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BREAKING : छत्तीसगढ़ के इतिहास में पहली बार नेतृत्व परिवर्तन को लेकर खुली रस्साकसी

BREAKING : छत्तीसगढ़ के इतिहास में पहली बार नेतृत्व परिवर्तन को लेकर खुली रस्साकसी

रायपुर . छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री के पद भूपेश बघेल बरकरार रहते हैं,या नही यह तो अगले एक दो दिनों में साफ हो जायेंगा लेकिन राज्य के इतिहास में यह पहला मौका है जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेता के परिवर्तन को लेकर खुली रस्साकसी दिखाई पड़ी हैं।

एक नवम्बर 2000 को मध्यप्रदेश को विभाजित कर आस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ में पहली सरकार कांग्रेस की श्री अजीत जोगी के नेतृत्व में बनी थी।जिस समय उन्हे मुख्यमंत्री बनाने का पार्टी आलाकमान ने निर्णय लिया था उस समय उनके पास विधायकों का बहुमत नही था पर,पार्टी आलाकमान के निर्णय के बाद सभी ने उसे स्वीकार किया।बाद में वरिष्ठ कांग्रेस नेता स्वं श्यामाचरण शुक्ला,स्वं महेन्द्र कर्मा तथा भूपेश बघेल ने नेतृत्व परिवर्तन की गुपचुप असफल कोशिश की लेकिन कभी खुलकर किसी ने सार्वजनिक रूप से कुछ नही कहा।श्री जोगी ने पूरे कार्यकाल तक सरकार चलाई।

दिसम्बर 2003 में राज्य में भाजपा सत्ता में आई,उस समय डा.रमन सिंह,स्वं दिलीप सिंह जूदेव एवं श्री रमेश बैस मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे।आखिरकार डा.रमन सिंह मुख्यमंत्री बने।उनके नेतृत्व में भाजपा ने 2008 एवं 2013 में भी विधानसभा चुनावों में सफलता अर्जित की,और लगातार 15 वर्ष तक मुख्यमंत्री बने।डा.सिंह अपने विनम्र स्वभाव के कारण सभी को विश्वास में लेकर चलने में सफल रहे।वैसे तो पार्टी में उऩके विरोधियों की कोई कमी नही थी,लेकिन कभी भी कोई मुखर होकर उनके खिलाफ न तो खड़ा हुआ और न ही आलाकमान के बाद ही समूह में कोई गया।

डा.सिंह पर कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि उन्होने अपने एक-एक विरोधियों को शालीन राजनीति करते हुए किनारे लगा दिया।सच जो भी हो पर इतना जरूर सच हैं कि कभी उऩ्हे अपने पक्ष में पार्टी नेतृत्व के सामने किसी को भेजने की जरूरत नही पड़ी।अटल आडवाणी से लेकर मोदी शाह तक पार्टी नेतृत्व का भरोसा उऩके साथ रहा।सत्ता से हटने के ढ़ाई वर्ष बाद भी उनके विरोधी भी मानते है कि पार्टी नेतृत्व अभी भी उन्हे पूरी तरजीह दे रहा है।

राज्य के इतिहास में पहली बार हुआ है कि 2018 दिसम्बर में चुनावों के बाद मुख्यमंत्री का दायित्व संभालने वाले भूपेश बघेल को हटाने के लिए स्वास्थ्य मंत्री टी.एस.सिंहदेव ने ढ़ाई वर्ष का उनका कार्यकाल पूरा होते ही सावर्जनिक रूप से मुहिम छेड दी।श्री सिंहदेव निजी बातचीत में ढ़ाई-ढ़ाई वर्ष तक भूपेश एवं उन्हे मुख्यमंत्री पद पर रहने के राहुल गांधी के आश्वासन का जिक्र करते रहे,वहीं इससे कही ज्यादा आक्रमकता से इस तरह की बातों को बेबुनियाद बताने की कोशिश भी होती रही।

जुलाई के आखिरी सप्ताह में विधानसभा सत्र के दौरान कांग्रेस विधायक वृहस्पति सिंह द्वारा श्री सिंहदेव पर अपनी हत्या करवाने की साजिश का आरोप लगा दिया.विवाद बढ़ने पर उन्होने विधानसभा के भीतर इस मामले में खेद जताया।लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को सिंहदेव ने आलाकमान के सामने अपने खिलाफ साजिश रचे जाने के रूप में पेश किया।माना जाता है कि आलाकमान ने उनके कथन पर विश्वास भी किया।

राजनीति जानकारों के अनुसार भूपेश खेमे ने सिंहदेव को घेरने का जो भी अभियान चलाया या उन्हे दरकिनार कर उऩके विभागों में बगैर उन्हे विश्वास में लिए मुख्यमंत्री के स्तर से निर्णय हुए उन सबकी जानकारी वह आलाकमान तक पहुंचाते रहे।शालीनता से बात रखकर आलाकमान से ढ़ाई-ढाई वर्ष के मुख्यमंत्री के वादो को याद दिलाने और उसे लागू करवाने की उऩकी कोशिशों ने चार दिन पहले तक बहुत ताकतवर माने जा रहे भूपेश बघेल को अपने समर्थन में शक्ति प्रदर्शन करने को मजबूर कर दिया।

जमीनी एवं संघर्ष की राजनीति करने वाले नेता की पहचान रखऩे वाले श्री बघेल पर आरोप लगते रहे है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उऩ्होने अपने को कैद कर लिया है।उनका राज्य के सर्वोच्च आलाधिकारियों तक से केवल बैठकों तक ही मिलना जुलना है।लगभग डेढ़ वर्ष तो विधायकों से भी कम ही मिलते थे अब थोड़ा स्थित बदली है।अपने पूर्ववर्ती दो मुख्यमंत्रियों अजीत जोगी एवं डा.रमन सिंह के विपरीत मुख्यमंत्री बनने के बाद अब तक श्री बघेल का मीडिया से मिलना जुलना भी लगभग नगण्य रहा है।कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए भी उनसे मिलना लगभग टेढ़ी खीर रही है।अब जबकि उनके नेतृत्व को लेकर सवाल उठ रहे है तो पिछले दो दिनों से यह बाते राजनीतिक गलियारों में खुलकर हो रही है।