प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-मौका देखो चौका मारो

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-मौका देखो चौका मारो

 
क्रिकेट के मैच में अच्छा बल्लेबाज बॉलर की लुज बाल पर मौका देखकर चौका, छक्का जरूर लगाता है। हमारे यहां कहावत भी है कि मौका देखकर चौका मारना। बहुत सारे लोग हमारे देश में मौको की तलाश में या फिर खुद ही मौका पैदा करके चौका लगाने की फिराक में रहते हैं। यदि यह मौका धर्म, संस्कृति, जात-पात, क्षेत्रीयता, इतिहास आदि के नाम पर हो तो सोने में सुहागा हो जाता है। हालिया घटना में तनिष्क कंपनी के विज्ञापन के बहाने कुछ लोगों, दलों व मीडिया हाउस को जो धर्म, संस्कृति और किसी खास एजेंडे से संचालित होते हैं, उन्हें बैठे ठाले मौका मिल गया अपने-अपने पास छिपी हुई नफरत की तलवारें चमकाने का। ये तलवारें कभी कोरोना संक्रमण फैलाने के नाम पर तब्लीगी जमात के खिलाफ निकलती है, तो कभी पद्मावत, छपाक जैसी फिल्मों के प्रदर्शन के खिलाफ। ऐसे तलवारधारी के पास किसी भी रचनात्मक कलाकृति, लेखन और फिल्म को देखने का अपना एक नजरिया, चश्मा होता है। हमारे देश में ऐसे लोगों को हिन्दू-मुस्लिम एंगल सबसे पहले दिखता है। ये भीड़ तंत्र है, जिसे यदि नियंत्रित नहीं किया गया तो ये किसी के खिलाफ भी फतवा जारी कर सकते हैं। जब फिल्मी जमात पर हमला हुआ तब वह कोर्ट गई, बाकी समय उसने खामोशी ओढ़ ली थी। यही हाल बाकी जगहों पर भी है। विरोध के लिए जो स्वर उठना चाहिए, वे नहीं उठते और भीड़ का दबाव काम कर जाता है।

समाज में बढ़ती असहिष्णुता और कट्टरपन के चलते ही मकबूल फिदा हुसैन जैसे ख्यातिनाम पेंटर को देश छोडऩा पड़ता है। अपनी पीड़ा कहने पर किसी भी मुस्लिम एक्टर को राष्ट्रद्रोही मान लिया जाता है। नवहिन्दुत्ववाद की मशाल के रहनुमा बनकर कंगना रानावत और उन जैसे बहुत से मुखर और मौका परस्त लोग मौका देखकर चौका लगाने में नहीं चूक रहे हैं। करना क्या है, घर बैठकर ट्विट करना है, बार रुम में बैठकर ऐसे एंगल ढूंढना है जो लोगों की भावना को आहत कर दे, लोगों को उत्तेजित कर दे।

इस बार यह चौका तनिष्क कंपनी के नए विज्ञापन के जरिये हाथ लगा है, जिसे तनिष्क कंपनी ने उसी तरह यूट्यूब से हटा दिया जैसा ही इसके पहले बहुत से सिनेमा घंटो से पद्मावत, छपाक जैसी फिल्में हटा दी गई थी। इस देश में बहुत से लोग इसलिए भी गुंडागर्दी करते हैं लोगों को डराते धमकाते हैं क्योंकि उनका विरोध करने के लिए समाज का बहुसंख्यक वर्ग आगे नहीं आता। चुपचाप मौन दर्शक बने अपने घरों में बैठकर यह तमाशा देखता है।

