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क्या देश खुशहाल है? : बबन प्रसाद मिश्र

क्या देश खुशहाल है? : बबन प्रसाद मिश्र

बबन प्रसाद मिश्र

भारतीय आजादी की आधी सदी - बीत जाने के बाद अपनी नाकाबिलियत एवं नाकामियों का जीवन यदि करोडों भारतीयों की नियति दिखाई दे रही हो, तो अब वक्त आ गया है जब बेलेट को बुलेट से बचाकर आजादी की सही क्रांति के अर्थ को अनर्थ में बदले जाने से बचाया जाये । छठे दशक तक यदि देश के जन का संपूर्ण श्रम कथित ऊर्जाहीनता, प्रगति परान्मुखता एवं पराश्रितता ही दर्शाता हो या करोडों- अरबों की योजनाओं  के नाम लगभग 60 वर्ष की आयु प्राप्त कर रहे प्रजातंत्र को अभी भी भयावह गरीबी, भूखमरी, बेरोजगारी, बीमारियों एवं बंधुआ जिंदगी जैसी त्रासदियों से गुजरना पड रहा हो, तो दोष किसका ? नेताओं का, विधायिका का, कार्यपालिका का , न्यायपालिका का या आमआदमी का ? चले अपने देश की वर्तमान गति तथा उसे चला रहें स्तंभो की चाल, चरित्र एवं चेहरों पर विहंगम दृष्टि डालें ।

   सबसे पहले विधायिका को लें । विधानसभा एवं संसद की लोकसभा के चुनाव लडने वाले उम्मीदवार के लिए चुनाव आयोग ने कानून बनाया है कि  प्रत्येक उम्मीदवार के लिए चुनाव में खर्च करेगाा । यह कानून बनते ही राजनेताओं एवं राजनीतिक दलों ने इसे छिन्न-भिन्न करते हुए एक अंदरूनी व्यवस्था बनाई की राजनैतिक पार्टी हर उम्मीदवार को उसके निर्वाचन क्षेत्र में झंडे, बैनर ,पोस्टर अलग से देगी, उम्मीदवार केवल वाहन, प्रचार एवं चुनावी व्यवस्था का व्यय उठायें ।

   चुनाव जीतने के लिए इस व्यय सीमा की धज्जियां हर उम्मीदवार विधानसभा एवं लोकसभा चुनावों में उडाता है । इसके बाद जिस पहले दिन वह विधानसभा या लोकसभा में उडाता है। इसके बाद जिस पहले दिन वह विधानसभा या लोकसभा में प्रवेश करता है , उसी समय एक झुठी शपथ लेता है कि उसने विधि सम्मत चुनाव जीता है । अर्थात व्यय सीमा का पूरा पालन करते हुए उसने  चुनाव जीता है ।  उसका यह कथन पूरी तरह झूठा होता है । प्रश्न है कि जो व्यक्ति प्रवेश की या देश की सबसे बडी संवैधानिक सभा में प्रवेश करते ही झूठ का सहारा लेता है या चुनाव आयोग तथा देश को गुमराह करता है तो वह देश को सही रास्ता कैसे दिखलायेगाा ? इसकी यही बयान झूठ के सार्वजनिक इजहार का ५ साल तक निर्बाध रूप से विधायिका में सुखभोग का लायसेंस बन जाता है ।

फिर जितनी राशि से चुनाव लडता है, उसकी भरपाई वह हर सार्वजनिक या निजी कठिनाइयों से जुडें जन से करता है । वह सीधे- सीधे रूपये लेता है । नगद या फिर प्रतिशत से लेकर 40  प्रतिशत तक कमीशन के रूप में हरेक जन - कार्य के ठेके में वह वसूल करता है ।  अब यह वैध तक कहा जा रहा है अब चुनाव जीतना उसे जन- नेता के बदले कमीशन एजेंट या सफेदपोश अपराधी अथवा अवैध हथकंडे से धन उगाऊ बनाता है यह संयुक्त उपक्रम है जिसमें नौकरशाही भी जुडी रहती है । विधायिका यानी विधानसभा से लेकर संसद तक से जनप्रतिनिधि कर्णधार अब इसे निहायत बेशर्मी से राजनीतिक विवशता या राजनैतिक दृष्टि से अनिवार्य आचार तक कहने लगे है । यह स्थिति प्रथम आम चुनाव के बाद जन्मी और अब विषबेल की तरह पंचायतों के चुनाव तक बंद गई है । धनबल की तरह अब बाहुबल भी इन चुनावों की उनकी जरूरत है । फर्जी मतदान एवं बूथ केप्चरिंग से लेकर डाकू निर्भय सिह तक एवं प्रतिनिधि के रूप में चुने जाना चाहते है । फूलन देवी से लेकर डाकू निर्भय सिह तक एवं शहाबुद्दी से लेकर दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश में आंतक का पर्याय बने गिरोह भी अब राजनैतिक में भाग्य आजमाना चाहते है ।

