breaking news New

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - स्त्री सत्ता पर पुरूषों का कब्जा

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - स्त्री सत्ता पर पुरूषों का कब्जा

-सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के चेरा ग्राम में सरपंच पति सहित कुछ दबंगों ने मिलकर पंडो जनजाति के आठ लोगों की तालाब से मछली चोरी के आरोप में बेदम पिटाई कर उन पर पंचायत की ओर से 35-35 हजार रुपये का अर्थदंड आरोपित किया। कहने को हमारे देश में पंचायती राज व्यवस्था लागू है जिसमें महिलाओं को आरक्षण मिला हुआ है और वे चुनकर पंच, सरपंच, जनपद सदस्य, अध्यक्ष जिला पंचायत सदस्य/अध्यक्ष तक बनती है। नगरीय प्रशासन में भी महिलाएं आरक्षण के कारण पार्षद से लेकर महापौर के पद पर काबिज हैं। विधानसभा, लोकसभा सभी जगहों पर महिला प्रतिनिधि हैं। कुछ महिलाओं को छोड़ दें तो अधिकांश जगह उनकी सत्ता और पद को अप्रत्यक्ष रूप से उनके पति, पुत्र या कोई पुरूष सत्ता का प्रतिनिधि ही धारित करता है। सरपंच पति, पार्षद पति, विधायक पति, मंत्री पति और न जाने कितने-कितने नामों से ये संबोधित होते हैं। पुरुष सत्तात्मक समाज व्यवस्था और मानसिकता के कारण अभी भी हमारी लोकसभा, विधानसभा में देश की आधी आबादी यानी महिलाओं को बराबरी का आरक्षण नहीं मिला है। इस समय हमारी लोकसभा की 542 सीटों में से 78 सीटों पर ही महिला सांसद है यानि आधी आबादी के हिस्से में मात्र 14 प्रतिशत सीटें ही हैं।

अभी हाल ही में सोनी लाईव ओटीटी प्लेटफार्म पर एक सीरिज महारानी के नाम से आई है। बिहार की पृष्ठभूमि पर लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की कहानी के यथार्थ स्वरूप और सौंदर्य को बदलकर कल्पना की ऐसी फैंटेेसी रची गई है जो जमीनी हकीकत से परे पति के स्थान पर पति की मर्जी से मुख्यमंत्री बनकर रानी से महारानी बनकर बहुत जल्दी प्रदेश की सत्ता और राजनीति का संचालन करने लगती है। अपने पति को सत्ता से बाहर कर जेल का रास्ता दिखाने वाली महारनी सिनेमा के पर्दे पर तो दिख सकती है किन्तु जमीनी सच्चाई बिल्कुल इससे अलग है। कांग्रेस की सरकार ने जिस तरह पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत करने और महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य से भारत में पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना 24 अप्रैल 1992 से की गई और इसी के साथ 73वें एवं 74वें संवैधानिक संशोधन के अनुसार पंचायतों एवं शहरी निकायों को सरकार का दर्जा प्राप्त हुआ। पंचायती राज अधिनियम 1993 लागू किया। 33 प्रतिशत आरक्षण का लाभ पाकर बहुत सी महिलाएं पंचायत की सत्ता पर कहने को तो काबिज हुई किन्तु सत्ता के सूत्र और सारा कामकाज का निर्णय उनके बदले उनके पति, पुत्र या कोई पुरूष ही लेता रहा। अमूमन यही हाल नगरीय सत्ता और विधायिका का भी है। कहने को वहां महिलाओं का प्रतिनिधित्व है परन्तु उसका संचालन नेपथ्य या प्रत्यक्ष रूप से पुरूष ही कर रहे हैं। किसी स्त्री को रानी, महारानी की उपाधि देना अपने आपमें एक पुरूषवादी मानसिकता की ही सोच है। अमेरिका जैसे देश में भी सालों साल बाद में महिलाएं सत्ता के शिखर के पास तक पहुंची है। अमेरिकन राष्ट्रपति का पद अभी भी उनकी पहुंच से दूर ही है। ऐसा भी नहीं है कि पंचायतीराज संस्थाओं में महिलाओं की सक्रिय हिस्सेदारी से परिदृश्य में बदलाव नहीं आया हो। बहुत सी पंचायतों और नगरीय संस्थाओं में महिलाओं का नेतृत्व उभरकर सामने आया है। बिहार, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं में 2009 से 33 प्रतिशत आरक्षण को बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया है। बाद में अन्य राज्यों में भी 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई है। इस समय 20 राज्यों में पंचायती राज व्यवस्था में 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था लागू है। छत्तीसगढ़ में इस समय पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी 54 प्रतिशत है। राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में जहां पंचायतों में निर्वाचित महिलाएं खुलकर शासन नहीं कर पाती वहीं छत्तीसगढ़ में विशेषकर आदिवासी क्षेत्रों की पंचायतों में महिलाएं बढ़चढ़कर अपने पद और दायित्व का निर्वाह कर रही है। पहली बार निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों में थोड़ी झिझक अवश्य होती है किन्तु धीरे-धीरे पंचायत में होने वाली बैठकें, गलत प्रस्तावों का विरोध आदि के चलते उनका आत्मविश्वास बढऩे लगता है। सरकार ने महिलाओं के नेतृत्व को मजबूत करने के लिए पंच, सरपंच पतियों की पंचायत की बैठकों में उपस्थिति प्रतिबंधित की है। पंचायत की कार्यवाही रजिस्टर में महिला प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर अनिवार्य किये हंै। पंचायतों में दौरे पर जाने वाले सरकारी अमले को सीधे निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों से ही बातचीत करने के निर्देश हंै। सारी हिदायतों, नीति-निर्देशों के बावजूद अभी भी 15 से 20 प्रतिशत पंचायतों में पतियों का ही शासन है। दरअसल, यह सब उसी मानसिकता ही उपज है जिसे हमें पितृ सत्तात्मक समाज या पुरूष प्रधान समाज की मानसिकता कहते हैं। औरतें पढ़-लिखकर, जीवन अनुभव, आर्थिक स्वावलंबन संघर्ष से सदियों की दास्ता से मुक्ति का मार्ग खोज रही हंै। औरतों का यह संघर्ष कठिन जरूर है किन्तु नामुमकिन नहीं।

