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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - फिल्म सिटी बनाने से कुछ नहीं होगा

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - फिल्म सिटी बनाने से कुछ नहीं होगा

-सुभाष मिश्र

योगी सरकार उत्तरप्रदेश में सबसे भव्य फिल्म सिटी बनाने की कोशिश कर रही है। मध्यप्रदेश की सरकार अपने राज्य में पर्यटन उद्योग की संभावनाओं को देखते हुए फिल्मकारों को सिंगल विंडो पर क्लियरेंस दे रही है। छत्तीसगढ़ में भी फिल्म नीति बन गई है, फिल्म सिटी बनने की कवायद शुरू हो गई है। मायानगरी मुंबई की देखा-देखी बहुत सारे राज्यों में फिल्म सिटी और फिल्म शूटिंग की सुविधाएं, उनका प्रमोशन सरकारें करना चाहती है। फिल्मों में दिखाए गए दृश्य, लोकेशन और सुंदरता को देखकर बहुत से पर्यटक वहां जाना चाहते हैं। यश चोपड़ा को स्विटजरलैंड की सरकार ने स्विस एंबेसडरर्स अवार्ड 2010 से इसलिए सम्मानित किया था कि उन्होंने अपनी फिल्मों के जरिए उनके देश को लोकप्रिय बनाया। फिल्मकार प्रकाश झा मध्यप्रदेश में आकर फिल्म शूट करते हैं। भोपाल जहां लगातार थियेटर की गतिविधियां संचालित है। वहां से फिल्म के लिए छोटे-मोटे कलाकार, भीड़ और प्राकृतिक सौंदर्य आसानी से मिल जाता है। कम खर्च और संसाधनों में अच्छे होटल, कलाकार और बहुत सी सुविधाएं मिलने से फिल्मकार फिल्में बनाने के लिए उत्साहित रहते हैं। प्रकाश झा जिन्होंने राजनीति, आरक्षण जैसी फिल्में भोपाल में रहकर बनाई, वे इन दिनों एक वेबसीरिज आश्रम की तीसरे श्रृंखला की शूटिंग भोपाल में कर रहे हैं। रविवार को शाम 5 बजे भोपाल के पुराने जेल परिसर में चल रही शूटिंग के दौरान बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने मिलकर फिल्म यूनिट पर लाठी-डंडा स्टीक आदि से हमला किया। कलाकारों को मारा, तोडफ़ोड़ की। फिल्म एक्टर बॉबी देओल और प्रकाश झा के साथ मारपीट होने की सूचना है। हिन्दू धर्म की भावनाओं को आहत किये जाने के कथित आरोप के चलते यह मारपीट, तोडफ़ोड़ हुई। इस दौरान महिलाओं से भी मारपीट की गई। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर पूरी टीम को उपद्रवियों के चंगुल से मुक्त कराया। प्रकाश झा, बॉबी देओल या उनकी शूटिंग यूनिट के किसी सदस्य ने इस घटना की रिपोर्ट पुलिस में नहीं लिखाई।

बिहार के रहने वाले प्रकाश झा ने चुनाव भी लड़ा। वे ज्वलंत और राजनीतिक मुद्दों पर फिल्में बनाते हैं। ये अलग बात है कि उनकी फिल्म जिसका नाम आरक्षण है उसमें वे आरक्षण जैसे गंभीर विषय पर कुछ नहीं कहते। वे अपहरण फिल्म में भी गंभीरता नहीं लाते, जो आना चाहिए। यहां आश्रम नामक वेबसीरिज जो हमारे देश के कथित ढोंगीबाबा जिनमें अभी जेल में सजा काट रहे आसाराम बापू से लेकर रामरहीम जैसे बहुत से लोग हंै, उनकी छबि इस सीरिज में दिखाई देती है। जो लोग धर्म को कलंकित करने वाले तमाम पाखंडी बाबाओं के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। धर्म के नाम पर चलने वाले कारोबार और अपराध, बच्चों और स्त्रियों का क्रूर शोषण, करोड़ों लोगों को जहालत और कूपमंडूकता में बनाए रखना ये मुद्दे कभी किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत क्यों नहीं करते? यह भी यक्ष प्रश्न है।

यहां सवाल यह भी है कि जो सरकारें अपने प्रदेशों में फिल्म निर्माण, शूटिंग को प्रमोट कर रही है, अनुदान दे रही है, क्या वे फिल्म बनाने वालों को ऐेसा वातावरण दे पायेगी जिसमें वे बेखौफ होकर फिल्म बना सकें। केन्द्र सरकार ने फिल्मों के लिए सेंसर बोर्ड बना रखा है। यदि कोई फिल्म देश, समाज के लिए खराब होगी या संविधान की मूल भावना के विरुद्घ बनेगी तो उसे सेंसर बोर्ड ही खारिज कर देगा। किसी फिल्म के नाम, कथानक, पात्रों के नाम, गाने, इतिहास, धार्मिक पौराणिक आख्यान, मान्यताओं को लेकर बिना पढ़े बवाल खड़ा करते हैं। दरअसल, उन्हें इसके बारे में ज्यादा कुछ मालूम नहीं है। ऐसे लोग न तो इतिहास को जानते हैं और ना ही संस्कृति को। यदि योगी सरकार, शिवराज सिंह सरकार और बाकी सरकारें भी अपने सहयोगी बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद, करणी सेना को नहीं संभाल सकती तो उन्हें फिल्म सिटी बनाने या फिल्मकारों को शूटिंग अपने यहां आयोजित नहीं करने देना चाहिए।

