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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -कोविड सेंटरों, अस्पतालों का खाली रहना अच्छे संकेत

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -कोविड सेंटरों, अस्पतालों का खाली रहना अच्छे संकेत

-सुभाष मिश्र
यही वह समय है जब भरोसेमंद स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार किया जाये। सरकारों ने शिक्षा और सेहत के क्षेत्र में कम ध्यान देकर दीगर क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान दिया। हमने इस लोक की बजाय परलोक की ज्यादा चिंता की। यही वजह है कि हमारा ध्यान अस्पताल-स्कूल बनाने की बजाय मंदिर-मस्जिद बनाने में ज्यादा रहा। हमने अस्पतालों, स्कूलों पर उतना पैसा खर्च नहीं किया जितना हम आदमकद प्रतिमाओं, भव्य भवनों पर खर्च कर रहे हैं। अब जब कोरोना के सामने ईश्वर-अल्लाह भी असहाय नजर आ रहे हैं तब हमें अस्पतालों की, डाक्टरों की, कोरोना वारियर्स की याद आ रही है। कोरोना महामारी ने हमारी स्वास्थ्य सुविधाओं और उसके इन्फ्रास्ट्रक्चर की पोल खोल कर रख दी है। हेल्थ केयर के क्षेत्र में बहुत ही बुरी स्थिति सामने आई जहां हमने लोगों को आक्सीजन के लिए दम तोड़ते देखा। अस्पतालों में बिस्तर के लिए भटकते देखा। स्वास्थ्य के जर्जर ढांचे की तस्वीर सभी जगह दिखाई दी। अब समय आ गया है कि हेल्थकेयर के क्षेत्र में पेशेवरों को महत्व दिया जाए। तीसरी लहर सुनामी न बने इसके लिए आपदा प्रबंध के सारे उपाय सुनिश्चित कर लिए जाएं।

कोरोना की पहली लहर में बनाए गए कोविड सेंटरों को कोरोना संक्रमण का प्रभाव कम होने के साथ ही पिछली बार बंद करने की जो गलती पूरे देश में हुई थी, दूसरी लहर के बाद इस गलती को न दोहराया जाये। जैसे-जैसे कोरोना की पॉजिटिव दर कम हो रही है, ताबड़तोड़ तरीके से बनाए गये कोविड सेंटरों में भी अब लोग नहीं आ रहे हैं, यह अच्छे संकेत है। रायपुर, दुर्ग में बनाए गये बहुत से कोविड सेंटर लगभग बंद से हो गए हैं, कुछ जगहों पर ताले भी लग गए हैं। रायपुर के इंडोर स्टेडियम सहित बहुत से कोविड सेंटर लगभग खाली हंै। छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने पिछले अनुभवों से सीख लेते हुए ऐसे सेंटरों में की गई व्यवस्थाओं को यथावत रखते हुए तीसरी लहर की आशंका को ध्यान में रखकर इन्हें अपग्रेड करने का निर्णय लिया है। अभी कोरोना वायरस हमारे देश में गया नहीं है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वायरस संक्रमण की कुल संख्या अब 25,77,2440 है। अभी तक कुल मिलाकर 2,87,122 मौतें हो गई। भारत ने 4,529 लोगों की मौत के साथ एक दिन में सबसे ज्यादा मौत दर्ज की थी। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने कहा कि भारत इस साल के अंत तक 267 करोड़ कोविड वैक्सीन खुराक खरीद लेगा और अपने सभी वयस्क आबादी को टीका लगाने की स्थिति में होगा। मंत्री ने कहा कि 51 करोड़ कोविड-19 वैक्सीन की खुराक जुलाई तक और 216 करोड़ अगस्त से दिसंबर के बीच उपलब्ध कराई जाएगी। अभी भी करीब तीन लाख लोग प्रतिदिन पॉजिटिव हो रहे हैं। देश में एक दिन में 3874 मौतें भी दर्ज की गई है।

