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जन्मदिनः मिर्जा गालिब, यानी मिर्जा असद -उलाह बेग खां

जन्मदिनः मिर्जा गालिब, यानी मिर्जा असद -उलाह बेग खां

‏बचपन में जिस मोहल्ले में रहता था वहीं नज़दीक मस्जिद और मदरसा थे मेरे कुछ मुस्लिम दोस्त स्कूल के साथ साथ मदरसा भी जाते । जवानी आते आते इशिकया शेर शायरी का शौक़ चढ़ने लगा सोचा उर्दू पढ़ लूँ शेर शायरी आ जायेगी ,पर बामन का बेटा मदरसा जाकर कैसे पढ़ता ? सो उर्दू का ज्ञान पाने का इरादा धरा रह गया । उस पर बाई यानी मॉ कहती रहती थी ....

"पढ़े फ़ारसी  बेचे तेल

ये देखो क़िस्मत के खेल"

ख़ैर क़िस्मत कम्बख़्त जिसे मैं हरिशंकर परसाई जैसे की संगत में ख़ारिज कर चुका था , काम नहीं आई पर शेर शायरी का भूँक उतरा नही और मुझे खुसरो ,ग़ालिब , फ़ैज़ , मीर , कैफी आज़मी ,  अली सरदार जाफ़री , निदा फ़ाज़ली बशीर बद्र , दुष्यंत कुमार , राजेश रेड्डी जैसे  शायरों की किताबों और सूरज राय सूरज जैसे दोस्तो की सोहबत मिल गई और बंदा बिगड गया। ग़ालिब साहब बजा फ़रमा गये 

इश्क़ ने कम्बख़्त ग़ालिब  निकम्मा बना दिया , वरना आदमी तो हम भी थे काम के " 

अपनी खरी - खरी और साफ़गोई की आदत से जब लोगो को बैचेन ,बेअदब होते देखा तो फिर ग़ालिब , दुष्यंत याद आये - 

बक़ौल ग़ालिब 

हरेक बात पे कहते हो की तू क्या है 

तुम्हीं कहो की ये अंदाज़े गुफ़्तगू क्या है ।

बक़ौल दुष्यंत कुमार 

हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग 

रो रो कर कहने की आदत नही रही 

हमने तमाम उम्र अकेले सफ़र किया 

हम पर किसी खुदा की इनायत नही रही ।

उर्दू हिन्दी की जिस पंरपरा से छनकर आज ग़ज़ल लिखी जा रही है उसमें दुष्यंत कुमार हैं जो कहते है -

 " रोने गिड़गिड़ाने का यहाँ कोई असर होता नहीं , 

पेटभर गालियाँ दो जी भर बद्दुआ 

या फिर निदा फ़ाज़ली है जो कहते हैं " सारे दिन भगवान के ,क्या जुम्मा किया पीर

जिस दिन सोये  देर तक भूखा रहे फ़क़ीर ।

जावेद अख़तर कहते हैं -

किसी ने कर ली है सूरज की चोरी 

आओ किरण किरण इकट्ठा करे 

और एक नया सूरज बनाये "

मेरा दोस्त सूरज राय सूरज कहता है --

चेहरों पर मुस्कान , दिलो मे लेके खाई बैठे है , कर के सारे लोग , हिसाब -

ए-पाई पाई बैठे हैं । आज वसीयत करने वाले हैं बाबूजी ,

दौलत की , पहली बार इकट्ठे घर में भाई बैठे हैं । 

या खुदा न राम राज आए कभी 

वर्ना हर सीता को छोड़ा जाएगा ।

इस दौर के सबसे मशहूर शायरों मे से एक बशीर बद्र का शेर है - अजीब शक्स है नाराज़ हो के हँसता है , मै चाहता हूँ ख़फ़ा हो तो वो ख़फ़ा ही लगे ।

"दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे ,

जब कभी हम दोस्त हो जाये तो शर्मिंदा ना हो ।

बहुत सारी ग़ज़लों की किताब पढ़ते हुए पिछले दिनों मेरे हाथ 

  " ग़ज़ल दुष्यंत के बाद " संपादक दीक्षित दनकौरी , संकलन मोईन अख़तर अंसारी की दो वाल्यूम मे प्रकाशित ये पुस्तक लगी इसेपढ़ते हुए लिए गये कुछ नोट सब ग़ज़ल प्रेमी मित्रों के लिए  शेयर कर रहा हूँ ताकि मित्र गणों मे ग़ज़ल की समझ और गहरी हो सके । 