बजरंग दल जिसने इस घटना को अंजाम दिया उससे जुड़े लोगों को लगता है कि आश्रम जैसी सीरिज के माध्यम से हिन्दू धर्म को बदनाम किया जा रहा है। विश्व हिन्दू परिषद के मध्यभारत के संयोजक सुशील सुदैल का भी कहना है कि मध्यप्रदेश सरकार ने उन्हें पर्यटन को बढ़ावा देने शूटिंग की अनुमति दी थी लेकिन उन्हें हिन्दू धर्म को बदनाम करने की अनुमति नहीं हैं। वेब सीरिज आश्रम के शीर्षक को बदलने की मांग का समर्थन मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा भी करते दिखते हैं। उन्हें लगता है कि वेबसीरिज के जरिए हिन्दू धर्म को टारगेट करने की कोशिश की है। प्रकाश झा ने बिहार की पृष्ठभूमि पर इसके पहले गंगाजल और अपहरण जैसी फिल्म बनाकर लालू प्रसाद यादव की दागदार छबि को कहानी में बुना। अपनी दोनों ही फिल्म में उन्होंने बहुत बार जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया किंतु उन पर किसी प्रकार कोई हमला नहीं हुआ। अभी हाल ही में वेबसीरिज महारानी आई जो कि राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाए जाने की घटना के इर्द-गिर्द बुनी गई है। अमेरिकन सीरिज हाऊस ऑफ कार्डस जो कि वहां के व्हाइट हाउस यानी राष्ट्रपति भवन की अंदरुनी कहानी, राजनीतिक षड्यंत्रों को लेकर बनी है, ऐसी सीरिज पर कोई बवाल नहीं मचता। हमारे देश में कुछ लोग बात-बेबात धर्म, संस्कृति, इतिहास और जाति आधार लेकर फिल्म, पेंटिंग, कविता, कहानी या यूं कहें अभिव्यक्ति के उन तमाम माध्यमों पर हमला करते हैं जिससे उन्हें लगता है कि यह उनकी अस्मिता इतिहास या प्रचलित किस्से कहानी, छबियों, से हटकर दिखा रहे हैं, लिख रहे हैं। हमारे देश में बात फिल्मों के प्रारंभ काल यानी दादा साहब फाल्के और राजा रवि वर्मा के समय की हो या मकबूल फिदा हुसैन की पेटिंग की हो या संजय लीला भंसाली की फिल्म पदमावत की हो। एम.एफ. हुसैन जिनके खिलाफ देशभर में 900 से ज्यादा प्रकरण दर्ज कराये गये जिनकी पेंटिंग को जला दिया गया। उन्हें अपने जीवन के अंतिम समय में देश छोड़कर 2010 में कतर की नागरिकता लेनी पड़ी। 9 जून 2011 को उनका लंदन में इंतेकाल हो गया।

राजस्थान के जयपुर स्थित जयगढ़ किले में फिल्म पद्मावती की शूटिंग के दौरान संजय लीला भंसाली को करणी सेना के युवकों ने थप्पड़़ मारा और सेट पर तोडफ़़ोड़़ की गई। इस घटना के बाद फिल्म के डायरेक्टर संजय लीला भंसाली ने जयपुर से पैकअप कर लिया। जब फिल्म पद्मावती का ट्रेलर रिलीज हुआ, जिसके बाद करणी सेना ने कई शहरों में तोडफ़ोड़ की। घूमर गाने को लेकर जबरदस्त विरोध शुरू हो गया। अंतत:  फिल्म निर्माताओं को इसके कई शॉट्स काटने पड़े।

फिल्म का विवाद बढ़ता देख सेंसर बोर्ड ने 3 इतिहासकारों को फिल्म दिखाई। फिल्म  का नाम पद्मावती से पद्मावत कर दिया गया। साथ ही फिल्म में 5 बदलाव किए गए। फिल्म निर्माता-निर्देशक अनुराग कश्यप की फिल्म उड़ता पंजाब करीना कपूर, शाहिद कपूर, आलिया भट्ट व दिलजीत दो सांझ जैसे कलाकारों वाली इस फिल्म के केंद्र बिंदु में नशा और पंजाब है और यही वजह है कि पंजाब में इसे लेकर राजनीतिक हलचल हुई।  

आमिर खान की फिल्म पीके रिलीज होते ही भावनाएं आहत होने और भड़कने की बात कहकर एफआईआर हुई है, जगह-जगह पोस्टर फाडऩे और तोडफ़ोड़ का सिलसिला चला।
किसी राजनीति, विचार, संस्था या कलाकृति के बारे में असहमति या आलोचना व्यक्त करना, सवाल खड़े करना या विपरीत विचार रखना एक स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज का आवश्यक गुण होता है। मगर हमारे समाज में हर असहमति और आलोचना के प्रति असहिष्णुता दिनों दिन बढ़ती जा रही है। कोई लेख, कार्टून, किसी किताब में आया एक पैराग्राफ, किसी फिल्म का दृश्य लोगों को इस कदर आहत कर देता है कि वे तुरंत समाज के दूसरे हिस्सों को सशरीर आहत करने पर आमादा हो जाते हैं। इस खतरनाक प्रवृत्ति के पीछे सबसे बड़ा कारण वोटों की राजनीति नजर आती है जो मूलभूत मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए हमेशा ऐसे विषयों की तलाश में रहते हैं। बहुत से फिल्मकार इस समय उन सारे मुद्दों पर चुप हैं जिनमें उन्हे बोलना चाहिए। वे कहते हैं कि हमें अपने सेलिब्रिटी होने की कीमत चुकानी पड़ती है। इस तरह की चुप्पी को हरिशंकर परसाई कहते हैं कि इस देश का बुद्घिजीवी शेर है जो सियार की बारात के आगे बैंड बजाता है। दरअसल, ये समय सियारों, हुआ-हुआ करने वाला है। इन्हें देश के जरूरी मुद्दे दिखाई नहीं देते।