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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - राजनीति का खेल, खेल की राजनीति

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -  राजनीति का खेल, खेल की राजनीति

-सुभाष मिश्र

कहने को ओलम्पिक टोक्यो में हो रहा था किन्तु उसके परिणामों को लेकर हमारे देश में भी काफी गहमागहमी है। पहली बार 125 साल बाद हमारे देश के किसी खिलाड़ी ने स्वर्ण पदक जीता है। नीरज चोपड़ा ने अपने भालो की नोंक से भारत माता का भाल ऊंचा कर दिया। टोक्यो ओलम्पिक की जेवलिन थ्रो स्पर्धा में 87.58 मीटर भाला फेंक कर उन्होंने यह स्वर्ण पदक हासिल किया। टोक्यो के स्टेडियम में गूंजे राष्ट्रगान को सुनकर भारतीयों का सीना चौड़ा हुआ। अभी तक 56 इंच का सीना चौड़ा करके केवल मोदीजी घुम रहे थे। अब बहुत लोग सीना चौड़ा किये तरह-तरह की बातें पोस्ट कर रहे हैं। टोक्यो ओलम्पिक में इस बार एक स्वर्ण, दो रजत, चार कांस्य पदक मिले। ऐसा पहली बार हुआ है।

समय की नजाकत और मौका देखकर चौका लगाने में माहिर हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार का नाम बदलकर हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के नाम पर पुरस्कार करने की घोषणा की। भक्त मंडली को लगा नाम बदलने से कृपा बरसने लगी। जैसा कि पुरस्कार के नाम से राजीव गांधी का नाम हटा देश को मेडल मिलने लगे। आने वाले समय में नोट से गांधीजी को हटा देंगे तो डॉलर की तुलना में नोट मजबूत हो जायेगा। मोदी जी दूरदर्शी हैं। उन्हें यह काम नोटबंदी के समय ही कर लेना चाहिए था। अभी तक काला पीला सारा धन आ जाता और हमारी जीडीपी भी उछाल मारने लगती। बात पुरस्कारों के नाम की है तो मुद्दे की बात यह है कि वैसे भी जो जिस क्षेत्र का है, पुरस्कार उसी के नाम पर होना चाहिए। खेल संगठनों के लिए भी यही बात लागू होती है। खेल संगठनों के पदाधिकारी बनते ही पहली शर्ते उसका खेल के साथ जुड़ाव, सहभागिता होनी चाहिए। मेजर ध्यानचंद के बाद देश की हॉकी का स्वर्णिम इतिहास अंधेरे में चला गया था जिसे इस ओलम्पिक से थोड़ी उम्मीद जगी है।  इस उम्मीद से उपजी खुशी के पलों के बीच सोशल मीडिया के सभी प्लेटफ़ार्मों खासकर व्हाट्सएप पर एक मैसेज तेजी से वायरल हो रहा है जिसमें कहा गया है कि जबसे प्रधानमंत्री ने खेल रत्न पुरुस्कार का नाम बदला है तबसे ओलंपिक में गए हमारे देश के खिलाडिय़ों का मनोबल बढ़ा है, कृपा बरसी है। इस वायरल मैसेज को वैसे तो मोदीभक्त वायरल कर कांग्रेसियों से मजे ले रहे हैं तो वहीं कांग्रेस नेता इसे ओछी हरकत बता रहे हैं। राजनीति के परे यदि इस मैसेज की गंभीरता पर विचार किया जाए तो यह सवाल लाजिमी है। आखिर क्यों? इस देश में सभी बड़ी योजनाएं, सभी बड़े स्टेडियम, सभी बड़े शैक्षणिक संस्थान या फिर विभिन्न क्षेत्रों में दिया जाने वाला पुरुस्कार ये सभी का नाम हमारे देश के नेताओं के नाम पर ही क्यों है? फिर चाहे वो हाल ही में बदला गया खेल रत्न पुरुस्कार का नाम हो या फिर बीते वर्ष गुजरात में बने स्टेडियम का नाम जिसका नामकरण देश के वर्तमान प्रधानमंत्री के नाम पर किया गया।  हॉकी हमारे देश का राष्ट्रीय खेल है। एक समय था जब इस खेल में भारत देश, विश्व में सभी देशों में अव्वल था। अब सवाल यह है कि यदि हॉकी के जादूगर व देश को 3 ओलिम्पिक गोल्ड मेडल दिलाने वाले मेजर ध्यानचन्द के नाम यदि खेल पुरुस्कार नहीं होगा तो किसके नाम होगा? आखिर ध्यानचंद ने अपना जीवन हॉकी के प्रति समर्पित कर दिया। देश के राष्ट्रीय खेल में उन्होंने भारत को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई। इसी तरह अन्य पुरुस्कार जो अलग-अलग क्षेत्र के हैं उसे भी उन्ही के नाम किया जाना चाहिए जो इसके असली हकदार हैं।  

