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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -विचार और चेतना में आज भी जिंदा है कबीर

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -विचार और चेतना में आज भी जिंदा है कबीर

-सुभाष मिश्र
हमें अपने समयकाल की तुलना में आज कबीर की प्रासंगिकता ज्यादा दिखाई पड़ती है। कबीर आज हमारे बीच नहीं हैं किन्तु विचार, चेतना और भावनाओं के स्तर पर कबीर अपने दोहों, गीतों और कविता के जरिए न केवल याद आते हंै बल्कि अपनी बात पूरी वजनदारी से कहने के लिए हम उनका सहारा लेते हैं। कबीर के जन्म समयकाल को लेकर मतभेद हो सकते हैं किन्तु उनकी प्रासंगिकता और उनकी कही बातों को लेकर किसी के मन में किसी प्रकार का शकसुबा नहीं है। इतिहास केवल घटनाओं का वर्णन नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक संबंधों के परिवर्तन की कहानी का है,  विचार और चेतना की प्रगति का भी। जो लेखक, कवि, विचारक अपने समयकाल का अतिक्रमण करता है, सच के साथ खड़ा होता है, वही लोगों से कबीर की तरह कह सकता है - हम न मरैं, मरिहें संसारा।
कबीरदास के जन्म और मृत्यु की तिथियों के बारे में विश्वास से कुछ नहीं कहा जा सकता। कबीर अपने दोहों के माध्यम से ही बनारस और काशी में मुक्ति तलाशने वालों को जवाब देते हुए कहते हैं-
क्या काशी क्या ऊसर मगहर, राम हृदय बस मोरा,
जो कासी तन तजै कबीरा, रामे कौन निहोरा।

बनारस में कबीर चौरा और मगहर में इमली के पेड़ के नीचे कबीर की समाधी को लोग उनकी जन्ममृत्यु के प्रमाण के रूप में खोजते हैं। दरअसल कबीर उस धारणा को तोड़ते हैं जहां कहा जाता है कि परलोक का मार्ग काशी याने बनारस होकर जाता है, तो वे काशी छोड़कर मगहर जाकर मरना पसंद करते हैं।
कबीर जात-पात के खिलाफ हैं और उनको अपनी जात को लेकर कोई मलाल नहीं है और वे कहते हैं कि हमारी जात जुलाहे की और नाम कबीर है। मैं काशी का एक जुलाहा, बूझहु मोर गियाना अर्थात वह जाति धर्म को नहीं, ज्ञान को ही सर्वोपरि मानते हैं। कबीर एक ओर तो हमें धार्मिक दिखाई देते हैं, दूसरी ओर वे धर्म के नाम पर होने वाले तमाम आडंबरों का मुंहतोड़ जवाब देते हैं। धर्म के प्रतीक रूप में मुल्ला, काजी, पंडित, पुरोहित जो कि बहुत महंगे हैं और धार्मिक कर्मकांड को जानते हैं उन तक आम आदमी की पहुंच नहीं है और वे शासकों की सत्ता पर खुदा और भगवान की स्वीकृति की मुहर लगाते हैं, कबीर ऐसे लोगों को खारिज करते हैं। लेकिन इससे अलग वे आध्यात्म के मार्ग को चुनते हैं जहां पर भक्तों और सुफियों के लिए मनुष्य के उच्च स्थान का मापदंड भक्ति, प्रेम, इश्के हकीकी (पारलोकिक प्रेम) और इश्के मजाजी (अलौकिक प्रेम) है।
कबीर अपने दोहे में कहते हैं -
मोको   कहां   ढूँढ़े   बंदे, मैं  तो  तेरे  पास में।
ना मैं देवल ना मैं मसजिद, ना  काबे  कैलास  में।

ना तो कौने क्रिया - कर्म में, नहीं  योग  वैराग  में।
खोजी होय तो तुरतै मिलिहौं, पलभर  की तलास में।
कहैं कबीर सुनो भई साधो, सब स्वासों की स्वास में॥