दुष्यंत के बाद

हिन्दी गजल भी खुसरों से प्रारंभ होकर  वर्तमान युग तक पहुंची तथा दुष्यन्त कुमार ने उसे हिन्दी के काव्य क्षेत्र में एक विषिष्ट विधा के रूप में प्रतिष्ठित करने का श्रेय प्राप्त किया। 

मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूं

वे गजल आपको सुनाता हूं

गजल अपने कथ्य के साथ-साथ अपने शिल्प के कारण ही लोकप्रियता की उंचाईयों तक पहुंची है। इसमें इसकी गेयता के गुण का भी बहुत बड़ा हाथ है। कथ्य और षिल्प के सुन्दर तालमेल से ही एक सही गजल जन्म लेती है। जब हम सही मीटर में गजल कहने का प्रयास करते हैं तो शब्दों का रख-रखाव और संयोजन स्वतः ठीक हो जाता है, फालतू शब्दों की घुसपैठ रूक जाती है, भाषा का प्रवाह सहज हो जाता है और गजल की गेयता सुनिशिचत हो जाती है। विचार काफियों के इर्द-गिर्द घुते हैं। काफिया शेर का चरमोत्कर्ष है, जिस पर आते ही और उसके निहितार्थ या व्यंग्यार्थ को समझते ही श्रोता अथवा पाठक चमत्कृत एवं विमुग्ध हो उठते हैं। कविता को जन-जन तक पहुंचाने के लिए गजल एक सषक्त माध्यम है। गजल की एक लम्बी परम्परा रही है उसमें दुष्यन्त कुमार ही नहीं रहे, मीर, गालिब तथा अनेक बड़े शायर भी रहे हैं। 

गजल बहुत लोकप्रिय काव्य शैली है वह छोटे-छोटे शेरों में एक-एक चुटीली बात कहती हुई चलती रहती है, जहां चाहे जा सकती है और जहां चाहे रूक सकती है। उसके शेर प्रायः सूक्तियां बन जाते हैं और श्रोता वाह-वाह कह उठते है। इसलिए कई गजलकार संवेदना की सहज अभिव्यक्ति के स्थान पर चमत्कारपूर्ण बात कहने के लिए कठिन व्यायाम करते हैं। गजल में ज्यादा इसलिए होता है कि उसका सम्बंध मंच से होता है। गजल मंच पर तालियां चाहती है।

गालिब के यहां भी अलिफ के काफिए के कई प्रयोग हैं, मसलन -

दिल-ए-नादाॅ तुझै हुआ क्या है

आखिर इस दर्द की दवा क्या है

गजल दिल से पसन्द किया जाने वाला शायरी का एक खूबसूरत रूप, काव्य की एक लोकप्रिय विधा है जिसने जज्बात को अल्फाज दिए है और मैं भावाभिव्यक्ति का सुहाना माध्यम बनी। हिन्दुस्तान में जिन भाषाओं, बोलियों को मान्यता है, उनका सौन्दर्य, उनका लालित्य गजल में है। हिन्दुस्तानी गजल के शेरों की ताजगी अमिट है, भावानुभूति-प्रधान, पे्ररणादायक, यथार्थपरक, बहुआयामी शब्दों वाले अविस्मरणी है गजल के शेर। 

मैं गजल हूं-हिन्दुस्तान की मिली-जुली संस्कृति का सुहाना प्रतीक। तेरहवीं सदी ईस्वी में मेरे शायर अमीर खुसरो ने पहली बार मुझे हिन्दुस्तानी लिबास दिया-

सखी पिया को जो मैं न देखूं, तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां

किसे पड़ी है कि जो सुनावे, पियारे पी को हमारी बतियां

न नींद नयना, न अंग चैना, न आप आवै, न भेजें पतियां

मैं प्रीत मनके दुराए राखूं, जो जाए पाउं प्रिया की खतियां


सरफरोषी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है जोर कितना बाजु-ए-कांतिल में है


