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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - मुक्ति अकेले की नहीं होती

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - मुक्ति अकेले की नहीं होती

प्रसंगवश - 22 अगस्त परसाई जयंती पर विशेष

सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार, लेखक, प्रगतिशील चिंतक हरिशंकर परसाई की आज जयंती है। होशंगाबाद जिले के जमानी गांव में जन्मे हरिशंकर परसाई अपने बारे में कहते थे कि मैं लेखक छोटा हूं पर संकट बड़ा हूं। हां वे सही कहते थे। परसाई अपने समय के सच, विसंगतियों और प्रवृत्तियों को समझकर उन पर प्रहार करते थे। उनके बारे में कहा जाता है कि यदि कबीर आज पैदा होते तो परसाई होते और परसाई उस समय पैदा होते तो कबीर होते। कबीर, तुलसी, गालिब, प्रेमचंद के साथ-साथ वैज्ञानिक चेतना से लैस लेखकों, चितंकों, विचारकों और राजनैतिक व्यक्तित्व से प्रभावित परसाई ने ताजिंदगी जबलपुर में रहते हुए लोकशिक्षण किया। उनके मित्र और मार्गदर्शक गजानन माधव मुक्तिबोध ने 1956 में हरिशंकर परसाई के संबंध में लिखा था- मानदंडों का प्रयोग बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए। यदि परसाई की तुलना रोम्या रोली, गोर्की या ताल्सतॉय से करने लगें तो हमारी बुद्धि की दिक्काल-संवेदना लुप्त समझिये। किन्तु कौन जानता है कि भारतीय धरती की उर्वरता परसाई के कला-हृदय से फूटने वाली हो? यह सही है कि बीज आज भव्य वृक्ष नहीं है किन्तु कौन कह सकता है कि वह सघन छात्र नहीं होगा?
यह पंक्तियां तब की है जब लेखक के रूप में परसाई की पहचान बन ही रही थी। आज मानदंडों का बहुत सावधानी से प्रयोग करते हुए भी यह कहने में हमें कोई संकोच नहीं है कि परसाई, कबीर और निराला की परंपरा के विद्रोही कलमकार हैं। समाज की बुनियादी विकृतियों पर प्रहार करने वाली वज्र जैसी कलम उनके पास थी। मुक्तिबोध ने परसाई के आकलन में गलती नहीं की थी।

परसाई पीडि़तों के अद्वितीय योद्धा हैं। सामाजिक परिवर्तन की भूमिका तैयार के साथ ही वैज्ञानिक दृष्टि को जीवन का अंग बनाने का क्रांतिकारी प्रयास उनकी रचनाओं में हुआ है। उनका लेखन-पाठकों में सामाजिक जागरूकता उत्पन्न करने वाला और संघर्षों से जूझने का साहस देने वाला है।
22 अगस्त 1924 को जमानी होशंगाबाद में जन्मे हरिशंकर परसाई की कर्मभूमि जबलपुर रही। कुछ साल जबलपुर के माडल स्कूल में शिक्षकीय दायित्व के बाद स्वतंत्र लेखन कर अपनी और अपने विधवा बहन के परिवार का जीवनयापन करते रहे। परसाईजी ने अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं को स्तंभ लेखक के रूप में जितना लिखा शायद ही किसी ने लिखा होगा। सामयिक घटनाओं को राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय संदर्भों के साथ जोड़कर त्वरित टिप्पणी के रूप में अपना कालम लिखने वाले हरिशंकर परसाई ये कालम आज भी सामयिक है, प्रासंगिक है। परसाईजी वैज्ञानिक चेतना से लैस प्रगतिशील मूल्यों की स्थापना के संघर्षरत ऐसे लेखक थे जिन्होंने जीवनभर लोकशिक्षण के जरिए एक शिक्षक की भूमिका निभाई।