तनिष्क के ताजा वीडियो में सांकेतिक रूप से एक हिन्दू महिला की मुस्लिम परिवार में हुई शादी के बाद गोदभराई की रस्म दिखाई गई है। इस विज्ञापन में मुस्लिम परिवार सभी रस्मों को हिन्दू रीति-रिवाज से करता है। इसके बाद गर्भवती महिला अपनी सास से पूछती है कि मां ये रस्म तो आपके घर में होती नहीं, इस पर उसकी सास कहती है कि लेकिन बेटी को खुश रखने की रस्म तो हर घर में होती है न। वीडियो में हिन्दू-मुस्लिम परिवार की एकजुटता दिखाने की कोशिश की गई है। विवाद के बाद इस विज्ञापन को हटाने वाली तनिष्क कंपनी का कहना है कि प्रमोशन एड्वाटाइजिंग के इस एकात्म अभियान के जरिए इस चुनौतीपूर्ण समय के दौरान विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को स्थानीय समुदायों और परिवारों को एक साथ आकर जश्न मनाने के लिए प्रेरित करना था, लेकिन ये विज्ञापन जनमानस को खुशहाल होने का मौका देने के बजाय मूल मुद्दे से भटक गया।

यहां सवाल यही है कि पूरे देश को मूल मुद्दे से कौन लोग भटका रहे हैं? ऐसे लोगों का उद्देश्य क्या है। लोग ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ते जिससे दोनों समुदाय के बीच वैमनस्मता को बढ़ावा मिले। ये लोग खून का रंग अलग बता सकते हैं, ये हवा को, सूरज, चांद को हिन्दू-मुस्लिम बता सकते हैं।
हमारे देश में कभी बंगलादेशी शरणार्थी कभी रोहिंग्या मुसलमानों के यहां शरण लेने तो कभी तीन तलाक, तो कभी गौरक्षा के मुद्दे पर विवाद की स्थिति निर्मित की जाती है। हाल ही में शाहीनबाग आंदोलन को टारगेट करके भी हिन्दू-मुस्लिम को भड़काने की नाकाम कोशिशे की गई। किन्तु देश की तरक्की, अमन पसंद समाज ने इस साजिश को खारिज कर शाहीनबाग के लोगों के साथ सूर से सूर मिलाया।

इन दिनों सामाजिक जाति और धार्मिक रूप से बहुत तेजी से समाज में धुर्वीकरण हो रहा है। रामजन्म भूमि आंदोलन के दौरान बाबरी मस्जिद ढहाने के बाद एक ऐसा समाज खड़ा हुआ जो उदार हिंदू था, वो कट्टरवादी हिन्दू में तब्दील हुआ। उसी तरह मुस्लिम भी अपने अधिकारों को लेकर कट्टर हुए। समाज में जातियता बहुत बढ़ी और इसको बढ़ावा देने में राजनीति वालों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। अगर हम कहीं की घटना देखते हैं तो अगर स्त्री के साथ बलात्कार होता है, तो वो इस तरह से देखा जाता है की ये दलित है, की सवर्ण है। कोई उसको स्त्री की तरह नहीं देखना चाहता। आने वाला समय रचनात्मक लोगों के लिए उदार मानसिकता वालों के लिए खराब होगा। थोड़े दिन बाद कुछ लोग शायद तय करेंगे की मुसलमान लोग हिन्दू मूर्तियां ना बनाये वो देवियों की मूर्ति ना बनाएं, ये ना बनाये, वो ना बनाये। आप इस दुकान से ये खरीदें, यहां से वो नहीं खरीदें। ये लोग शायद नहीं जानते हैं कि रचनात्मकता किसी धर्म, जाति, समुदाय, किसी बॉर्डर की मोहताज़ नहीं होती। गीत, संगीत कला, साहित्य किसी धर्म पर आश्रित नहीं होते, गर इन दिनों इन्हें देखने का चश्मा अलग तरह का है।

लोग चाहे या ना चाहे राहत फतेह अली खान, मेंहदी हसन, गुलाम अली, बेगम अख्तर की गजल-ठुमरी, अच्छी लगती है तो आप इसे कैसे रोकेंगे। भीमसेन जोशी, हरिप्रसाद चौरसिया, कुमार गंधर्व यदि बाकी दुनिया के लोगों को अच्छे लगते हैं तो आज क्या कर लीजिएगा।
तनिष्क के विज्ञापन को लेकर कुछ लोग इसके पक्ष में है, कुछ लोग इसके खिलाफ में हैं। लोगों को लगता है कि ये लव जिहाद है। जब भी एक मुस्लिम लड़का हिन्दू लड़की से शादी करता है तो उसमें भी लोग प्रेम नहीं देखते जिहाद देखते हैं। जबकि हमारा संविधान कहता है कि दो बालिग़ लोग अपनी मजऱ्ी से विवाह कर सकते हैं। हम देखते हैं कि जहाँ पर भी लोग अपनी मर्जी से विवाह करते हैं चाहे वो एक ही समाज के क्यों ना, हो एक ही धर्म के क्यों ना हो पर अगर माता-पिता की मर्जी से करते हैं तो वहां पर भी उनकी हत्याएं होती हैं।  

