लोकतंत्र में जनता की वापसी होना चाहिए

लोकतंत्र में जनता की वापसी होना चाहिए

ध्रुव शुक्ल

कितनी बार देख चुका कि सारे आम चुनाव देश की जनता को पराजित करने के लिए होते हैं। वह हर बार हार जाती है। सत्ता में राजनीतिक दलों की वापसी तो होती रहती है पर लोकतंत्र में जनता की वापसी नहीं होती। उसका मूल कारण भी साफ नज़र आता है।

चुनाव में विजय पाने के लिए जनता के बीच एक नकली लड़ाई छेड़कर उसे हिन्दू,मुसलमान,अगड़ी-पिछड़ी,ऊँची-नीची कोटियों में बाँटकर सत्ता हथिया ली जाती है। टुकड़ों में बँटे उसके सत्ताप्रेमी नकली प्रतिनिधि  बड़े मज़े-से सत्ता में हिस्सेदार होकर जनता को बेदखल कर देते हैं। यह टुकड़ों में बँटी जनता राजनीतिक दलों की घृणा के बाज़ार में मन मसोसकर रह जाती है। 

यह खेल जनता के नाम पर ही खेला जाता है और अब यह इतना वैश्विक हो गया है कि जनता की भलाई के नाम पर बाज़ार में देश के उन संसाधनों की बोली लगाई जा रही है जिनके बिना किसी की रोज़ी-रोटी नहीं चल सकती-- जनता देश के जल से दूर,जनता देश की माटी से दूर,जनता देश के वन से दूर, जनता अपने हुनर से दूर और भेदभाव इतना कि जन ही जन से दूर रहकर अपना-अपना स्वार्थ साधकर जीने की व्यर्थ कल्पना कर बैठे हैं। यह कल्पना लोकतंत्र का विनाश कर रही है। सिर्फ पैसे की ताक़त पर अकेले जीवन काट लेना मूर्खता है।  सबके साथ ही जीने की कला विकसित होती है।


लोग सत्ताकामी विचारशून्य नेताओं और लुटेरे व्यापारियों से ही पराजित करने की विधियाँ सीखकर सबके साथ रहना भूलते जा रहे हैं। वे अकेले रहकर जैसे-तैसे अपने जीवन को भले ही बचाते रहें पर सबका देश मर रहा है। जनता को पराजित करके अपनी-विजय सुनिश्चित करती राजनीति के बीच लोकतंत्र में उस जनता की वापसी होना चाहिए जो इस विभाजनकारी राजनीति को ही अपदस्थ कर सके। 

इसके लिए यही आवश्यक होगा कि जनता अपने बीच से अपने नायक रचे और राजनीतिक दूकानों पर बिकने वाले ब्राण्डेड नेताओं को त्यागे। इसके लिए आत्मबल से परिपूर्ण निर्भयता ही काम आ सकती है। अभय हमेशा सत्य के इतने करीब होता है कि अगर व्यापक जीवन के सुख की खातिर मरना पड़े तो अपने मरने का कोई ग़म नहीं होता। पृथ्वी पर कोई विश्वगुरू नहीं, जीवन ही गुरू है, वही सिखाता है।