परसाई की समझ अपने समकालीन और बाद के हास्य व्यग्यं लेखको की तुलना में बहुत साफ थी। वे कहते थे की स्त्री से मजाक एक बात है और स्त्री का उपहास दूसरी बात। हमारे समाज में कुचले हुए का उपहास किया जाता है। स्त्री आर्थिक रूप से गुलाम रही, उसका कोई व्यकितत्व नहीं बनने दिया गया, वह अशिक्षित रही, ऐसी रही-तब उसकी हीनता का मजाक करना सेफ हो गया। जब लोग परसाई से पूछते हैं कि तो क्या पत्नी, साला, नौकर, नौकरानी आदि को हास्य का विषय बनाना अशिष्टता है। तो परसाई कहते हैं वल्गर है। इतने व्यापक सामाजिक जीवन में इतनी विसंगितियां है। उन्हें न देखकर बीवी की मूर्खता बयान करना बड़ी संकीर्णता है। व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है, जीवन की आलोचना करता है, विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखंडों का परदाफाश करता है।

परसाई के व्यंग्य के करूणा की अंतरधारा समाहित होती है। जब आप उनके व्यंग्य को पढ़ते हैं तो आप अपने आप पर खिसियानी हंसी हंसते हैं। चूंकि परसाईजी एक दृष्टि संपन्न लेखक हैं, इस कारण उनकी व्यंग्य रचनाओं में किसी तरह का भटकाव नहीं है। वो जो कहना चाहते हैं, वहीं करते हैं और सही समय पर सही जगह पर चोंट करते हैं। आज युवक-युवतियों के सामने आस्था का संकट है। सब बड़े उनके सामने नंगे हैं। आदर्शों, सिद्धांतों, नैतिकताओं की धज्जियां उड़ते वे देखते हैं। वे धूर्तता, अनैतिकता, बेईमानी, नीचता को अपने सामने सफल एवं सार्थक होते हुए देखते हैं। मूल्यों का संकट भी अपने सामने हैं। सब तरफ मूल्यहीनता उन्हें दिखती है। बाजार से लेकर धर्मस्थ तक वे किस पर आस्था जमाएं और किस के पदचिन्हों पर चलें? किस मूल्यों को मानें?

बकौल परसाई दिशाहीन, बेकार, हताश, नौकरवादी, विध्वंसवादी बेकार युवकों की यह भीड़ खतरनाक होती है। इसका प्रयोग महत्वाकांक्षी, खतरनाक विचारधारा वाले व्यक्ति और समूह कर सकते हैं। इस भीड़ का उपयोग नेपोलियन, हिटलर और मुसोलिनी ने किया था। इस देश का मूढ़ आदमी न अर्थ नीति समझता, न योजना, न विज्ञान, न तकनीक, न विदेश नीति।

अपनी बात बड़े साधारण ढंग से शुरू करने वाले परसाई अपने निबंध, कहानी में अंत आते तक पहुंचकर उसे असाधारण, विशिष्ट और पाठक को भीतर तक हिला कर रख देने वाली कृति में बदल देते हैं। कबीर से प्रभावित परसाई बार-बार यही कहते हैं कि दुखिया दास कबीर है, जागे और रौवें। परसाई भी कबीर की तरह आंखन देखी कहते है। उन्होंने अपने जीवनकाल में चार सौ से अधिक कहानियां लिखी। इसके अलावा बहुत सारे पत्रिका में कॉलम लिखे। परसाई रचनावली में बहुत कुछ समाहित किया गया है किन्तु उनका लिखा जो एक प्रकार का लोक शिक्षण है अभी भी यहां वहां बिखरा पड़ा है। किसी भी पाठक को बतरस का जितना आनंद परसाई के लेखन में मिलता है उतना किसी अन्य रचनाकार के लेखन में नहीं। परसाई की लेखन शैली और भाषा विविध स्तरों और परतों पर चलने वाली करेंट की अंतर्धारा की तरह है।

बकौल परसाई निंदा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं। निंदा खून साफ करती है, पाचन क्रिया ठीक करती है, बल और स्फूर्ति देती है। निंदा से मांसपेशियां पुष्ट होती है। निंदा पायरिया को तो शर्तिया इलाज है।
परसाई कहते भी हैं कि मुक्ति अकेले की नहीं होती। अलग से अपना भला नहीं हो सकता। ब्रम्हांड में गूंजने वाले हजारों-हजार वाक्यों में शायद यही एक वाक्य होगा जिसने मेरे जैसे बहुत से लोगों को बेहतर दुनिया के संघर्ष के लिए प्रेरित किया होगा। परसाई जी कहते हैं मनुष्य की छटपटाहट है, मुक्ति के लिए, सुख के लिए, न्याय के लिए पर यह बड़ी लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती। अकेले वहीं सुखी है, जिन्हें कोई लड़ाई नहीं लडऩी। अनगिनत लोगों को सुखी देखता हूं और अचरज करता हूं कि ये सुखी कैसे हैं। न उनके मन में सवाल उठते, न शंका उठती है।

