह बता दे जहां पर खुदा न हों।

कबीर का दोहा है

मोको कहां ढूंढे रे बंदे मै तो तेरे पास मे

ना तीरथ में ना मूरत में

ना एकान्त निवास में

ना मंदिर में ना मस्जिद में

ना काबे कैलाश में 

मैं तो तेरे पास में बन्दे, मैं तो तेरे पास में

निदा फाजली का शेर है

घर में मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूँ कर ले 

किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।

या

संत नरसिंह मेहता लिखित गांधी जी का प्रिय भजन

वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीड़ परायी जाणे रे

पर दुख्खे उपकार करे तोये मन अभिमान ना

आणे रे....

दरअसल ये सारे उदाहरण देने के पीछे मकसद ये है कि अभी भी बहुत से लोगों को लग रहा है कि उन्हें खुदा, भगवान, प्रभु मंदिर, मस्जिद, शिवालय में जाकर पूजापाठ, नामाज या प्रेयर करने से ही मिलेंगे। कोरोना समय में सोशल डिस्टेसिंग, फिजिकल डिस्टेंसिग की लाख समझाईश के बाद जो गलती तब्लीगी जमात के लोगों ने एक साथ रहकर मरकज को ,मस्जिद को सुरक्षित पनाहगाह समझकर की, वहीं गलती बहुत से लोग मस्जिद में इकट्ठे होकर जुम्मे की नमाज पढ़कर कर रहे हैं। जब मक्का-मदीना सहित दुनिया के बड़े से बड़े पूज्यनीय धार्मिक स्थल बंद हैं, तब ये जिद की हम नमाज साथ ही अदा करेंगे। 

मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा के चौरई के पास खैरी के मस्जिद में नमाज अदा करते 44 लोगों को पुलिस ने आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया, वहीं बिहार के नालंदा में शब्बे बरात के अवसर नमाज अदा करने एकत्र हुए लोगों को रोकने पर उन्होंने पुलिस पर हमला किया और दो पुलिसवाले घायल हुए। देश के सर्वाधिक कोरोना पीडि़त मुंबई के 22 लोग एक आईपीएस अधिकारी की मदद से पिकनिक मनाने महाबलेश्वर गये, जहां जनता के विरोध के बाद उन्हें पकड़ा गया। छट पूजा के नाम पर बिहार में एक साथ इकठ्ठे लोग हों या कोरोना के लिये दीए जलाने के नाम पर सड़कों में, मंदिर में एकत्र होने वाले लोग ,ऐसे अनेकों उदाहरण सामने आ रहे हैं जहां लोग जानबूझकर कोरोना संक्रमण के लिये लगाये गये लॉकडाउन को तोड़कर लाखों लोगों की जान को खतरे में डाल रहे हैं। 



ये जानते हुए कि कोरोना मानव श्रृंखला को अवरुद्ध करके ही रोका जा सकता है। लोगो की आस्था के सामने नागरिक बोध , मृत्यु का भय नदारत है ।हमारे धार्मिक विश्वास और आस्था के चलते हम किसी की तरह के तर्क, वैज्ञानिक सोच और परपंरा के विरुद्ध समानुकूल निर्णय करे स्वीकार करने तैयार नहीं है।हमारे भीतर सहिष्णुता, सामाजिक जवाबदारी का अभाव है। हमने अनेक अवसरों पर देखा है कि किसी भी फेनेटिक (उन्मादी) का दिमाग सन्तुलित नहीं रहता, वह हठी होता है। किसी भी चीज का एक ही पक्ष देखता है दूसरा नहीं। वह संकीर्ण, अंहकारी और क्रूर होता है। धर्म के नाम पर अल्लाह-ईश्वर की जो सत्ता निर्मित की गई है.

वह सत्ता किसी ईश्वर की सत्ता नहीं है बल्कि कुछ वर्गी की सत्ता है जो अपना दबदबा प्रभुत्व कायम रखने के लिये लोगों की धार्मिक भावना से खिलवाड़ करते हैं। एक धार्मिक व्यक्ति जो अपने धर्म पर आस्था रखता है, पर वह दूसरे धर्म से घृणा नहीं करता। आज उसे दूसरे धर्म से घृणा का पाठ पढ़ाया जा रहा है। धार्मिक आस्था और विश्वास के नाम पर किसी भी प्रकार के तर्क को बाधित किया जाता है। आज जमातियों के खिलाफ जगह-जगह एफआईआर हो रही है। धार्मिक स्थल जो पीडि़तों के लिए आस्था, मदद के सबसे बड़े केंद्र हो सकते थे, उनमें से अधिकांश की भूमिका उतनी सकारात्मक नहीं रही है, जो होना चाहिए। सवाल ये भी है कि धर्म के नाम पर इस तरह के धार्मिक केंद्रों का संचालन किनके हाथ में है और क्या उन्हें राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है। आज जिस तबलिगी जमात की बात पूरे देश में हो रही है वह हमेशा से सत्ता की राजनीति के बहुत नजदीक रहा है।

ये पहली बार नहीं है कि धर्म की सत्ता के नाम पर काबिज अलग-अलग संप्रदाय के बहुत से लोग ऐसा आचरण कर रहे हैंं, जो धर्म तो कतई नहीं सीखाता। हमने पहले भी धर्म को सम्प्रदाय में तब्दील होते और धार्मिक स्थलों की आड़ में नागरिक कानूनों की धज्जियां उड़ती देखी है। वास्तव में यह धर्म नहीं, साम्प्रदायिकता है जो एक दूसरे की नफरत से पनपती है। धर्म व्यक्तिगत श्रद्धा की चीज है। यह भी कोई जरूरी नहीं है कि धर्म मनुष्य को नैतिक बनाए। धर्म में विश्वास रखने वालों में बहुमत उनका है, जो अनैतिक काम करते हैं। नैतिकता धर्म से अलग है ,वह व्यक्ति तथा समाज के आचरण का जनकल्याणकारी नियमन है। धर्म चालाक आदमी के शोषण का हथियार है और भोले आदमी के लिये भाग्यवाद की अफीम।

आजादी के बाद से ही हम अपने देश में धर्म के नाम पर अलग-अलग संप्रदाय, मठो, मस्जिदों की सत्ता को लगातार बढ़ते देख रहे हैं। धर्म की आड़ में अलग-अलग संप्रदाय के तथाकथित गुरुओं, बाबाओं, उलेमाओं और अन्य लोगों ने जो कुछ कालांतर में किया है और जिसकी वजह अभी भी कर रहे हैं। वह यह समझने के लिये पर्याप्त है कि ये अपनी सत्ता अपने अखाड़े, अपने फतवे चलाना चाहते हैं। धार्मिक उन्माद का कहर हमने देखा कभी दंगे तो कभी घृणा, द्वेश, अविश्वास और दुश्मनी के रूप में ,उसे हम अभी भी देख रहे हैं। गांधी जी ने राजनीति में जिस धर्म के मेल की बात कही थी उसका मतलब था कि राजनीति में नैतिकता हो, सत्य हो, अहिंसा हो।

तुलसीदास अपनी चौपाई में इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं।

परहित सरिस धरम नहिं भाई

पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।

आज यदि गालिब होते और मस्जिदों में छिपे और अलग-अलग जगह पर , धूम-धूमकर समाज में कोरोना संक्रमण फैलाने अल्लाह के बंदों को देखते हो नये सिरे से कह उठते

काबा किस मुंह से जाओगे गालिब

शर्म तुमको मगर आती नही

( लेखक दैनिक आज की जनधारा एवं वेब मीडिया हाउस के प्रधान संपादक हैं )