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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-धान पर मंडराती राजनीति

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-धान पर मंडराती राजनीति


देश के कृषि मंत्री ने नये कृषि बिल का विरोध कर रहे आंदोलित किसानों को जहां चर्चा के लिए बुलाया, वहीं छत्तीसगढ़ में समर्थन मूल्य पर धान की खरीदी की शुरुआत हुई। देश की राजनीति के केन्द्र में आज किसान हैं। छत्तीसगढ़ की राजनीति भी किसान और धान के ईर्द-गिर्द ही दिखलाई देती है। धान का कटोरा कहा जाने वाले छत्तीसगढ़ में यह जानते हुए कि धान और गरीबी का सीधा संबंध है, कोई भी सरकार फसल चक्र परिवर्तन करने का रिस्क नहीं लेना चाहती। सरकार किसानों को खुश रखने के लिए यहां वहां से कर्जा लेकर बोनस दे सकती है, समर्थन मूल्य से अधिक पर धान खरीद सकती है, किंतु उन्हें अन्य लाभकारी फसलों की खेती के लिए बहुत ज्यादा प्रोत्साहित नहीं कर सकती। छत्तीसगढ़ में 43 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि में मुख्य फसल धान की होती है और यहां की करीब 80 प्रतिशत आबादी कृषि से जुड़ी है। शासकीय आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2018-19 में छत्तीसगढ़ में 80-40 लाख टन धान का उत्पादन हुआ था। 16 लाख पंजीकृत किसानों ने अपनी धान की फसल सोसायटी के माध्यम से बेची थी। इस बार 19 लाख किसानों ने धान बिक्री के लिए पंजीयन कराया है, यह बढ़ा हुआ पंजीयन भूपेश बघेल सरकार की किसान हितैषी नीति और 2500 रुपये क्ंिवटल धान खरीदी के निर्णय के कारण हुआ है। इस वर्ष के लिए अभी राज्य ने धान खरीदी का समर्थन मूल्य घोषित नहीं किया है, किन्तु सभी जानते हैं कि सरकार पिछले से कम पर तो नहीं खरीदेगी। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आयेंगे समर्थन मूल्य की खरीदी की दर भी बढ़ती जायेगी। धान खरीदी छत्तीसगढ़ की राजनीति का, अर्थव्यवस्था का केन्द्र है। किसान हितैषी सरकार जिसके पास राजस्व प्राप्ति के साधन सीमित हैं, जिसे केन्द्र जीएसटी का पैसा नहीं दे रहा है, जिससे किसानों को बोनस देने के लिए केन्द्र से सहयोग नहीं मिल रहा है, वो सरकार अपने प्राकृतिक खनिज संसाधनों का दोहन कर, कर्ज लेकर किसानों को बोनस देगी। नई आर्थिक नीति इस बात का सबूत है कि सरकार प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपने आर्थिक स्त्रोत विकसित करना चाहती है।

किसान हितैषी सरकारें जब केन्द्र द्वारा घोषित समर्थन मूल्य से अधिक पर उपज को खरीदती है तो इससे पड़ोसी राज्यों पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है, उन्हें भी विवश होकर उसी राह पर चलना होगा। विश्व व्यापार संगठन ने तय सीमा से ज्यादा सब्सिडी देने को लेकर केन्द्र को पूर्व में चेतावनी दी है। केन्द्र व राज्य संबंधों में किसान हित को लेकर टकराहट का सिलसिला पुराना है। जब छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद केन्द्र में एनडीए की सरकार थी। तब अजीत जोगी ने पूरे मंत्रिमंडल के सहयोगियों के साथ 7 रेसकोर्स रोड पर धरना-प्रदर्शन किया। भूपेश बघेल ने 2500 रुपये क्विंटल धान खरीदी को लेकर केन्द्र को पत्र लिखे। केन्द्र के इस फैसले के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल प्रधानमंत्री को जहां तीन बार चिट्ठी लिख चुके हैं, वहीं प्रदेश के दो मंत्रियों के साथ केन्द्रीय मंत्रियों से मुलाकात कर इस दिशा में सार्थक पहल करने का आग्रह भी कर चुके हैं। केंद्रीय मंत्री से मिलकर राशि की मांग की, किन्तु केंद्र ने कोई सकारात्मक जवाब नहीं दिया। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने 2500 रुपये क्विंटल धान खरीदा। इस बार भी छत्तीसगढ़ की सरकार 2305 धान खरीदी केन्द्रों के माध्यम से 90 लाख मीट्रिक टन धान खरीदने जा रही है। वहीं केन्द्र सरकार मात्र 8 प्रतिशत फसल ही समर्थन मूल्य पर खरीदती है। केंद्र और राज्य के बीच किसानों के समर्थन मूल्य को लेकर अक्सर बहस होती रही है। यदि सरकार को छत्तीसगढ़ के किसानों की आर्थिक दशा सुधारनी है तो उन्हें अन्य लाभकारी फसलों की तरफ भी जाना होगा। बाहर से आये किसानों ने छत्तीसगढ़ में खेत खरीदकर खेती के जरिये ये रास्ता दिखाया है। यहां के किसानों को नगद फसल जिसे रोकड़ फसल भी कहा जाता है, वह लगानी होगी। जिस तरह मध्यप्रदेश में सोयाबीन, सूरजमुखी, कपास जैसी फसलें लगाई जाती है।

