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नये कृषि कानून पर विशेष खुलासा, तीन में से दो कानून असंवैधानिक, राज्यों के अधिकार में अनावश्यक हस्तक्षेप, नए कानून के पहले केन्द्र को संविधान में संशोधन करना था

नये कृषि कानून पर विशेष खुलासा, तीन में से दो कानून असंवैधानिक, राज्यों के अधिकार में अनावश्यक हस्तक्षेप, नए कानून के पहले केन्द्र को संविधान में संशोधन करना था
  • व्ही.एस.भदौरिया

भारत के संविधान का स्वरूप संघीय है तथा समस्त शक्तियां (विधायी, प्रशासनिक व वित्तीय) केंद्र व राज्यों के बीच स्पष्टतः विभाजित हैं. संविधान के भाग-11 में अनुच्छेद 245 से 255 तक केंद्र व राज्य के विधायी संबंधों की चर्चा की गयी है. सातवीं अनुसूची में संघ सूची, राज्य सूची व समवर्ती सूची के रूप मे तीन प्रकार की सूचियां उपस्थित हैं. केंद्र को संघ सूची व समवर्ती सूची के विषयों व आपातकाल/ राष्ट्रपति शासन लागू होने पर राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है. राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाना राज्यों का अधिकार है. इस आलेख मे तीन नये कृषि कानूनों के गुण दोषों पर चर्चा के बजाय इनकी संवैधानिकता पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया गया है.
     
कृषि संबंधी तीन नये कानूनों में से आवश्यक वस्तु(संशोधन)अधिनियम, 2020 तो पूर्व प्रचलित कानून मे कतिपय संशोधन के आशय से लाया गया है, इसलिए उसकी संवैधानिकता पर विचार किये जाने की आवश्यकता नहीं है. शेष दो कानून क्रमश: "कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम 2020 राज्यों के अपने अपने कृषि उपज मंडी कानूनों (एपीएमसी एक्ट) के अंतर्गत स्थापित वर्तमान कृषि विपणन बाजार व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन के आशय से, एवं कृषि (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार अधिनियम,2020 राज्यों एपीएमसी एक्ट या इस हेतु पृथकत: बने कानूनों के अध्यधीन अनुबंध खेती या कांट्रेक्ट फार्मिंग के मौजूदा प्रावधानों का स्थान लेने के लिए लाये गये हैं. ये दोनों कानून क्रमशः कृषि व बाजार विषयों के अंतर्गत आते हैं.

ये दोनों विषय न तो संघ सूची में शामिल हैं, न समवर्ती सूची में उल्लेखित हैं. वर्तमान में आपातकाल भी लागू नहीं है, ऐसा भी नहीं है कि तीनों अनुसूचियों में ये विषय सम्मिलित नहीं हैं, इसलिए इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र को नहीं है, यह सीधे सीधे राज्यों के विशेष अधिकार में केंद्र का अनावश्यक, अनुचित व अनपेक्षित हस्तक्षेप ही नहीं है,अपितु संवैधानिक सीमाओं व मर्यादाओं का अतिक्रमण भी है. केंद्र की चूक पर चौंकने के बजाय आप स्वयं संविधान की पुस्तक या गूगल पर भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत विनिर्दिष्ट संघ सूची,राज्य सूची व समवर्ती सूचियों का परिशीलन करेंगे तो यह पायेंगे कि कृषि व मार्केट केवल राज्य के विषय हैं. राज्य सूची में 61 विषय थे, सन् 2016 मे हुए 101वें संविधान संशोधन के बाद प्रविष्टि क्र.52 व 55 विलोकित किये जाने के बाद अब 59 विषय हैं. राज्य सूची की निम्न प्रविष्टियों का अवलोकन करें :

Entry no. (14) : Agriculture, including agricultural education and research, Protection against pests and prevention of plant diseases;

Entry no. (26) : Trade and commerce within the state subject to the provisions of Entry 33 of list 3
 (Concurrent list)