परसाईजी संभवत: पहले अकेले ऐसे लेखक हैं, जिनके निबंध, कहानी पर सबसे ज्यादा नाट्यरूपांतरण कर नाट्य मंचन किए गए हैं और किये जा रहे हैं। परसाईजी की रचना पर आधारित नाटक इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर पिछले पांच दशक में सर्वाधिक मंच और नुक्कड़ पर प्रदर्शित हुआ। रानी नागफनी की कहानी, निठल्ले की डायरी, सदाचार का ताबीज, भोलाराम का जीव, एक लड़की पांच दीवाने, अकाल उत्सव, प्रेमचंद के फटे जूते जैसी कितनी ही रचनाएं जिन पर आज भी लगातार नाट्य मंचन हो रहे हैं।

परसाई जी के व्यंग्य में व्याप्त विसंगतियां, समाज के तथा कथित बड़े लोगों का दोगलापन, सांप्रदायिकता, राष्ट्रवाद, जातिवाद, भ्रष्टाचार, स्त्री की समाज में स्थिति जिनका जिक्र परसाईजी ने अपनी रचनाओं में किया है। अभी भी वैसी ही और कई बार तो बहुत ही भयावह बनी हुई है।
परसाईजी की व्यंग्य रचनाओं में करूणा है, सहानुभूति है, और एक प्रकार की मुक्ति ही छटपटाहट है। व्यंग्य लिखा बहुत बाद में जाता है, पहले जिया जाता है। एक सहज और संवेदनशील व्यंग्यकार सबसे पहले अपने ऊपर व्यंग्य करता है, अपनी कमजोरियों को उजागर करता है। वो अपनी पीड़ा को जग की पीड़ा बनाता है। कागज की लेखी की जगह आंखन की देखी कहता है।

परसाईजी कहते हैं, मुझे दिखाऊ सहानुभूति से सख्त नफरत है। अभी भी दिखाऊ सहानुभूति वालों को, चांटा मार देने की इच्छा होती है। जप्त कर जाता हूं वरना तो शुभचिंतक पिट जाते।
परसाईजी अपने प्रारंभिक दिनों का बहुत ही निर्ममता और साफगोई के साथ बयान करते हुए कहते हैं कि मैंने पहली विधा बिना टिकट यात्रा कैसी की जाए ये सीखी। दूसरी विधा उधार मांगने की सीखी। तीसरी विधा बेफ्रिकी से जीवन जीने की सीखी। यह विधा मुझे मेरी बुआ ने सीखाई, जिनका मानना है कि जो होना है होगा, तुम बेफ्रिक रहो। चौथी विधा ये सीखी की डरो किसी से मत।

