प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- यह प्रशासनिक पराक्रम नहीं सूझबूझ से काम का समय है

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- यह प्रशासनिक पराक्रम नहीं सूझबूझ से काम का समय है


यह प्रशासनिक पराक्रम दिखाने का नहीं आपसी सूझबूझ से काम करने का समय है। यह कोरोना समय है। यह संकट का समय है। यह समन्वय के साथ काम करने का समय है। बेहाल और डरी हुई जनता को राहत दिलाने का, ढाढस बांधने का समय है। जब तक कोरोना की वैक्सीन नहीं आ जाती, तब तक लोगों की हर तरह से इम्युनिटी बढ़ाने का समय है। पिछली सरकार में कुछ नौकरशाहों के इशारों पर तमाम तरह के कर्मचारी आंदोलन, जनआंदोलनों को दबाया गया था। कुछ लोगों को नौकरी से निकाला गया था जिससे कर्मचारी आक्रोशित थे। उसी तरह से स्वास्थ्य कार्यकर्ता, डॉक्टर जिन्हें हमने वारियर्स कहा है, जिन पर फूल बरसाये गये हैं, जिनके लिए कसिदे पढ़े गये यदि उनमें किसी प्रकार का आक्रोश है, पीड़ा है, तो उसे दबाने, डराने का नहीं सुनने का समय है। इसके ठीक उलट उनसे सामूहिक इस्तीफा जैसा प्रावधान नहीं है कहकर अलग से पृथक-पृथक इस्तीफा मांगकर एक माह का वेतन जमा करने कहा जा रहा है। नई भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला जा रहा है। यदि इस अघोषित युद्धकाल में हम अपनी सेना के सिपाहियों का मनोबल गिरायेंगे तो फिर जनता को कैसे आश्वस्त करेंगे। काम का दबाव केवल कलेक्टर और बड़े अधिकारियों पर ही नहीं है। बहुत से छोटे-छोटे कर्मचारी, जमीनी कार्यकर्ता भी कोरोना की लड़ाई में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। जिले की प्रमुख स्वास्थ्य अधिकारी फार्मासिस्ट के साथ सोशल डिस्टेेंसिंग की धज्जियां उठाते हुए केक काटकर फोटो डाल रही हैं।

कोरोना काल में इस समय सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के उन सैकड़ों प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ता, अंशकालिक डॉक्टरों को कोरोना नियंत्रण मिशन से कैसे जोड़कर रखा जाए। इनकी हड़ताल को कैसे वापस कराया जाए। यह समय प्रशासनिक अधिकारियों के पराक्रम दिखाने का नहीं है, जैसा कि जांजगीर, बलौदाबाजार सहित कुछ जिलों के कलेक्टरों ने ताबड़तोड़ कार्यवाही करके एनएचएम के लोगों को सेवामुक्ति का आदेश निकलवा दिया। सबसे बड़ी बात यह भी है कि सबसे ज्यादा कर्मी अभी स्वास्थ्य अमले की है। विशेषकर नए बढ़ते जा रहे कोविड के प्रकरणों के कारण नए कोविड सेंटर, जांच केंद्र, प्रशासनिक अमले के पूर्व प्रशिक्षित लोगों को इस मझधार के समय अपने से जोड़कर बनाये रखना ज्यादा जरूरी होगा। उनकी न्यायोचित मांगें यदि पूरी की जा सकती हैं, तो उनसे संवेदनशील चर्चा कर बीच का रास्ता जल्द से जल्द निकलना जरूरी है।

राज्य के हालात को देखते हुए यह सोचने का समय है कि ऑक्सीजन बेड, आईसीयू बेड की कमी और विशेषज्ञ डॉक्टर की कमी को कैसे पूरा किया जा सके। हमारे राज्य में कोविड से मौतों के आंकड़े अभी भी सम्हाले जा सकते हैं, इसके लिए हरसम्भव व्यवस्था, नए मेडिकल रिसर्च का ज्ञान हमारे सुदूर कोविड केंद्र के डॉक्टरों को भी हो। दूसरे अन्य राज्यों की बेस्ट मेडिकल प्रैक्टिस को हमारे यहां भी प्रचलित किया जाए, ऐसी व्यवस्था हो। टेलिमेडिसिन सेवाओं का विस्तार, अन्य वैकल्पिक उपायों का ज्ञान चाहे वह होम्योपैथी, आयुर्वेदिक दवाओं का उपयोग जो बिहार, बंगाल, केरल जैसे राज्यों ने किया और अच्छे परिणाम मिले हैं। दिल्ली में कोरोना नियंत्रण में प्लाज्मा थैरेपी के भी अच्छे नतीजे आये। नई मेडिकल रिसर्च में आइवरमेक्टिन जैसी दवा का उपयोग एक बहुत बड़ी आशा की किरण बनकर निकला है। ऑस्ट्रेलिया, ईरान जैसे देशों में आइवरमेक्टिन, डॉक्सीसाइक्लिन, जिंक जैसी दवाओं के उपयोग से कोविड नियंत्रित करने में हर स्तर के मरीजो में अच्छे नतीजे मिले हैं। उन देशों में इसे प्रभावी उपाय के रूप में शामिल किया जा चुका है। हमारे देश में भी बड़े शहरों दिल्ली, मुंबई, कोलकाता में इन दवाओं का नवीन चिकित्सा उपाय पर ज्यादा फ़ोकस हो रहा है। ऐसे ही विशेषज्ञ चिकित्सा पद्धति और नए उपचार के उपाय छत्तीसगढ़ राज्य में जल्द से जल्द लागू होना जरूरी है।