Entry no. (28) : Markets and Fairs
   
यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू होने के बाद से, 2020 मे इन नये कानूनों के अस्तित्व मे आने के पहले तक केंद्र द्वारा कभी भी कृषि,अनुबंध खेती व मंडियों के संबंध मे अपनी ओर से कोई कानून नहीं बनाया गया था. मंडी प्रणाली व अनुबंध खेती की व्यवस्था मे सुधार हेतु केंद्र द्वारा कई बार विशेषज्ञों की समितियां बनाई गयीं, टास्क फोर्स गठित किये गये, राज्यों के कृषि मंत्रियों से चर्चा की गयीं व समय समय पर राज्यों को सुझाव भी दिये गये, इसी अनुक्रम में केंद्र द्वारा सन् 2003 में Model APMC Act,2003 का प्रारूप बनाकर राज्यों को भेजा गया था,जिसके आधार पर अधिकांशतः राज्य सरकारों ने अपने मंडी कानूनों में बदलाव भी किये थे. यदि केंद्र को कृषि विपणन बाजार या मंडी विषय पर कानून बनाने का अधिकार होता तो वह माडल एक्ट बना कर राज्यों को परामर्श देने के बजाय स्वयं ही पूरे देश मे समान रूप से लागू होने वाला अपना Central APMC Act बना सकता था,लेकिन ऐसा न करते हुए उसने संविधान की मर्यादा का पालन किया.

आपमें से कई सुधीजन यह कह सकते हैं कि पहले की सरकारें कमजोर होती थीं,उनमें साहस व निर्णय लेने की क्षमता नहीं थी,अब जाकर पहली बार सक्षम सरकार बनी है,जो साहसिक फैसले लेने से नहीं हिचकती है.अब इस सक्षम सरकार की बात सुनिये. वर्तमान केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय द्वारा वर्ष 2017-18 के बजट प्रस्ताव मे की गई घोषणा के मुताबिक व्यापक विचार विमर्श के बाद "Model Contract Farming Act,2018" तैयार कर राज्यों को भेजा गया, जिसके आधार पर 20 राज्यों द्वारा अपने अपने APMC Act  में कांट्रेक्ट फार्मिंग के नये उपबंध /प्रावधान जोड़े गये हैं,इसी माडल ड्राफ्ट के अनुक्रम मे पंजाब स्टेट ने मंडी एक्ट मे तद्विषयक बदलाव के बजाय अपना अलग से कांट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट ही बना लिया है. दो साल पहले तक केंद्र को यह पता था कि,कृषि व मंडी राज्यों का विषय है,अब अचानक उनके भीतर नया ज्ञान कहां से उदित हो गया ?

कृषि राज्य सूची का विषय : खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रा


आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि, भारत सरकार का खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय भी यह मानता है कि कृषि (Agriculture) राज्य सूची का विषय है. इस विभाग की तत्कालीन मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने दिनांक 2 जनवरी 2018 को संसद मे इस आशय का बयान भी जारी किया गया था, जिसके संबंध मे पीआईबी द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के प्रासंगिक अंश निम्नानुसार हैं :

Twenty one states have adopted contract Farming provisions in their Agricultural Produce Market Committee (APMC) Act and Government of Panjab has legislated  a separate "Contract Farming Act,2013" which help contract sponsors including food processing Industries to enter into contact agreement with farmers for Agriculture produce.In order to assist the States in liberalizing the Agriculture Market to provide better access to farmers for marketing of their produce, Department of Agriculture, Cooperation and Farmers Welfare had provided a model " Agricultural Produce Market Committee (APMC) Act,2003" for adoption by states as Agriculture Marketing is a state subject.Model APMC Act,2003 provide for contract Farming provision.

उपरोक्त से स्पष्ट है कि,वर्तमान सरकार 2018 तक कृषि व मंडी को राज्यों के अधिकार क्षेत्र का विषय मानकर परामर्शी की भूमिका निभाते हुए उन्हे पूरे देश मे एक जैसी मंडी व्यवस्था व कांट्रैक्ट फार्मिंग एग्रीमेंट लागू करने के लिए प्रेरित करती रही है, अब उसके रूख मे आये बदलाव का कारण सामान्य बुद्धि की समझ से परे है.

