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ध्रुव शुक्ल की कविताः ओ मेरी सरकार!

ध्रुव शुक्ल की कविताः ओ मेरी सरकार!


मैं भारत का एक नागरिक

भोपाल शहर में रहता हूँ

मैं अपनी आवाज़ उठाकर

देश के प्रथम नागरिक से कुछ कहता हूँ...


आप जिसे कहते हैं

बार-बार मेरी सरकार

उसे नहीं सबकी दरकार


नहीं लिखा है संविधान में

जात-पाँत का भेद

फिर क्यों होते रहते हैं

लोकतंत्र में छेद

डूबे रहते भेदभाव में

सत्ता के प्रतियोगी

फिर कैसे इस लोकतंत्र की

विजय सुनिश्चित होगी


रोज़ डूबती दिखती रहती

लोकतंत्र की नाव

हम चुनते जिनको, वे बिक जाते 

फिर क्यों होते हैं चुनाव


नेता आपस में करते रहते

गठबंधन का धंधा

रोज़ गले पड़ता है मेरे

मंदिर-मस्ज़िद का फंदा

काम बिगड़ जाता है अक्सर

चले प्रशासन ऐसा

पाँच साल पहले था जैसा

जीवन वैसे का वैसा

खूब सजा-सँवरा दिखता है

सत्ता का गलियारा

अपनी अरज लिए हर कोई

फिरता मारा-मारा


कितने लोग उठाते रहते

बेबस जीवन का भार

क्या यही लिखा है संविधान में

लोकतंत्र का सार


कोई स्वस्थ-सानंद नहीं

यह ख़बर आपको होगी

नेता दिखते हट्टे-कट्टे

जनता हो गई रोगी


क्यों साजिश-सी लगें नीतियाँ

डिगता जन-विश्वास

ऊब रहा है देश का जीवन

कौन जगाये आस


ओ मेरे तरफदार

सविनय एक निवेदन है बस

खूब जताकर प्यार 

कब जनता के कष्ट हरेगी

यह मेरी सरकार!