पुरूष सत्तात्मक या कहे पितृ सतात्मक समाज में हमेशा से महिलाओं को व्यवस्था से अलग देखने की कोशिश होती रही है। कभी भी किसी स्त्री को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में स्वीकार करने की हिम्मत पुरातन पंथी समाज में नहीं हुई।

हम कितनी ही समानता की बातें क्यों ना करें किन्तु बलरामपुर जि़ले की ग्राम पंचायत चेरा की घटना ने हमें यह एहसास कराया है कि समाज के दबंग लोगों का नज़रिया गरीब आदिवासी और स्त्रियों के प्रति वैसा ही जैसा सामंतवादी सोच रखने वालों का। अपनी तमाम नेतृत्व क्षमता और आरक्षण व्यवस्था के बावजूद आज भी महिलाओं और अनुसूचित जाति जनजाति के लोगों की बहुत सी समस्याएं यथावत है। महिलाओं के समक्ष जन्म से जीवन पर्यंत समस्याएं रहती है। भ्रूण हत्या से लेकर, भेदभाव, घरेलू हिंसा अवसरों की अनदेखी यौन उत्पीडऩ, बलात्कार इत्यादि कई ऐसी स्थितियां हैं जहां महिलाओं के अधिकारों का हनन हो रहा है। दहेज, हत्या, बलात्कार, बाल विवाह, हिंसा किसी निर्णय में सलाह न लेना स्त्रियों की गरिमा पर सीधा प्रहार है। बहुत बार पितृ सत्तात्मक समाज में पुरुष स्त्री को अपनी संपत्ति मानता है और यह नहीं मानता कि उसके ही समान स्त्री की भी भावनाएं हो सकती है। बहुत सारे पुरुष के लिए एक महिला उसकी रसोईया, उसके घर की नौकरानी, उसके परिवार या वंश को आगे बढ़ाने के लिए प्रजनन का साधन है और उसके सौंदर्य बोध को संतुष्ट करने के लिए एक सुंदर ढंग से सजी गुडिय़ा है।
महिलाओं के प्रतिनिधित्व और नेतृत्व क्षमता को विकसित करने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि सरकार की तरफ से नियमित तौर पर इस बात की जांच की जानी चाहिए कि क्या महिला प्रतिनिधि अपना काम स्वयं कर पा रही है या नहीं? क्या उन्हें किसी तरह से सपोर्ट, ज्ञान तथा कौशल की आवश्यकता है जिससे वे अपना काम और आसानी से कर पाएं? इसके लिए सिस्टम ऐसा हो, जहां सरकार की तरफ से महिला प्रतिनिधियों के साथ चर्चा और उनका फीडबैक होता रहे और साथ ही आवश्यकतानुसार नियमित सुधार भी होता रहे।