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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-बेहतर सेवा के नाम पर बढ़ता निजीकरण

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-बेहतर सेवा के नाम पर बढ़ता निजीकरण


शिक्षा, स्वास्थ्य, सेहत और सड़क यदि आपको सब कुछ अच्छा चाहिए तो आपको निजी क्षेत्र का मुंह देखकर इसकी महंगी कीमत चुकानी होगी। यदि आपके पास पैसे नहीं है, तभी आप सरकारी सेवाओं की ओर जायेंगे। मामला बच्चों की अंग्रेजी की पढ़ाई और अन्य बेहतर गतिविधियों से जुड़ा हो तो आपको निजी स्कूलों में बच्चों की तगड़ी फीस चुकानी होगी। यदि आपको साफ-सुथरे और बेहतर और त्वरित चिकित्सा सुविधा चाहिए तो आपको निजी अस्पतालों में जाना होगा, वो आपसे लूटने की हद तक पैसे वसूल लेंगे। आपको साफ पानी चाहिए, टायलेट चाहिए तो भी आपको पैसे चुकाने होंगे। जिस सड़क पर आप यात्रा कर रहे हैं और किस्मत से उसकी हालत अच्छी है तो समझ लीजिए आगे टोलटैक्स पर आपको पैसे भरने हैं। यही हाल अब अच्छी तेजस ट्रेनों का भी होने जा रहा है। आपको बी.एस.एन.एल. पर कभी भी अच्छा नेटवर्क नहीं मिलेगा जियो में जाते ही आपका नेटवर्क सुधर जायेगा। सरकारी बस, सरकारी बैंक,  सरकारी संस्थाएं सभी जगह आपको यह फील कराया जायेगा कि ये सब बेकार हैं भले वहां किराया, सुविधाएं विश्वसनीय और बेहतर क्यों ना हो।

निजीकरण सत्ता का एक ऐसा षड्यंत्र है जिसमें बड़े औद्योगिक घराने भी शामिल हैं और उनके हित साधने के लिए सरकार कटिबद्ध नजर आ रही है। निजीकरण लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक स्थिति है। इसमें विकल्प हीनता की स्थिति पैदा की जाती है। इससे औद्योगिक घरानों की वर्चस्ववादी शक्तियों को बढ़ावा मिलेगा। भारतीय बाजार कुछ गिनी-चुनी कंपनियों के अधीन रहेगा। विकल्प हीनता के कारण उपभोक्ता यानी आम जनता कुछ चुने हुए औद्योगिक घरानों द्वारा तय किए गए दाम यानी उनकी मनमानी का शिकार होगी। देश को कुछ गिने-चुने औद्योगिक घराने चलाएंगे। बाजार में भाव आसमान पर चले जाएंगे। कोई विकल्प नहीं होने की स्थिति में जनता के सामने इन्ही दामों पर क्रय करने की विवशता रहेगी। निजीकरण हिंदू राष्ट्रवाद की प्रिय नीति है और यह नीति कोई आज नहीं बनी है। यह नीति 1937 में आरएसएस के उभरकर आने पर तय हो गई थी। लोकतंत्र में इनकी अरुचि कोई आज की बात नहीं है या कोई नई बात नहीं है। यह स्पष्ट है कि निजीकरण इनकी एक राज्य की कल्पना को साकार करने में पहला कदम है। जिस तरह बैंकों में ब्याज दरें कम की गई है जिसके कारण निम्न वर्ग और मध्य वर्ग की बचत व्यवस्था पर भारी असर पड़ा है लेकिन सरकार की नीतियों पर कोई असर नहीं पड़ा। औद्योगिक घरानों के हाथों कठपुतली बने होने के कारण वे चाहते हैं कि बाजार में लिक्विडिटी बनी रहे और इससे बनाए रखने के लिए मध्यवर्ग और निम्न वर्ग का पैसा बैंक से बाहर निकालना होगा। पहले बड़ी कंपनियां बाजार में अपना पैसा निवेश करती थी अब म्यूचुअल फंड के बहाने वे जनता के पैसे से धंधा करना चाहते हैं। इस तरह बैंक हो या डाकघर से बचत दरों में भारी कमी करके जनता का सुरक्षित निवेश का रास्ता बंद कर दिया। ऐसी विकल्पहीनता की स्थिति में जनता के पास म्यूचुअल फंड में निवेश करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। यही सरकार चाहती है क्योंकि बड़े औद्योगिक घराने भी यही चाहते हैं। आमजन भविष्य की सुरक्षा के लिए जो पैसा बैंक के डाकघर में निवेश करता है अब उसका भविष्य खतरे में पड़ गया है। भविष्य में यदि उसे बीमार पडऩे पर या बच्चों की शादी ब्याह के अवसर पर पैसों की जरूरत पड़ेगी तो कर्ज लेने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं बचेगा। आगे आने वाला समय और खतरनाक आएगा। बहुत संभव है कि बैंक आपका पैसा रखने की एवज में शुल्क लेगा तो आमजन के पास बड़ी कंपनियों में छोटा लेकिन जोखिम भरा निवेश करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा। सरकार को इस बात की कोई चिंता नहीं है। उसे आमजन कि नहीं बल्कि बड़े औद्योगिक घरानों के भविष्य की चिंता है। इन सब गंभीर मुद्दों से आमजन को भटकाने के लिए व्यवस्था ने राम मंदिर, पाकिस्तान और अन्य ऐसी स्थितियों की ओर मुख मोड़ दिया है जिससे आमजन का ध्यान अपने आर्थिक भविष्य की ओर नहीं जाता, जो एक खतरनाक स्थिति की ओर जा रहा है। निजीकरण में व्यवसाय की ऐसी स्थितियां पैदा होगी जिसमें 5 से 10 गुना कमाने के लिए कंपनियां कटिबद्ध रहेंगी। उदाहरण के लिए रेलवे हमेशा सेवा का माध्यम रही है जिस पर लिखा भी रहता था कि रेल सेवा इसलिए घाटे के उपरांत भी इस विभाग को चलाया जा रहा था। अब धीरे-धीरे इसे निजीकरण की ओर ले जाया जा रहा है। जो कंपनी इसमें निवेश करेगी जाहिर है कि वह धंधे के सारे लाभ वसूल करेगी वह सेवा कर्म के लिए इस क्षेत्र में नहीं आएगी। सेवा सरकार का फर्ज है, व्यापारी का नहीं। अमेरिका की नकल में सरकार यह भूल रही है कि अमेरिका एक विकसित और अमीर देश है जबकि भारत आर्थिक मुद्दे पर लड़ रहा विकासशील देश है। भारतीय किसान आज भी मामूली से ट्रैक्टर जैसी सुविधाओं से वंचित है और बैलगाड़ी से कृषि करने पर विवश हैं। यह एक निम्न वर्ग के किसान की हालत है। इन स्थितियों से लडऩे के लिए न तो इस समय देश में कोई ऐसा वैचारिक संगठन है और ना कोई राजनीतिक दल है। जो है वह आपसी लड़ाईयों में उलझे हैं या फिर ताकत के जोर से दबा दिए गए हंै।

