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बच्चों के सपनों को साकार करने में अहम योगदान

बच्चों के सपनों को साकार करने में अहम योगदान


दंतेवाड़ा। 'मेरे जन्मदिवस को मनाने से अच्छा है आज के दिन को अध्यापक दिवस के रूप में मनाया जाए'  भारत रत्न से सम्मानित और भारतवर्ष के प्रथम उप-राष्ट्रपति और दुसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का ये कथन सार्थक होने के बाद देश में ये दिन अध्यापक दिवस के रूप में मनाया जाता है। तिरुमनी, मद्रास (चेन्नई) में जन्मे डॉ. राधाकृष्णन हिन्दू शास्त्रों के गहरे जानकार थे, उनका मानना था कि भारतीय संस्कृति धर्म, ज्ञान और सत्य पर आधारित है जो प्राणी को जीवन का सच्चा सन्देश देती है। उनका मन इस विचार के लिए भी दृढ़ था कि ’’पुस्तकें वो साधन हैं जिनके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकते हैं’’।

भारत में अध्यापक दिवस सर्वप्रथम 1962 को मनाया गया। इस दिन शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे और इस क्षेत्र में उत्कृष्ट काम करने वालों को पुरस्कृत किया जाता है। सभी के जीवन में ये समय काफी महत्वपूर्ण होता है जब वो छात्र होते हैं। यदि आप अभी उस समय से गुज़र रहे है तो हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी आप ज़रूर अपने अध्यापक के लिए फूल या कक्षा को सजाने जैसे कार्यों में लिप्त होंगे और यदि आप इस समय से आगे निकल आये हैं तो आज का दिन आपकी यादों में ज़रूर होगा कि किस तरह से आप इस दिन को मनाया करते थे। चाहे वो अध्यापक से न पढ़ने की जिद हो या उन्हें उपहार देने की ख़ुशी। आज का ये दिन छात्र और अध्यापक के लिए हर्ष और उल्लास से भरा हुआ होता है।

वर्तमान परिस्थिति में जब देश में कोरोना महामारी की वजह से विद्यालय बंद हैं। कई जगह विद्यालय भी खुल गए हैं ऐसे में इस दिन को मनाने के तरीकों में भी बदलाव देखा जा सकता है। जहाँ वर्चुअली पढ़ाई के साथ छात्र अध्यापक दिवस की बधाई कम्प्यूटर व मोबाइल के माध्यम से भेज रहें है। सभी छात्र अपने-अपने घरों में ही रहकर अपने अध्यापक का धन्यवाद कर रहे हैं। आज के परिवेश में एक अध्यापक की भूमिका किसी बालक से लेकर एक किशोर तक के लिए किसी जनक से कम नहीं है। वो अध्यापक ही होता है जो व्यक्ति के जीवन के पहले पाठ उसे सिखाता है जो आजीवन उसके साथ ही रहते है शिक्षक हमे सफलता की राह पर ले जाने की पूरी कोशिश करते हैं ताकि हम जीवन में आगे बढ़ते रहें। अध्यापक ही एक व्यक्ति के जीवन को एक दिशा प्रदान करता है वे हमें पढ़ाते हुए हमारे अंदर व्यक्तित्व, विश्वास और कौशल को सुधारकर हमें इस काबिल बनाते हैं कि आने वाली समस्याओं का सामना कर सकें।

आज के परिवेश में अध्यापक के कार्यों में या पढ़ाने के तरीकों में विविधता देखना कोई नयी बात नहीं है। बदलाव की आवश्यकता में अध्यापकों ने भी अपने पढ़ाने के तरीकों में बदलाव किये हैं। उदाहरण के लिए इस आपात स्थिति में जब सम्पूर्ण देश मानो ठहर सा गया तब भी अध्यापकों ने शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक विद्यार्थी के घर तक शिक्षा पहुँचाने के साधन तलाश लिए। पढ़ई तुंहर दुआर जैसे कार्यक्रम चला कर सरकार ने भी पूरी ताकत झोंक दी ताकि छात्रों की पढाई पर कम से कम असर हो।

एक अध्यापक से कार्य की गंभीरता हम इसी बात से समझ सकते है कि सब कुछ थम जाने पर भी शिक्षा का प्रवाह नहीं थम पाया। एक छात्र और अध्यापक के सम्बन्ध को अभिभावक के सम्बन्ध से भी तोला जा सकता है, शायद यही कारण है कि अभिभावक भी नौनिहालों को बिना चिंता के एक अध्यापक के हाथों जीवन निर्माण के लिए समर्पित कर देते हैं। एक अच्छा अध्यापक हमेशा अपने छात्रों के रुचि को देखते हुए उनकी क्षमताओं को पहचान कर उनको निखारने की शिक्षा देता है।