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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - छोटे राज्य राजनीतिक संतुलन या विकास

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - छोटे राज्य राजनीतिक संतुलन या विकास

-सुभाष मिश्र
विकास नामक एक शब्द हमारे देश में पिछले कुछ समय से बहुत चर्चा, चलन और विवाद में हैं। राजनैतिक पार्टियों ने बकायदा विकास के लापता होने तक की बात कही। फिल्म थ्री इटियट के गाने बहती हवा सा था वो यार हमारा था वो कहां गया उसे ढूंढो की तर्ज पर विकास को ढूंढऩे की कवायद जारी है। विकास है की उसकी ग्रोथ दिखलाई नहीं पड़ती। कोरोना महामारी ने स्वास्थ्य शिक्षा, रोजगार के क्षेत्र के विकास की सारी पोल खोलकर रख दी। चुनाव और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं। जब चुनाव आता है तो विकास की भी बहुत बात होती है। देश में एक बार फिर से छोटे राज्यों में तेजी से विकास की अवधारणा के चलते उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य को विभाजित कर एक और राज्य पूर्वांचल बनाने की बात चल रही है। लोकसभा में 80 सीटों के साथ अपना दबदबा रखने वाले उत्तरप्रदेश की राजनीति इन दिनों गर्म है। उत्तरप्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। गोरखपुर के महंत योगी आदित्यनाथ इस समय उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री है। अपने काम और स्वभाव के कारण वे केंद्रीय नेतृत्व के सामने धीरे-धीरे चुनौती बनते जा रहे हैं। यदि पूर्व से लंबित राज्य विभाजन के प्रस्ताव पर केंद्र मंजूरी दे देता है तो योगी आदित्यनाथ पूर्वांचल के नेता होकर रह जायेंगे। यहां उन्हें निषाद पार्टी और अपना दल के नेताओं से निपटना पड़ेगा, जो अपने जाति समीकरण और वोट बैंक के कारण मजबूत है। पूर्वांचल में 125 विधानसभा सीटें और 25 लोकसभा सीटें है। जिनमें से अधिकांश पर भाजपा काबिज है। जब अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड बने तो तीन बड़े राज्यों का बंटवारा भौगोलिक आधार पर हुआ जिसमें एक बड़ा फैक्टर उस क्षेत्र में विकास और संसाधनों का बंटवारा था। उसके बाद आंध्रप्रदेश का बंटवारा होकर तेलंगाना बना। कश्मीर में धारा 370 हटाने के नाम पर कश्मीर से उसके स्वतंत्र राज्य की पहचान छिन कर उसे जम्मू से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। दिल्ली जिसे स्वतंत्र राज्य के रूप में विकसित होना था जहां चुनी हुई सरकार भी है, वहां भी उपराज्यपाल के माध्यम से केंद्र सरकार ही सत्ता संचालन करना चाहती है। भारत हमारे देश में पहले भाषा और भौगोलिक क्षेत्रफल के आधार पर राज्यों का निर्माण हुआ। छोटे राज्यों को बनाने का आधार 1990 के दशक से  पिछड़ेपन और विकास की कमी के आधार पर पुनर्व्यवस्थित किया गया। उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड के गठन के बाद अब तक के प्रदर्शन की पड़ताल करे तो हमे उन सामाजिक समूहों के लिए बेहतर जीवन की गारंटी दिखलाई नहीं पड़ती जिनके लिए ये राज्य बनाए गए हैं। मानव विकास सूचकांक में उत्तराखंड निचले पायदान पर बना हुआ है।