छत्तीसगढ़, धान और किसान आज यहां की राजनीति का सबसे बड़ा केन्द्र बन गया है। राज्य बनने के बाद से अब तक कई कारणों से छत्तीसगढ़ की राजनीति चर्चा में रही है, लेकिन इस राज्य की राजनीति को जिसने सबसे ज्यादा प्रभावित किया वह है धान की पैदावार और खरीद। छत्तीसगढ़ बनने के बाद वर्ष 2000 में पहली बार सरकार ने समर्थन मूल्य पर धान खरीदा था। तब सरकार ने लगभग 4.63 लाख मीट्रिक धान खरीदा था। जबकि साल 2014 आते तक यह आंकड़ा लगभग 80 लाख मीट्रिक टन हो गया था। इस बार सरकार ने 85 लाख मीट्रिक टन धान खरीदने का लक्ष्य रखा है। 2013 में हुए चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणा-पत्र में 21 सौ रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी का वादा किया था।

धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में चावल की 23 हजार से ज्यादा किस्में हैं। प्रदेश के कृषि विवि में इन किस्मों का जर्मप्लाज्म सुरक्षित रखा है। छत्तीसगढ़ में लगभग दर्जनभर ऐसी किस्में हैं, जिनकी फसल ली जा रही है। इनमें मुख्य रूप से आईआर-54, आईआर-36, इंदिरा सोना, पूर्णिमा, समलेश्वरी, दंतेश्वरी, नरेंद्र, धान-97, एमटीयू-1010 शताब्दी और सहभागी धान प्रमुख हैं। इनमें लगभग सभी मोटे धान की श्रेणी में आते हैं।

राज्य शासन द्वारा खरीफ विपणन वर्ष 2020-21 में समर्थन मूल्य पर धान की कस्टम मिलिंग के संबंध में दिशा निर्देश जारी किया गया है। खरीफ वर्ष 2020-21 में उपार्जित धान की कस्टम मिलिंग के उपरांत मिलर्स को 30 जून तक उपार्जन एजेंसियों को चावल जमा कराना होगा। इस वर्ष समर्थन मूल्य पर धान बेचने के लिए 21 लाख 29 हजार 764 किसानों ने पंजीयन कराया है। ये वो किसान संख्या है जो पंजीकृत है, लाखों किसान प्रदेश में पंजीयन ही नहीं कराते। फिर भी उनका धान बिकता है। खेती का रकबा नियत के जो बढ़ता नहीं है। उत्पादक बढ़ता जाता है। जिनके द्वारा बोये गए धान का रकबा 27 लाख 59 हजार 385 हेक्टेयर है। विपणन वर्ष 2019-20 में समर्थन मूल्य पर धान बेचने के लिए 19 लाख 55 हजार 541 किसानों ने पंजीयन कराया था। चालू विपणन वर्ष में किसानों की संख्या और धान के रकबे में बढ़ोत्तरी को देखते हुए इस साल समर्थन मूल्य पर बीते वर्ष की तुलना में अधिक खरीदी का अनुमान है।