उपचार के तरीकों को लेकर समान पद्धति का अभाव ज्यादा दिखता है। प्राइवेट अस्पतालों में मनमाने जांच और बेतहाशा बिलों के बावजूद लोगों को आशानुरूप राहत नहीं मिल पा रही है। गंभीर मरीजों के लिए बेड की कमी लगातार सुनने को मिल रही है। मनोबल और मोटिवेशन दोनों के गिर जाने से मरीजों और स्वास्थ्य अमले दोनों का परफॉर्मेंस प्रभावित हो रहा है। ऐसे युद्धकाल के समय में राज्य के नीति नियामकों को प्राथमिकताओं का निर्धारण करना होगा। सर्वोच्च प्राथमिकता के कई विषयों में तंत्र की दूरदर्शी सोच की कमी परिलक्षित हुई है। जैसे ऑक्सीजन की कमी और बढ़ती मांग को लेकर संशय का वातावरण बना हुआ है। हालांकि , सरकारी तंत्र ऐसी किसी कमी से लगातार इंकार कर रहे हैं, लेकिन लोगों में यह विश्वास घर कर गया है कि ऑक्सीजन की कमी है, और इसलिए लोग ऑक्सीजन सिलेंडर अपने घरों में आपातकाल की आवश्यकता मान कर जमा करने लग गए हैं। राज्य को मध्यप्रदेश की तरह अन्य राज्यों और विशेषकर केंद्र से तालमेल, समन्वय स्थापित कर ऑक्सीजन की पर्याप्त व्यवस्था हेतु पुरजोर प्रयास यथाशीघ्र करना ही चाहिए। जिस तरह सरकारी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन प्लांट स्थापना के प्रयास अभी हुए हैं, यह अपने आप में देर से लिया गया निर्णय है। जिसके सुधार के नतीजे आने में समय लगेगा।

प्राइवेट नर्सिंग होम तथा प्राइवेट अस्पतालों में मध्यम वर्गीय परिवार और गरीब लोगों का सही और समय पर इलाज मिल सके। इसमे अभी भी बहुत ज्यादा गुंजाइश बनी हुई है। केंद्र के आयुष्यमान भारत योजना का लाभ मिल नहीं पा रहा है। हेल्थ बीमा कंपनियों में भी भुगतान को लेकर शिकायतें बढ़ती जा रही हैं। मंदी के दौर में महंगे इलाज के भय ने लोगों को बहुत ज्यादा सशंकित कर दिया है। ऐसे डॉक्टरों की सलाह लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है, जो लोगों में कोरोना से लड़ाई के लिए हौसला बढ़ाये। ऐसे ही एक डॉक्टर गिरीश अग्रवाल बताते हैं कि कोरोना से घबराएं नहीं, 90 फीसदी कोरोना के केसेस अपने आप ठीक हो रहे हंै। आपका इम्युनिटी सिस्टम वायरस को हरा रहा है। जबरदस्ती बार-बार जाँच न कराएं, सीटी  स्कैन आदि में पैसे बर्बाद न करें, अस्पताल के चक्कर लगाने से बचें। लोग हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के डोजेज और अन्य प्रकार की दवाइयां ले रहे हैं, जिसकी माइल्ड केसेस में कोई जरुरत नहीं है। सिर्फ जब आपके शरीर का ऑक्सीजन लेवल दिन में 3 से 4 बार 94 से कम हो तभी आप हॉस्पिटल में एडमिट हो, अन्यथा घबराएं नहीं घर में सेल्फ आइसोलेशन में रहें। साथ ही उन्होंने बताया कि विटामिन और जिंक की गोलियां 10 दिन खा के इम्युनिटी नहीं बढ़ती, ये लाइफ स्टाइल पर डिपेंड करता है। जितना ज्यादा हो नेचुरल सोर्स से विटामिन लें।

स्वास्थ्य विभाग ने कोविड-19 संक्रमण से बचाव व इलाज के लिए आईवरमेक्टिन टैबलेट का प्रयोग किए जाने के आदेश जारी किया है। यह दवा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की जगह इस्तेमाल की जाएगी और संक्रमित व उसके संपर्क में आए लोगों व स्वास्थ्य कर्मियों को दी जाएगी। इसके लिए दवा की खुराक का निर्धारण भी कर दिया गया है।

हाल ही में छत्तीसगढ़ में हुए सीरो सर्वे के अनुसार कोरोना से लडऩे की रोग प्रतिरोधक क्षमता के मामले में राजधानी रायपुर की स्थिति अन्य जिलों की तुलना में अच्छी है। आइसीएमआर ने तीन जिलों रायपुर, दुर्ग और राजनांदगांव में सीरो सर्विलेंस की अंतरिम रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के अनुसार, राजनांदगांव के 3.76 प्रतिशत, दुर्ग के 8.31 प्रतिशत और रायपुर के 13.41 प्रतिशत लोगों के शरीर में कोरोना संक्रमण के खिलाफ लडऩे वाले एंटीबाडी की मौजूदगी पाई गई है। इस सर्वे में लिए गए सैम्पल का दायरा बढ़ता तो यह आंकड़ा 25 प्रतिशत तक आता।

कोरोना के विरुद्ध जारी इस लड़ाई से हम सब जीत जायेंगे। मनुष्य की जिजीविषा उसे विषम से विषम परिस्थिति में जीने की उम्मीद और ताकत देती आई है। हमें अपने धैर्य, जरूरी सावधानी के साथ आपसी समन्वय को बनाये रखना है। समाज के लोग भी अब कोरोना की लड़ाई में आगे आ रहे हैं यह अच्छी बात है। अब सभी को अपनी-अपनी भूमिका समझने की जरूरत है। यह मोलभाव, मुनाफाखोरी, अपनी ताकत और सौदेबाजी करने का समय नहीं है। यह शासन-प्रशासन स्तर पर संवेदनशीलता के साथ मिलजुलकर काम करने का समय है।