हमारे देश में बहुत सारे खेल संगठनों में ऐसे-ऐसे लोग शीर्ष पदों पर काबिज हैं जिनका उस खेल से कभी कोई खास वास्ता नहीं रहा। क्रिकेट क्लब पर तो राजनीतिक व्यक्तियों की रूचि सर्वविदित है। जिन खेलों में थोड़ा ग्लैमर, पैसा है, वहां बातों की नजर है। देश में चीन के बाद आबादी की दृष्टि से दूसरे नम्बर है।  भारत खेलों में क्यों फिसड्डी है, इस पर भी खुलकर बात होनी चाहिए। जब हम विजयी होकर लौट रहे हमारे खेल सितारे नीरज चोपड़ा, बजरंग पुनिया का स्वागत-सत्कार कर रहे होंगे, उन्हें ईनाम इकराम दे रहे होंगे तो हमें उन खिलाडिय़ों के बारे में खेल सुविधाओं के बारे में भी सोचना होगा जो अभी अभावों में जी रहे हैं। शहरों में तेजी से कम हो रहे खेल मैदान, खेल संस्थानों, स्टेडियम की दुर्दशा पर भी कृपा बरसे हमें यह भी देखना होगा। टोक्यो ओलम्पिक में 33 खेलों में 359 स्पर्धाएं आयोजित की गई। सर्वाधिक पदक चीन, अमेरिका जैसे देश के खिलाडिय़ों ने जीते। इस तरह की अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में बाकी देशों की तुलना में वे बहुत आगे रहते हैं। यहां खेलों के नाम पर राजनीति नहीं होती बल्कि खिलाड़ी की प्रतिभा को बचपन से निखारने की ईमानदार कोशिश होती है जिसमें सरकार के अलावा नागरिक समाज का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। ओलम्पिक में हुए बहुत से खेल में हमारे देश का नामोनिशान तक नहीं है। ओलम्पिक में इस बार एथलेटिक्स (तैराकी व अन्य) में 49 स्पर्धाएं और कुल 147 पदक, साइकिलिंग में 22 स्पर्धाएं और 66 पदक, जिमनास्टिक में 18 स्पर्धाएं और 54 पदक, निशानेबाजीमें 15 स्पर्धाएं और 45 पदक, भारोत्तोलन में 14 स्पर्धाएं और 42 पदक व कुश्ती में 18 स्पर्धाएं औरकुल 54 पदक। इन सात खेलों की स्पर्धाएं में ओलंपिक की स्पर्धाओं का लगभग 54 प्रतिशत है। बाकी 26 खेल स्पर्धाओं में सह हिस्सेदारी करीब 46 प्रतिशत है।

जो जीता वो सिकंदर की परंपरा का पालन करते हुए इस समय देश का मात्था ऊंचा कर ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले नीरज चोपड़ा को हरियाणा के मुख्यमंत्री एमएल खट्टर ने 6 करोड़ रुपये का नगद इनाम देने की घोषणा के साथ ही पंचकूला में आगामी सेंटर फॉर एक्सीलेंस इन एथलेटिक्स का प्रमुख बनाया जाएगा। उन्हें प्रथम श्रेणी की नौकरी और जमीन का एक टुकड़ा रियायती दरों पर देने की घोषणा भी उनके द्वारा की गई है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नीरज चोपड़ा के लिए 2 करोड़ के विशेष नगद इनाम की घोषणा की।  भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने नीरज चोपड़ा को एक करोड़ रुपये का नगद इनाम देने की घोषणा की है। इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) फ्रेंचाइजी चेन्नई सुपर किंग्स ने भी एथलीट के लिए एक करोड़ के इनाम की घोषणा की। भारतीय एयरलाइनर इंडिगो नीरज चोपड़ा को एक साल के लिए असीमित मुफ्त यात्रा की पेशकश करेगी। यह प्रस्ताव 8 अगस्त, 2021 से 7 अगस्त, 2022 तक लागू है। महिंद्रा एंड महिंद्रा के चेयरमैन आनंद महिंद्रा ने भारत लौटने पर चोपड़ा को एकदम नई एक्सयूवी 700 देने की घोषणा की है।  मणिपुर सरकार ने चोपड़ा को 1 करोड़ पुरस्कार देने की घोषणा की है। मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने एक ट्वीट में कहा, इस ऐतिहासिक दिन पर जहां भारत ने 100 साल बाद एथलेटिक स्पर्धा में ओलंपिक स्वर्ण पदक जीता।