मौलिकता अपनी अलग चमक रखती है। नक्ल अंततोगत्वा नक्ल है, खोट है। सच या झूठ छुपा नहीं रहता। असली के आगे नकली को नीचा ही देखना पड़ता है। ऐसे लोगों का कहीं कोई मान नहीं रहता। मेरे रचनाकार दुष्यन्त कुमार ने ऐसे लोगों के लिए ही कहा है-

उनका कहीं जहां में ठिकाना नहीं रहा

हमको तो मिल गया है अदब में मुकाम और

अदब अर्थात साहित्य में कोई स्थान पाना है तो मुझे मौलिक तथा शाष्वत रूप में ही पेष करते जाना होगा। मेरे नए रचनाकारों को चाहिए कि मेरे शेरों पर मनन करें, मेरी ग्रामर को जानें, मुझे समझें, मेरी शास्त्रीयता का ध्यान रखें। किसी के ख्याल तथा शेर को अपना न बनाएं, जो भी लिखें वह मौलिक हो, स्वरचित हो। 

भारत में सर्वप्रथम अमीर खुसरो ने गजल के क्षेत्र में पर्दापण किया तथा उर्दू में वली को प्रथम गजलकार माना जाता है। तेरहवीं शताब्दी में सूफी गजलकार जब-’जेहाले मिसकी मकुन तमाफुल, दुराय नैना बनाय बतिया। किताबे हिजराॅ न दारम-ए-जाॅ, न लेहु काहे लगाय छतियाॅ जैसा शेर कहकर ब्रजभाषापन का पुट गजल में लेते दिखाई दिए तो ’हमन का इष्क मस्ताना, हमन को होषियारी क्या’ कहकर संत कबीर ने अपने फक्कड़पन और सधुक्कड़ी भाषा का परिचय दिया। 

ग्जल को प्रगतिशील  रंग देने वाले गजलकारों में सरदार जाफरी, कैफी आजमी, साहिर ’लुधियानवी’ आदि ने भी इसे समृद्ध रूप प्रदान करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। आजादी की जंग में शामिल होने वाले गजल के शायरों में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह खाॅ आदि के नाम भी सम्मानपूर्वक लिए जाते हैं। 

गजल को दार्शनिक  स्पर्ष देने वाले गजलकारों में ’फिराक’ गोरखपुरी का बहुत सहयोग रहा। इसी परम्परा के शायर श्री कृष्णबिहारी ’नूर’ भी हैं। इधर बषीर ’बद्र’ ’वसीम’ बरेलवी जैसे अन्य शायरों ने भी गजल को समृद्ध  किया। 

आज गजल हिन्दी की नहीं तमाम भारतीय भाषाओं में कही जा रही है और जाहिर है  कि वह सिर्फ ’औरत से बातचीत’ नहीं है। यहां तक कि अंग्रेजी में भी गजलें कही जा रही हैं। इग्लैंड के अनेक कवि मसलन-ब्रियान हेनरी, डनियल हाल और शेरोन ब्रियान बाकायदा अंग्रेजी में गजलें कह रहे हैं। उर्दू की ’शाइर’ (मुम्बई) पत्रिका ने इनकी गजलें छापी है। हमारे अपने देष के संदर्भ में गजल ने बहुत सेक्युलर भूमिका अदा की है। जहां भाषा को धर्म से जोड़ा जा रहा हो वहां एक भाषा की पारम्परिक विधा को हर क्षेत्र और भाषा के रचनाकार अपना लें, यह एक स्वागत योग्य कदम है। 

और अंत मे मिर्ज़ा ग़ालिब एक स्वानही मंजरनामा - गुलज़ार को पढ़ते हुए -आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक , कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक "

बक़ौल गुलज़ार " मैं अक्सर कहा करता हूँ , ग़ालिब के हाँ तीन मुलाजि थे , जो हमेशा उनके साथ रहे । एक कल्लु थे , जो आख़िर दम तक उनके साथ रहा , दूसरी वफ़ादार थी , जो तुतलाती थी और तीसरा मै था । ये दोनो तो अपनी उम्र के साथ रेहीई पा गए , मैं अभी तक मुलाजिम हूँ ।