छोटे राज्यों के गठन का प्रश्न हमेशा विवाद का विषय रहा है। दो दशक पूर्व जब छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड का गठन निर्माण हुआ था, उससे पहले इसे लेकर ज़ोरदार बहस हुई थी। इन बहसों का स्वरूप प्राय: राजनीतिक था। विभिन्न दलों ने अपने राजनैतिक हितों के अनुरूप छोटे राज्यों के पक्ष या विपक्ष में अपने मत व्यक्त किये थे। राजनीति के विद्वानों और विशेषज्ञों की राय भी वैचारिक प्रतिबद्धता या किसी दल या व्यक्ति से निजी संबद्धता से प्रेरित थी। छोटे राज्य और आर्थिक-सामाजिक विकास के अंतर संबंध पर गम्भीर अकादमिक अध्ययन भी सामने नहीं आया। यदि कुछ अध्येताओं ने इस पर विचार किया तो राजनीतिक सत्ता ने अपने हितों के अनुरूप फैसले लिए। इस शताब्दी की शुरुआत में मध्यप्रदेश, बिहार और उत्तरप्रदेश से अलग कर गठित किये गए तीन राज्य हों या 2014 में आंध्रप्रदेश से अलग कर निर्मित हुआ तेलंगाना हो, केंद्र की सत्ता पर आसीन दलों ने अपनी राजनैतिक सम्भावनाओं को ध्यान में रख कर उनके गठन के निर्णय लिए। इन निर्णयों के पीछे तर्क यही था कि छोटे राज्यों की अपेक्षाकृत सीमित भौगोलिक विस्तार के भीतर विकास योजनाओं को बेहतर तरीके से संचालित किया जा सकता है और जनता के जीवन में सुधार की प्रक्रिया को तेज किया जा सकता है। लेकिन इस दृष्टि से इक्कीसवीं सदी में निर्मित चारों राज्यों के समग्र विकास पर नजऱ डालें अपने गठन के पीछे निहित उद्देश्यों और उम्मीदों पर वे खरे नहीं उतरे हैं। सकल वृद्धि दर और सकल घरेलू उत्पाद में वृध्दि जैसे पैमाने पर विकास भले ही दिखाई दे रहा हो, आम जनता के जीवन स्तर और उसकी खुशहाली में कोई वृध्दि नजऱ नहीं आतीं। इन राज्यों के मानव विकास सूचकांक में वृध्दि के आंकड़ों से इस तथ्य की पुष्टि की जा सकती है। विकास के दावे की पोल तो कोरोना संक्रमण के मौजूदा दौर ने स्वयं खोल दी जब महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे बड़े राज्य हों या उत्तराखंड और छतीसगढ़ जैसे छोटे राज्य, स्वास्थ्य व्यवस्था के बुरी तरह चरमरा जाने से समान रूप से तबाही के शिकार हुए। इसलिए छोटे राज्य और विकास के बीच सकारात्मक सम्बंध को ध्रुव सत्य मान लेने की बजाए राजनीतिक नेतृत्व की अंतर्दृष्टि, नियोजन कौशल और इच्छाशक्ति विकसित किये जाने पर ज़ोर दें तो विकास का पहिया बड़े राज्यों में भी द्रुत गति से दौड़ेगा। लेकिन दुर्भाग्य से राजनीतिक स्वार्थ के सर्वोपरि रहने से छोटे राज्यों का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया है। उल्टे उनके संसाधनों का दोहन ज़्यादा बड़े पैमाने पर और अधिक सघन रूप से होने लगा है। संसाधनों की लूट जारी रही तो छत्तीसगढ़ जैसे अमीर राज्य को गरीब होते देर नहीं लगेगी और लोग भी गरीब के गरीब ही रहेंगे।
1956 में जब राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर 14 राज्यों का निर्माण किया गया था, तब उसके सामाजिक-सांस्कृतिक और प्रशासनिक आधारों पर विचार-मंथन के बाद भाषा-क्षेत्र के अनुसार राज्य बनाए गए थे। लेकिन उसके बाद भी पुनर्गठित प्रान्तों के बीच क्षेत्रीय असंतुलन और इसके परिणाम स्वरूप जन असंतोष बना रहा। 1956 से ही यह असंतोष उभरने लगा था जो आगे चलकर छिटपुट आंदोलनों के रूप में दिखाई दिया। उदाहरण के लिये नवगठित महाराष्ट्र में पृथक विदर्भ और मध्यप्रदेश में पृथक छत्तीसगढ़ के लिए उसी दौर में सुगबुगाहट हो रही थी। इसके पीछे राजनीतिक स्वार्थ कम और सांस्कृतिक-सामाजिक बेमेलपन तथा क्षेत्रीय असंतुलन बढऩे के कारण पिछड़ेपन का अंदेशा ज़्यादा था। मौजूदा दौर में छोटे राज्य के गठन के पीछे के राजनीतिक निहितार्थ को समझना कठिन नहीं है। लेकिन उसके परिणामों पर विचार करना भी ज़रूरी है। यदि केंद्र की भाजपा सरकार अपनी राजनीति के चलते उत्तरप्रदेश से पृथक कर पूर्वांचल को स्वतंत्र राज्य बनाने की पहल कदमी करती है तो उसे विदर्भ, बुंदेलखंड, गोरखालैंड की मांग का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
