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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - मूल मुद्दे से भटकने वाला टूलकिट

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - मूल मुद्दे से भटकने वाला टूलकिट

-सुभाष मिश्र
सोशल मीडिया ने एक जनतांत्रिक स्पेस मुहैया किया था जिसमें अभिव्यक्ति की निर्बाध स्वतंत्रता आधुनिक इतिहास में पहली बार सम्भव हुई थी। लेकिन उसकी जनतांत्रिक स्वतंत्रता अब स्वेच्छाचार और अराजकता में तब्दील हो चुकी है। झूठ को गढऩे की कला सोशल मीडिया में निखर आयी है। उसका इस्तेमाल व्यक्तिगत खुन्नस निकालने से लेकर राजनीतिक शत्रुता भुनाने तक के लिये किया जा सकता है। कांग्रेस पार्टी के कथित टूलकिट प्रकरण को इस दृष्टि से देखा जा सकता है।

काश हमारे नेताओं ने कोरोना महामारी के होने वाली लापरवाही, लेटलतीफी के कारण हुई हजारों मौतों को लेकर प्रदर्शन, शोक श्रद्धांजलि आयोजित किया होता। काश हमारी राजनीतिक पार्टियां लचर स्वास्थ्य सुविधा और कोरोना की दूसरी लहर को लेकर बरती गई लापरवाही को लेकर लामबंद होती। जब भी किसी मूल मुद्दे से ध्यान भटकना हो तो उसके समानांतर एक ऐसा छद्म मुद्दा खड़ा कर दो जो गोदी मीडिया में चर्चा का, खबरों का स्पेस घेरकर लोगों का ध्यान भटका सके। टूलकिट विवाद ऐसी ही एक कवायद का नाम है। सोशल मीडिया और आधुनिक तकनीक, जरूरतों की वजह से हम नई-नई शब्दावली और उनके गूढ़ अर्थों से परिचित हो रहे हैं। आधुनिक पीढ़ी के लोग सोशल मीडिया पर बातचीत के लिए बहुत ही कम शब्दों में मैसेज करती है और उनके साथी भावार्थ अर्थ समझ जाते है। इधर राजनीतिक क्षेत्र में एक शब्द विवाद का विषय बना हुआ है और वह है टूलकिट। हम बचपन से ट्रक, बस और गाडिय़ों में एक छोटे डिब्बे पर लिखा देखते थे टूलकिट बाक्स। जब कभी गाड़ी में कोई छोटी-मोटी खराबी होती तो कंडेक्टर, ड्राइवर टूलकिट बाक्स में से जरूरी चीजे निकालकर मरम्मत में लग जाते। अब टूलकीट का चरित्र ही बदल गया है। यह सुधारने के नहीं छवि बिगाडऩे का औजार बन गया है। जब कभी कोई विमान दुर्घटना होती है तो सबसे पहले उसका ब्लेक बाक्स ढूंढा जाता है। अभी सोशल मीडिया के दौर में किसान आंदोलन और उसके बाद कोरोना महामारी के समय टूलकिट का सर्वाधिक उपयोग होकर मामला थाना-कचहरी तक पहुंच गया। टूलकिट विवाद को लेकर कांग्रेस बीजेपी इस समय आमने-सामने है। दिल्ली से लेकर रायपुर में एफआईआर और गिरफ्तारी देने को लेकर अच्छा खासा हंगामा मचा हुआ है।

रायपुर में भाजपा से जुड़े पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, राजेश मूणत धरने पर बैठे तो दुर्ग से सरोज पॉंड़े ने कमान संभाली। राजनीतिक पार्टियां उसके नेता कार्यकर्ता छोटी-मोटी घटना को भी बड़ा इवेंट बनाने में माहिर होते हैं ये तो फिर बड़े नेताओं के खिलाफ एफआईआर का मामला है। देश कोरोना से जूझता है तो जुझता रहे, पार्टी नेता व मुख्यमंत्री कभी सीबीआई दफ्तर में धरना देने पहुंच जाती है, तो कभी दूसरी पार्टी के नेता थाने में गिरफ्तारी देने। टूलकिट के बहाने जिन गंभीर मुद्दों को उठाया गया है उस पर कोई बात नहीं हो रही है।

दुष्यंत कुमार का एक मौजू शेर है -
कैसे कैसे मंजर आने लगे हैं, गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं
वे सलीबों के करीब आये तो, हमको कायदे कानून समझाने लगे हैं।।

कोरोना संक्रमण के दौरान हमारे देश के बहुत से लोगों द्वारा की गई कालाबाजारी, सरकारी असंवेदनशीलता, क्रूरता और बेईमानी के किस्से आम है। हम एक चरित्रहीन बेईमान, अराजक समाज में जी रहे है। जहां पैसो के लिए लोग अपना ईमान बेच रहे हैं, नकली दवाएं रखकर आक्सीजन की ब्लेक मार्केटिंग कर रहे हैं, जहां अस्पताल लूट के नये केंद्र के रूप में दिखाई दिये। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हमारी छवि धूमिल हुई। हमने अपनी दृढधर्मिता, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और अपने झूठ को महिमा मंडित करने के लिए जो स्वांग रचा, वह आज पूरी दुनिया के सामने कोरोना से होने वाली मौतों के रूप में आया है। पूरी दुनिया का मीडिया और संवेदनशील लोग हमारी दशा का बखान कर मदद के लिए हाथ बढ़ा रहे हैं और हम हैं कि अभी भी अपनी पीठ थपथपाने में लगे हैं।