इस विज्ञापन का कुछ लोगों ने ट्विटर के साथ ही फेसबुक और इंस्टाग्राम पर भी जमकर अपना विरोध दर्ज कराया। वहीं कुछ यूजर्स पूछ रहे हैं कि घर में हमेशा हिन्दू बहु ही क्यों दिखाई जाती है। अभिनेत्री ऋचा चड्ढा ने इस विज्ञापन को खूबसूरत बताया है। इस विज्ञापन में अपनी आवाज देने वाली अभिनेत्री दिव्या दत्ता लेकिन दुख जताते हुए कहा की है कि इसे ऑफ एयर कर दिया गया है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा, तो हिंदुत्व के कट्टर लोगों ने तनिष्क ज्वैलरी का बहिष्कार करने का आह्वान किया है।  

कुछ लोगों का कहना है कि किसी भी धर्म या जाति के बिना कोई विज्ञापन तैयार क्यों नहीं किया जाता। हर बार आखिर हम हर जगह एक हिंदू बहू ही क्यों देखते हैं। क्या मुस्लिम बहू कहीं दिखाई जाती है? कुछ लोग तनिष्क के गहने न खरीदने की बात करते हुए इसे बायकॉट करने की मांग करने लगे। ये किसी भी मुद्दे पर अपने एजेंडे और सोच के अनुसार प्रतिक्रिया देने तत्पर रहते हैं। विवेकहीन लोगों की भीड़ पढ़े-लिखे शिक्षित लोगों पर भारी पड़ रही है।

हमेशा चर्चा और विवादों में रहने वाली फिल्म अभिनेत्री भी इस विवाद में कूद पड़ी उन्होंने कहा यह विज्ञापन कई स्तर पर गलत है। हिंदू बहू परिवार के साथ लंबे समय तक रहती है, लेकिन उसे स्वीकारा तब जाता है, जब वह उनका उत्तराधिकारी लाती है। यह ऐड न केवल लव-जिहाद, बल्कि सेक्सिज्म को भी बढ़ावा देता है।

ऐसे मौकों की तलाश में रहने वाले टीवी चैनल के एंकरों को बैठे-ठाले एक विवाद का मुद्दा मिल गया। जो लोग अपने स्टूडियो में बैठकर देश के लोगों को भड़काने का काम करते हैं, उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि एक विज्ञापन ने धर्म के आधार पर देश का वैचारिक विभाजन कर दिया। उन्हे ये विज्ञापन लव जेहाद जैसा दिखता है।  

कभी भारतीय प्रशसानिक सेवा में अल्पसंख्यकों के चयन को प्रशासनिक जेहाद बताना, कभी दो लोगों के प्रेम को जो कि उनका व्यक्तिगत मामला, अधिकार है उसे लव जिहाद बताना, कभी किसी फिल्म को मिथकीय इतिहास और आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर अपनी जाति का अपमान बताना, कभी कोरोना संक्रमण के लिए तब्लीगी जमात को मानव बम बताना, कभी गौ हत्या के नाम पर मासूस की मॉब लिचिंग, छोटी-मोटी बातों, आपसी झगड़ों को साम्प्रदायिक जातीय दंगों का रूप देना और इस सबमें सोशल मीडिया के जरिए राजनीतिक व्यक्तियों का मुद्दे को हवा देना आम बात होती जा रही है। कट्टरपंथी ताकतें, भीड़ तंत्र के चलते धीरे-धीरे चारों ओर एक तरह का भय का वातावरण निर्मित होने लगा है। जो लोग इन्हे हवा दे रहे हैं, आने वाले समय में ये उन्हें भी नहीं बक्शेंगे। ये समाज के नये भस्मासुर हैं।