नीरज चोपड़ा, अभिनव बिंद्रा के बाद ओलंपिक में व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीतने वाले दूसरे भारतीय खिलाड़ी हैं। मोदी समर्थक समझे जाने वाले फिल्म निर्माता अशोक पंडित ने नीरज चोपड़ा की जीत पर ट्वीट करते हुए लिखा, राजीव गांधी का नाम हटाते ही गोल्ड आ गया।   

भारत का खेलों में खराब प्रदर्शन क्यों होता है? यदि हम इसके कारणों की पड़ताल करें तो ओलंपिक में सात पदक पाकर संतोष कर जश्न मनाने वाले हम भारतीयों को यह भी सोचना होगा कि खेलों को लेकर हम इतने फिसड्डी क्यों हैं ? खेल के बुनियादी ढांचे का अभाव और सरकार द्वारा खराब सुविधाएं व खिलाड़ी की नौकरी की सुरक्षा का अभाव इसके मुख्य कारण हैं। इसके अलावा हमारे समाजों में पारिवारिक समर्थन और खेल संस्कृति का अभाव भी इसका एक बड़ा कारण है। क्रिकेटरों की प्रसिद्धि को छोड़ दें तो बाकी खेलों के खिलाडिय़ों के सामने पहचान का संकट है। एथलीटों को उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए उचित धन नहीं मिलता है। खिलाडिय़ों के पास आय का कोई स्थायी स्रोत नहीं होता है और उनके प्रशिक्षण के प्रारंभिक चरण में सरकार द्वारा कोई सहायता नहीं दी जाती है। स्कूलों में प्रारंभिक अवस्था के दौरान उचित खेल शिक्षा नहीं की जाती।

भारत सरकार ने 2024 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों में 50 ओलंपिक पदक के उद्देश्य से चलो खेलते हैं नाम से कार्ययोजना बनाई। अप्रैल 2016 में खेलों के विकास के लिए खेलो इंडिया एक राष्ट्रीय कार्यक्रम बनाया गया। सितंबर 2017 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 1756 करोड़ रुपये की लागत से खेलों इंडिया कार्यक्रम को नया ढांचा बनाया। आगामी 2020 ओलंपिक के लिए सरकार ने विभिन्न खेलों के लिए सर्वश्रेष्ठ विदेशी कोचों की नियुक्ति को मंजूरी दी। खेलों को बढ़ावा देने के लिए कई सरकारी और निजी निकायों ने उषा स्कूल, कूह स्पोर्ट्स एकेडमी, द एरिना फ्रॉम ट्रांसस्टेडिया जैसी सुविधाएं खोली है।

ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर खेल सुविधाएं प्रदान करने के मिशन के साथ पंचायत युवा क्रीड़ा और खेल अभियान शुरू की गई जो लॉकडाउन की वजह से स्थगित है।
1950 के फुटबाल विश्वकप में भारतीय खिलाडिय़ों के पास जूते नहीं थे इसलिए उन्हे खेल से बाहर होकर एक सुनहरा मौका गंवाना पड़ा था।  भारतीय अन्य खेल जैसे तैराकी, बाक्सिंग, जिम्नास्टिक, कुश्ती आदि की हालत भी सोचनीय और विचारणीय है। जिन खिलाडिय़ों के पास निजी संपत्ति का सहारा है वे तो फिर भी कुछ आगे बढ़ पा रहे हैं लेकिन मध्यम निम्न वर्ग के खिलाडिय़ों की योग्यता मज़बूरी के तले दबकर खो रही है। खिलाड़ी आर्थिक तंगी के साथ-साथ राजनीतिक दांव पेच के भी शिकार हो रहे हैं। खेल संगठनों में पनपते भाई-भतीजावाद, लालच, भ्रष्टाचार और स्वार्थी प्रवृत्ति ने भारतीय खेलों और खिलाडिय़ों को विश्व में सबसे निचले पायदान पर लाकर खड़ा किया है। भारत के खिलाडिय़ों के पिछडऩे का एक महत्वपूर्ण कारण है आर्थिक असुविधाएं। भारतीय खिलाड़ी ज़्यादातर गांवों या कस्बों से आते हैं और सरकार की ओर से इन्हे प्रशिक्षण हेतु, स्वास्थ्य हेतु, भरण-पोषण हेतु सुविधाएं ना के बराबर दी जाती है।

खेल पुरस्कारों का नाम बदलने से ज्यादा कुछ नहीं होगा। हमें अपनी सोच नीति और नियत बदलनी होगी। खिलाडिय़ों को बुनियादी सुविधाओं के साथ खेलने के भरपूर अवसर और जीवनयापन की गारंटी भी चाहिए। हमें अब इस पुरातन पंथी सोच से भी उपर उछकर सोचने की जरूरत है -

पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब
जो तुम खेलोगे कूदोगे तो होगे खराब।