कांग्रेस टूलकिट का इस्तेमाल कर कोरोना वायरस संकट के वक्त फायदा उठाकर पीएम नरेंद्रमोदी की छवि को धूमिल कर रही है। कांग्रेस ने इन आरोपों को फेक बताया है और किसी भी तरह की टूलकिट के इस्तेमाल से इनकार किया है।   

इसके पूर्व कृषि कानूनों और किसान आंदोलन को लेकर भी टूलकिट की खूब चर्चा हुई। चाइल्ड एक्टिविस्ट के तौर पर चर्चित रहीं ग्रेटा थनबर्ग के ट्वीट से हुई। जिसे देखकर सोशल मीडिया पर काफी हंगामा हुआ।

टूलकिट का पहली बार जिक्र तब हुआ था जब अमेरिका में ब्लैक लाइफ मैटर नाम का आंदोलन शुरू हुआ था। अमेरिकी पुलिस द्वारा एक अश्वेत की हत्या किए जाने के बाद इस आंदोलन ने जन्म लिया, जिसे पूरे दुनिया का समर्थन मिला।

टूलकिट वह डिजिटल हथियार है जो सोशल मीडिया पर एक बड़े वर्ग पर किसी आंदोलन को हवा देने और ज्यादा से ज्यादा लोगों को उसमें जोडऩे के लिए किया जाता है। टूलकिट में वो सभी चीजें मौजूद होती हैं, जो लोगों को अपनाने की सलाह दी जाती है, ताकि आंदोलन भी बढ़े और किसी तरह की कोई बड़ी कार्रवाई भी न हो सके।

इंटरनेट और सोशल मीडिया के आभासी चरित्र में मनुष्य के सामाजिक व्यवहार और नैतिक आचरण के स्वीकृत मानदंडों को हिला कर रख दिया है। ऊपर से राजनीति और सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों का अभूतपूर्व विघटन हो चुका है। इसके चलते सच या झूठ को सुविधानुसार गढ़ कर किसी पर भी आरोप लगाना आसान हो गया है। कहना मुश्किल है कि इस टूलकिट प्रकरण में सच्चाई क्या है? लेकिन इसे लेकर दोनों पक्षों के बीच जिस तरह से तलवारें खिंच गयी हैं, उससे राजनीतिक माहौल में कड़वाहट बढ़ी है। टूलकिट की रचना चाहे सौम्य वर्मा ने की हो, जैसा कि भाजपा का आरोप है, या भाजपा ने उसे गढ़ा हो, जैसा कि कांग्रेस का आरोप है, महत्तवपूर्ण यह नहीं है। महत्तवपूर्ण यह है कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में सोशल मीडिया के आभासीपन और उसके गढ़ंत कौशल का अनैतिक इस्तेमाल ज़रूर किया गया है। ग़ौर करने की बात यह है कि सोशल मीडिया अब राजनीतिक लड़ाई का खुला मैदान बन गया है, इसमें संदेह नहीं। इस बात में भी संदेह नहीं रह गया है कि इस लड़ाई में युद्ध के नियम काम नहीं करते। कूटरचना और गढ़ंत कुशलता को यहाँ युद्ध कौशल की तरह इस्तेमाल करने की छूट है।
यहाँ गौर किया जाना चाहिये कि भाजपा के आईटी सेल द्वारा प्रतिपक्षी दलों के नेतृत्व और उनकी विचारधारा के खिलाफ व्यापक पैमाने पर तैयार की गयी विद्वेषपूर्ण सामग्री का मक़सद उन्हें जनता की नजऱों में गिरा कर राजनीतिक रूप से कमज़ोर करना के अलावा क्या है? यह डिजिटल सामग्री अंतत: सोशल मीडिया पर युद्ध सामग्री की तरह ही तो प्रक्षेपित की गई है। जिस नैतिकता के तहत इसे सोशल मीडिया में भेजा गया, उसी नैतिक अधिकार का इस्तेमाल करने से वह विपक्ष को कैसे रोक सकेगी? ऐसी स्थिति में विपक्षी राजनीति के उलट प्रहार का सामना उसे करना होगा। इसलिये सरकार के खिलाफ कोविड प्रबंधन नीति की आलोचना करना और उसके लिये आंदोलन की रूपरेखा के तौर पर टूलकिट तैयार करना ग़लत नहीं है। अगर उसमें कोई छेड़छाड़ की गई है, जैसा कि कांग्रेस का कहना है तो इसकी जाँच अवश्य होनी चाहिए।