गुरू परसाई के व्यग्यंबाण देखन में छोटे लगे पर घाव करें गंभीर -कुछ संदर्भ
गरीब आदमी न तो ऐलोपैथी से अच्छा होता है, न होमियोपैथी से, उसे तो सिम्पैथी (सहानुभूति) चाहिए ।
नेता हो जाना बड़ा अच्छा धन्धा है।
घूस से पारिवारिक जीवन सुखी होता है।
जिस दिन घूसखारों की आस्था भगवान पर से उठ जायेगी, उस दिन भगवान को पूछने वाला कोई नहीं रहेगा।
पैसे में बड़ी मर्दानिगी होती है। आदमी मर्द नहीं होता है, पैसा मर्द होता है।
पुल पार उतरने के लिए नहीं, बल्कि उद्घाटन के लिए बनाये जाते हैं। पार उतरने के लिए उसका उपयोग हो जाता है, प्रासंगिक बात है।
ये बड़े-बड़े अफसर बेचारे बहुत कमजोर होते हैं। ये तबादले से ज्यादा कुछ कर ही नहीं सकते। अगर ये कहें कि तुम्हें मार डालूँगा, तो समझो कि ये तबादले करेंगे।
पैसा खाने वाला सबसे डरता है। जो सरकारी कर्मचारी जितना नम्र होता है, वह उतने ही पैसे खाता है।
बाराती से ज्यादा बर्बर जानवर कोई नहीं होता।
धर्म का उपयोग तो अब दंगा कराने के लिए ही रह गया है।
जनता कच्चा माल है। इससे पक्का माल विधायक, मंत्री आदि बनते हैं। पक्का माल बनने के लिए कच्चे माल को निपटाना ही पड़ता है।
अच्छे शासन कुछ शब्दों और आंकड़ों के बल पर चलते हैं।
ब्राह्यण किसी को नहीं पालता। वह खुद ही पलता है।
लड़के शादी के बाजार में मवेशी की तरह बिकते हैं।
दुनिया के पगले शुद्ध पगले होते हैं- भारत के पगले आध्यात्मिक होते हैं।
बहुत लोगों के लिए पिता मूलधन होते हैं, और जैसे कंजूस बार-बार रूपये गिनता है, वैसे ही ये लोग पिता का हर आदमी के सामने वर्णन करते हैं।
असन्तुष्ट कर्मचारी सरकारी दल के लिए खतरनाक होता है।
अपना बाप चुनने का अधिकार किसी को नहीं है।
नियम है कि जो माँ बेटे को जितना प्यार करती है, बहु को उतना ही दुख देती है।
पता नहीं यह परम्परा कैसे चली कि भक्त का मूर्ख होना जरूरी है।
इस कौम की आधी ताकत लड़कियों की शादी करने में जा रही है। पाव ताकत छिपाने में जा रही है - शराब पीकर छिपाने में, प्रेम करके छिपाने में, घूस लेकर छिपाने में - बची हुई पाव ताकत से देश का निर्माण हो रहा है, बहुत हो रहा है। आखिर एक चौथाई ताकत से कितना होगा।
लड़की का जीवन अपना नहीं होता, विवाह के पहले बाप के अधिकार में होता है और विवाह के बाद पति के।
मूर्ख से मूर्ख आदमी तब बुद्धिमान हो जाता है जब उसकी शादी पक्की हो जाती है।
स्त्री निकृष्ट से निकृष्ट आदमी से शादी कर लेगी, पर श्रेष्ठतम् पुरूष का दूसरी स्त्री से बंटवारा नहीं करेगी।
पुस्तक लिखने वाले से पुस्तक बेचने वाला बड़ा होता है। कथा लिखने वाले से कथावाचक बड़ा होता है। सृष्टि निर्माता से सृष्टि का लूटने वाला बड़ा होता है।
संविधान में जूते मारने का बुनियादी अधिकार तो होना ही चाहिए। आदमी के पेट में अन्न न हो, शरीर पर कपड़े न हों, पर पावों में जूता जरूर होना चाहिए, जिससे वह जब चाहे बुनियादी अधिकार का उपयोग कर सके।
इस देश में बुद्धिजीवी सब शेर हैं। पर वे विचारों की बारात में बैण्ड बजाते हैं।
कोई भाषा अनपढ़ों के हाथों में सुरक्षित रहती है।
मैंने बहुत से क्रान्तिवीरों को बाद में भ्रान्तिवीर होते देखा है।
गणतंत्र ठिठुरते हुए हाथों की तालियों पर टिकी है। गणतंत्र को उन्हीं हाथों की ताली मिलती है, जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिए गर्म कपड़ा नहीं है।
रोटी खाने से कोई मोटा नहीं होता, चन्दा या घूस खाने से मोटा होता है। बेईमानी के पैसे में ही पौष्टिक तत्व बचे हैं।
जो अपने युग के प्रति ईमानदार नहीं है, वह अनन्त काल के प्रति क्या ईमानदार होगा।
इस महान देश में हर पवित्र और पूज्य चीज दंगे के काम आती है। दुनिया में कहीं भी गाय की पूजा नहीं होती इसलिए वह दूध के काम आती है। जहां गाय के दूध से जिन बच्चों को पुष्ट होना चाहिए ,वे गाय के दंगे में मारे जाते हैं।
धार्मिक उन्माद पैदा करना, अंधविश्वास फैलाना, लोगों को अज्ञानी और क्रूर बनाना राजसत्ता, धर्मसत्ता और पुरूष सत्ता का पुराना हथकण्डा है।
अधिकांश शादियां उल्लास की न होकर त्रास की होती है।