छत्तीसगढ़ में आदिवासियों का सबसे बड़े विस्थापन के साथ खनिज संपदा निकालने के लिए उन्हें उनकी भूमि से बेदखल करने के निरंतर प्रयास किए गए हैं, जिस पर वे सदियों से बसे हुए हैं। तेलंगाना भी शराब ठेकेदारों के लिए एक आश्रय स्थल रहा है क्योंकि राज्य के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा शराब के ठेके से आता है। उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड और तेलागाना के गठन के बाद अब तक के प्रदर्शन की पड़ताल करे तो हमे उन सामाजिक समूहों के लिए बेहतर जीवन की गारंटी दिखलाई नहीं पड़ती जिनके लिए ये राज्य बनाए गए हैं। मानव विकास सूचकांक में उत्तराखंड निचले पायदान पर बना हुआ है।
प्रारंभिक रूप से उत्तरप्रदेश को संविधान के अनुच्छेद-3 के अंतर्गत चार राज्यों में विकास करने के लिए नवंबर 2011 में उत्तरप्रदेश विधानसभा से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा गया। इस प्रस्ताव के अनुसार उत्तरप्रदेश को चार हिस्सों में बांटकर बुदेंलखंड, पूर्वांचल, अवधप्रदेश और हरित प्रदेश के रूप में चिन्हित किया गया। बुदेंलखंड राज्य बनाने के लिए तो बकायदा आंदोलन भी हुए। इसके पहले महाराष्ट्र में विदर्भ राज्य बनाने को लेकर भी लंबे समय तक आंदोलन चला। असम में बोडोलैंड और पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड की मांग पुरानी है जिसके लिए लगातार आंदोलन भी हुए। गुजरात में सौराष्ट्र की मांग की बीच-बीच में उठती रही है।
इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च का कहना है कि छोटे राज्यों का निर्माण सामाजिक संकेतकों में वृद्धि या सुधार की गारंटी नहीं देता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2000 में बने नए राज्यों में, उत्तराखंड का औसत सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) वित्त वर्ष 2006 और वित्त वर्ष 2013 के बीच उत्तर प्रदेश से आगे निकल गया, जिस राज्य से इसे बनाया गया था, जबकि छत्तीसगढ़ और झारखंड ने मध्य प्रदेश की तुलना में कमजोर प्रदर्शन किया था। राज्य का आकार निर्णय लेने की प्रक्रिया को लंबा या छोटा करने में निर्णायक भूमिका नहीं निभाता है।
भाजपा को नियंत्रित करने वाली संख्या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ छोटे राज्यों की पक्षधार है। ऐसा माना जाता है कि छोटे राज्यों में तेजी से विकास होता है। वहां के प्रशासन तंत्र को काम करने में आसानी होती है। लोगों को भी राज्य की सरकार नजदीक और अपनी पहुंच में लगती है। छोटे राज्य होने से केंद्र मजबूत होता है। राज्यों की बारगेनिग पावर कम हो जाती है। राज्य केंद्र को आंख दिखाने की स्थिति में नहीं रहेंगे। छोटे-मोटी कवायद और असंतोष के जरिय राज्यों की सरकारों को यदि वे केंद्र के खिलाफ है तो चलता किया जा सकता है। छोटे राज्यों में राज्यपाल के जरिए केंद्र अपनी हुकूमत चला सकता है। कुछ लोग का मानना है कि केंद्र को हमेशा मजबूत होना चाहिए तभी देश मजबूत होगा।