गांवों के स्तर पर अभी भी लोगों की जांच होना शेष है। बहुत से गांव ऐसे हैं जहां स्वास्थ्य सेवाएं नहीं के बराबर हैं। हमने अभी हाल ही में मार्च-अप्रैल और मई के पहले सप्ताह तक लोगों को आक्सीजन, वेंटीलेटर, जीवनदायिनी दवाओं और अस्पतालों में बिस्तर के लिए जूझते और मरते देखा है। स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में बड़ी संख्या में लोगों ने होम आइसोलेशन में रहकर डाक्टरों की सलाह या ऐसे ही अपने अनुभव, जान-पहचान और बहुत से नीम हकीमों के जरिए अपना इलाज कराया है। केंद्र सरकार ने पहली लहर में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के लिए जो बजट प्रावधानित किया था, पीएम केयर्स फंड से जो वेंटिलेटर, सामग्री भेजी थी उसकी गुणवत्ता और उपयोगिता को लेकर भी सवाल उठे हैं। पांच कंपनियों ने 2,332 करोड़ में 58,850 वेंटिलेटर देश भर में सप्लाई की थी। बहुत सारे वेंटिलेटर की गुणवत्ता में कमी के साथ इसके स्पेयर पाट्र्स, सर्विसिंग और उपयोगकर्ता तकनीकी स्टाफ की कमी के कारण इनका ठीक ढंग से उपयोग नहीं हो पाया। बहुत बार लोग आपदा में अवसर तलाशते हैं। जब आपदा का प्रभाव कम हो जाता है तो आपदा के नाम पर खरीदी गई सामग्री किसी कचरे की तरह कहीं पड़ी रहती है। पीएम केयर्स फंड से खरीदे गए वेंटिलेटर्स को लेकर जब देशभर में विवाद की स्थिति निर्मित होने लगी तो अब इसके जांच के आदेश दिए गए हैं। इस तरह की वैश्विक आपदा को लेकर देश में स्पष्ट आपदा प्रबंधन नीति बननी चाहिए। ताकि केंद्र राज्य के बीच टकराव की स्थिति निर्मित न हो और उन्हे अदालतों के आगे गुहार ना करना पड़े।

ऐसा कहा जा रहा है कि आधिकारिक आंकड़े महामारी के वास्तविक प्रभाव को कम करके आंकते हैं। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक संक्रमण और मौतें पांच से 10 गुना अधिक हो सकती हैं। श्मशान-कब्रिस्तान, नदी के तट और नदी में तैरती लाशें बहुत सारी सच्चाईयों को बया कर रही है। भारत में महामारी की पहली लहर, सितंबर में चरम पर थी और शहरी क्षेत्रों में केंद्रित थी। फरवरी में दूसरी लहर ग्रामीण कस्बों और गांवों में फैल गई। जहां देश का लगभग दो-तिहाई हिस्सा है और उन जगहों पर परीक्षण बहुत ही कठिन है। लोगों का कहना है कि गांव के मामले में सरकार केस छिपा रही है। गांवों में न तो टेस्ट की सुविधा है, ना ही इलाज की। ऐसे में यदि कोरोना की तीसरी लहर आती है तो पता नहीं क्या होगा। शहरी क्षेत्रों में जिस तरह से टीकाकरण हो रहा है, उस तरह का टीकाकरण गांवों में नहीं हो रहा है। गांवों में टीकाकरण को लेकर बहुत सी भ्रांति है। टीकों की उपलब्धता के आधार पर गांवों में जन जागृति अभियान चलाकर बड़े पैमाने पर टीकाकरण कराने की जरूरत है। जो अधोसंचरना व्यवस्था कोरोना की दूसरी लहर के समय नहीं है उसे और मजबूत करके स्वामित्व देना होगा।

अभी तक भारत ने केवल 40.4 मिलियन से अधिक लोगों को पूरी तरह से टीका लगाया है। भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के. विजय राघवन ने स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा है कि हमें ये नहीं पता है कि तीसरी लहर कब आएगी, लेकिन हमें कोविड-19 के प्रोटोकॉल को जारी रखते हुए इसके लिए तैयार रहना चाहिए। उनका कहना है कि नए म्यूटेंट से निपटने के लिए वैक्सीन को अपडेट करना ज़रूरी था। अभी कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और बिहार में कोविड के हर दिन सामने आने वाले नए केस में बढ़ोतरी हो रही है। वहीं महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा में संक्रमण से होने वाली मौत के आँकड़े बढ़ रहे हैं।

कोरोना की पहली लहर में जहां सीनियर सिटीजन को ज्यादा खतरा था, वहीं दूसरी लहर में युवा वर्ग ज्यादा चपेट में आया। अब तीसरी लहर में बच्चों को ज्यादा खतरा हो सकता है। पीडियाट्रिक्स और इन्फेक्शन डिसीज के एक्सपर्ट्स का कहना है कि कोरोना की तीसरी लहर 18 से कम आयु वर्ग वालों को तेजी अपने चपेट में ले सकती है, यह काफी गंभीर हो सकती है। हमे सतर्क रहकर भविष्य की तैयारी करनी होगी।