"वन नेशन वन टैक्स" व "दूसरी आजादी" के रूप मे बहुप्रचारित केंद्र सरकार द्वारा 1 जुलाई 2017 से लागू किये गुड्स एण्ड सर्विस टैक्स अर्थात जीएसटी कानून बनने की प्रक्रिया की चर्चा कर लेते हैं.राज्य सूची का विषय होने से मालों के क्रय विक्रय पर नियंत्रण व टैक्स लगाने का अधिकार राज्यों का होता था,तदनुसार सभी राज्य विक्रय कर,वाणिज्यिक कर, वैट या प्रवेशकर वसूल करते थे.सभी राज्यों के अपने अपने कराधान कानून प्रचलित थे.पूरे देश मे एक समान कर व्यवस्था लागू करने के लिए केंद्रीय कानून बनाने की जरूरत महसूस होने पर प्रथमतः संविधान मे संशोधन कर ट्रेड या व्यापार को समवर्ती सूची मे सम्मिलित करने के बाद केंद्रीय जीएसटी एक्ट बनाया गया,हू ब हू केंद्रीय एक्ट की तरह का जीएसटी का माडल एक्ट राज्यों को उपलब्ध कराया गया, जिसे विधान सभाओं से पारित कराया, तब जाकर पूरे देश मे एक समान जीएसटी व्यवस्था लागू होने का मार्ग प्रशस्त हो सका.

केंद्र सरकार यदि पूरे देश में एक समान मंडी व्यवस्था व अनुबंध खेती विषयक कानूनी प्रावधान लागू करना चाहती थी, तो उसे प्रथमतः संविधान में संशोधन कर कृषि व बाजार विषय को समवर्ती सूची मे सम्मिलित करना था, इसके बाद ही इन कानूनों को बनाने के लिए अग्रसर होना था,लेकिन मुकेश अंबानी जी अगस्त माह मे 'फ्यूचर ग्रुप' का रिटेल व्यापार श्रंखला खरीद चुके थे, उधर अडानी जी पंजाब, हरियाणा सहित देश के सभी हिस्सों मे विशाल भंडार गृहों का निर्माण कर चुके थे,ऐसी सूरत मे फिजूल की कानूनी कवायत मे पड़कर समय गंवाना उचित नहीं समझा गया होगा. बड़े लोगों की बड़ी बातें आम आदमी के भेजे मे घुसती भी तो नहीं हैं.

अब इस बात का पूर्वानुमान लगाया जावे कि केंद्र के जिम्मेदार अफसरों व विधि सलाहकारों ने,इस कानूनी अड़चन का कुछ तो तोड़ जरूर निकाला होगा. ऐसा लगता है कि, केंद्र ने समवर्ती सूची मे सम्मिलित निम्न प्रविष्टि/विषयों की आड़ लेकर उक्त कानून बनाने का फैसला किया है :
Entry no. (33) Trade and Commerce in, and the production, supply and distribution of;
(a) the products of any industry where the control of such industry by the Union is declared by Parliament by law to be expedient in the public interest, and and imported goods of the same kind as such products.
(b) foodstuff, including edible oilseeds and oils
 (c) cattle fodder,including oilcakes and other concentrates,
(d) raw cotton,whether ginned or not ginned , and cotton seed and,
(e) raw jute

जहां तक कांट्रैक्ट फार्मिंग संबंधी कानून बनाने का प्रश्न है, कांट्रैक्ट या अनुबंध, समवर्ती सूची मे अवश्य शामिल है,लेकिन कृषि भूमि को उससे पृथक रखा गया है,इसलिए केंद्र, कांट्रैक्ट फार्मिंग से संबंधित विधिक व्यवस्था प्रवृत्त करने मे सक्षम नहीं है,इसीलिए Indian Contract Act कृषि भूमि से संबंधित एग्रीमेंट हेतु प्रयोज्य नहीं है. समवर्ती सूची की प्रविष्टि क्र.(7) निम्नानुसार अवलोकनीय है :
Entry no. (33) Contract including partnership, agency,contract of carriage and other special forms of contracts, but not including contracts relating to Agricultural land.