निजीकरण की ओर बढ़ते हुए हमने सबसे पहले दूरदर्शन देखना छोड़ा, क्योंकि हमारे नौकरशाहों और नेताओं ने इसे इतना बोरिंग और आत्मकेन्द्रित बना दिया की अब लोग इसे मजबूरी में ही देखते हैं। चमक-दमक और बेहतर कार्यक्रम के नाम पर अब प्राइवेट ऑपरेटरों हमसे हर महीने कम से कम 500 रुपये महीने वसूल रहे हैं।

हमें बीएसएनएल छोडऩे मजबूर किया गया, अब प्राइवेट आपरेटर हमसे दोगुना लेने की तैयारी में ताल ठोंकने लगे हैं। तुम सरकारी रेडियो आकाशवाणी नहीं सुनोगे तो प्राइवेट एफएम वाले तुम्हें एक ही गाना और सिर्फ गाना सुनाकर खुद करोड़ों कमाएंगे। सरकारी रेल की बजाय तेजस जैसी कारपोरेट निजी ट्रेन के आने पर ताली पीटोगे तो उसका महंगा किराया भी तुम ही दोगे। बीपीसीएल, इंडियन ऑयल जिस दिन नहीं रहेंगे उस दिन यही रिलायंस महंगा तेल बेचेगा। सार्वजनिक बैंक नहीं रहेंगे तो प्राइवेट बैंक वाले तुम्हारे ही पैसे रखने के तुमसे चार्ज लेंगे। ऐसी बहुत सारी बातें होगी। सरकारी कंपनियों, सेवाओं का निजीकरण करने का निर्णय ईस्ट इंडिया कंपनी का इतिहास दोहराने जैसा लगता है। इतिहास गवाह है कि जब किसी कंपनी का वर्चस्व सरकारी तंत्र पर बढ़ता जाता है तो देश की व्यवस्था एक तरह से उस कंपनी के हाथों में आती चली जाती है। निजीकरण की चपेट में सबसे पहले वे कंपनियां आ रही हैं जो कथित रूप से घाटे में चल रही हैं या जिनका मैनेजमेंट अच्छा नहीं है। सरकार की ओर से मिली छूट और अनुमति की ये कंपनियां खुलकर दुरूपयोग करेंगी।

जिन संसाधनों से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है वही संसाधन सरकार चुनिंदा पूंजीपतियों को बेच दे रही है। मतलब निजीकरण से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होगी बल्कि इन पूंजीपतियों की होगी। व्यवसायी का मकसद मुनाफा कमाना होता है, उसे देश-समाज से कोई मतलब नहीं होता। निजीकरण के बाद इन कंपनियों द्वारा सरकारी संसाधनों का दोहन युद्धस्तर पर होगा, वहीं दूसरी ओर श्रमिकों का शोषण अत्याचार में बदल जाएगा। केन्द्र सरकार द्वारा श्रम कानून में संशोधन कर श्रमिकों के अधिकारों का हनन करते हुए उन्हें बंधुआ मजदूर बनाने की कोशिश होगी। निजीकरण का सबसे अधिक नुकसान नौकरीपेशा वर्ग को होगा या होना वाला है।