   कुछ दिनो पूर्व ही एक विद्वान जान मेथ्यु का लेख गरीबी उन्मूलन और लोकतंत्र पर छपा था । मेथ्यु साहब का कहना था कि 1960  के दशक के मध्य तक गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले 50 प्रतिशत के ऊपर थे , अब सिर्फ 26 प्रतिशत है मैथ्यू साहब, आंकड़ों से प्यार हमें भी है, किन्तु यथार्थ कुछ ज्यादा कठोर रूप में उभरा है। मुंबई उच्च न्यायालय में अमरावती के एक व्यवसायी किरण पातुरकर ने एक हलफनामा सहित याचिका दायर कर कहा है कि मेलघाट और धारिणी क्षेत्र जो अमरावती जिले में विदर्भ के हैं, भूखमरी की परिस्थितियों से जूझ रहे हैं । वहाँ लगभग 33 हजार बच्चे कुपोषण के शिकार बनकर जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे हैं। उन्हें तत्काल चिकित्सा 12 राहत नहीं मिली तो यह बाल मृत्यु सदी की भीषण त्रासदी होगी।

 उच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीश न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी एवं न्यायमूर्ति धनंजय चंद्रचुड ने महाराष्ट्र के स्वास्थ्य विभाग से इस संदर्भ में विस्तृत विवरण प्रस्तुत। करने कहा है।

यही अन्य राज्यों की भी स्थिति है। यह स्थिति क्या दर्शाती है। क्या गरीबी कम ? मुंबई में शराब के कोठों पर.65 हजार बेटियां क्यों नाच रही थी? उड़ीसा में बच्चे कैसे बिक जाते है ? छत्तीसगढ़ का पलायन क्या फैशन शो हैं ? राजस्थान से हर साल भटकने वाले बंजारे बनकर देश भर में भटक रही बच्चियां, आंध्र में किसानों की आत्महत्या, उत्तरभारत में लूट, फिरोती और समूह में बिहार में गैंगवार क्या केवल संयोग है?

क्या ये अच्छे जीवन से बनी स्थितियाँ हैं ? विगत पाँच अगस्त को राज्यसभा में कृषि राज्य मंत्री श्री कांतिलाल भूरिया ने स्वीकारा है कि देश के 45.6 फीसदी किसान कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। पटियाला से लेकर आंध्र के गांवों तक किसान आत्महत्या करते हैं।

पत्रकार खुशवंत सिंह का एक ताजा लेख हाल में छपा है कि भारत संसार के गरीबों में सबसे गरीब और भ्रष्टों में सबसे भ्रष्ट देश है। हम प्रतिवर्ष देश से रोटी, कपड़ा और मकान की समस्या दूर करने के व्याख्यान राजनेताओं से सुनते हैं, किन्तु क्या यह सही नहीं कि हमारे गोदामों में अनाज सड़ता है, सड़कों के किनारे खुले आसमान में भींगता है, पर देश में आधी जनता एक समय बमुश्किल खाना खा पाती है।

शिक्षा में प्रति वर्ष साढ़े-चार लाख बच्चे स्कूलों में जाकर लौट जाते हैं। गरीबी उन्हें आगे पढऩे से रोक देती है। लड़कियों के स्कूल छोडऩे की दर 56.9 प्रतिशत कही गई है। अज्ञानी समाज से प्रगति की उम्मीद कैसे की जा सकती है। केन्द्र में ऐसे नेता हैं जो