केन्द्र को मंडी व कांट्रैक्ट फार्मिंग पर कानून बनाने का कोई अधिकार नहीं

भारत के संविधान व अन्य किसी भी कानून में खेती को 'व्यापार' या ट्रेड नहीं माना गया है, किसान द्वारा अपने खेत मे पैदा की गई कृषि जिंसों का विपणन किया जाना 'मार्केटिंग' के अंतर्गत अधिमान्य है,यह गतिविधि किसी भी तरह वस्तुओं के क्रय विक्रय या 'ट्रेडिंग' गतिविधि नहीं मानी जा सकती है.अतः मेरे मतानुसार केंद्र को मंडी व कांट्रैक्ट फार्मिंग पर कानून बनाने का कोई अधिकार नहीं था,इन कानूनों को न्यायालय मे चुनौती दिये जाने पर सुप्रीम कोर्ट इन्हें असंवैधानिक घोषित कर सकता है.जिस विषय पर केंद्र को कानून बनाने का ही अधिकार न हो तो राज्य सरकारें उन्हें मानने के लिए बाध्य नहीं हैं.राज्य सरकारें अनुच्छेद 131 के अधीन सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सूट फाईल कर संघीय ढ़ांचे को कमजोर करने वाले इन कानूनों की संवैधानिकता का परीक्षण करने के लिए अनुरोध कर सकती हैं.

अन्य उपाय

प्रसिद्ध विधिवेत्ता, भाजपा के वरिष्ठ नेता व तत्समय राज्य सभा मे विपक्ष के नेता रहे स्व.अरूण जेटली जी ने 2013 में लिखे एक ब्लॉग में 'भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के प्रावधानों को निष्प्रभावी बनाने के लिए राज्यों को यह सुझाव दिया था कि वे संविधान के अनुच्छेद 254(2) का उपयोग करते हुए अपना अलग कानून बना सकते हैं. यहां यह उल्लेखनीय है कि,अनुच्छेद 254(2)  के मुताबिक  समान विषय पर केंद्र का नया कानून आने पर राज्यों का तद्विषयक पूर्व से प्रवृत्त कानून को यदि महामहिम राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हो चुकी हो तो, राज्य के कानून को ही वरीयता मिलेगी.देश के सभी राज्यों के मंडी कानून (APMC Act) राष्ट्रपति से अनुमत्य व पूर्व से प्रवृत्त हैं,अतः नये कृषि कानूनों को निष्प्रभावी करने के लिए राज्य,स्व.अरूण जेटली जी की राय का अनुसरण करते हूए अनुच्छेद 254(2) के प्रावधानों का इस्तेमाल कर सकते हैं.
 
आशंका



अधिक संभावना यही है कि केंद्र ने अधिकार विहीन होते हुए भी मंडी व कांट्रैक्ट फार्मिंग पर कानून बनाने के लिए कृषि उपज के विपणन यानी मार्केटिंग को ट्रेडिंग की परिभाषा मे समाहित करने का प्रयास किया है,यह व्याख्या किसानों के लिए नयी समस्याएं उत्पन्न करेगी. एक बार यदि कृषि को व्यापार व कृषि उपजों के विपणन को ट्रेडिंग मान लिया गया तो अब तक सभी तरह के कर संजाल (Tax Net) से बचाकर रखी गयी कृषि पर आयकर व जीएसटी सहित तमाम टैक्स निरूपित करने का मार्ग प्रशस्त हो जायेगा.अनेक अर्थशास्त्री लंबे समय से कृषि पर आयकर लगाने की वकालत करते रहे हैं, क्या सरकार इन अर्थशास्त्रियों की दलीलों से सहमत होकर किसानों को 'करदाता' बनाने की सौगात देने पर विचार कर रही है?
         
व्ही.एस.भदौरिया