कबीर अपने समय का अतिक्रमण करते हैं और वे लगातार अपनी वाणी, अपनी शिक्षा के माध्यम से सभी भाषाओं के साहित्य का अंग बन जाते हैं। कबीर की वाणी हमें गुरुनानक की शिक्षा में दिखलाई देती है, वहीं हमें कबीर टैगोर के विचारों में दिखलाई पड़ते हैं। कबीर का प्रभाव छत्तीसगढ़ के गुरू बाबा घासीदास से लेकर नए दौर के व्यंग्य लेखक हरिशंकर परसाई तक में दिखलाई पड़ता है। कबीर माया को सत्ताधारी वर्ग की लोलुपता का प्रतीक मानते हैं। कबीर अपने दोहे के माध्यम से कहते हैं - कि माया महा ठगनी हम जानी।

कबीर हमारे उन आडम्बरधारी साधु-महात्मा और मठाधीशों की तरह नहीं थे, जो किसी प्रकार का श्रम नहीं करते, केवल प्रवचन देते हैं या आशीर्वाद देते हैं। कबीर कपड़ा बुनते हैं, फेरी लगाकर उसे बेचते हैं और अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। कबीर किसी सत्ता के पक्षधर नहीं है वे फक्कड़ हैं, मस्तमौला हैं और वे कहते भी हैं कि
- कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर, ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर।

कबीर बहुत हद तक धार्मिक होते हुए भी धर्मनिपेक्ष बने रहे। ये हर बार अपने साधारण मनुष्य होने का परिचय देते हैं, ये अलग बात है कि उनके मानने वाले उन्हें ईश्वर की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं। जो कबीर हमेशा धार्मिक आडंबरों, पाखंड का, मूर्ति पूजा का विरोध करते रहे, लोग उन्हें ईश्वर बनाने पर तुले हुए हैं।
कबीर बानी जैसी किताब संपादित करने वाले देश के सुप्रसिद्ध शायर अली सरदार जाफऱी कहते हैं - हमें आज भी कबीर के नेतृत्व की ज़रूरत है, उस रोशनी की ज़रूरत है जो इस संत सूफ़ी के दिल से पैदा हुई थी। आज दुनिया आज़ाद हो रही है। विज्ञान की असाधारण प्रगति ने मनुष्य का प्रभुत्व बढ़ा दिया है। उद्योगों ने उसके बाहुबल में वृद्धि कर दी है। मनुष्य सितारों पर कर्म दें फेंक रहा है। फिर भी वह तुच्छ है, संकटग्रस्त है, दु:खी है। वह रंगों में बंटा हुआ है, जातियों में विभाजित है। उसके बीच धर्मों की दीवारें खड़ी हुई हैं। सांप्रदायिक द्वेष है, वर्ग-संघर्ष की तलवारें खिंची हुई हैं। बादशाहों और शासकों का स्थान नौकरशाही ले रही है। दिलों के अंदर अंधेरे हैं। छोटे-छोटे स्वार्थ और दंभ हैं, जो मनुष्य को मनुष्य का शत्रु बना रहे हैं। जब वह शासन, शहंशाहियत और प्रभुत्व से मुक्त होता है तो ख़ुद अपनी बदी का गुलाम बन जाता है। इसलिए उसको एक नए विश्वास, नई आस्था और नए प्रेम की आवश्यकता है जो उतना ही पुराना है जितनी कबीर की आवाज़ और उसकी प्रतिध्वनि इस युग की नई आवाज़ बनकर सुनाई देती।

कबीर को अपने नाटक कबिरा खड़ा बज़ार में के जरिए आम आदमी का साथी बताने वाले सुप्रसिद्ध लेखक भीष्म साहनी कहते हैं - मेरी समझ में कबीर का आध्यात्म मूलत: उनकी मनुष्य मात्र के प्रति समदृष्टि, प्रेमभाव, भक्तिभाव और व्यापक धर्मेतर दृष्टि से ही पनपकर निकला है। उनके बाह्याचार विरोधी पद, भक्तिभाव के पद और आध्यात्मिक पद एक ही भूमि से उत्पन्न हुए हैं, एक ही मूल दृष्टि की उपज हैं। इस तरह वे एक-दूसरे से अलग न होकर, एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। हमारे यहां एक ऐसी प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया जाता है, जहां हम किसी महापुरुष को उसके काल और स्थान के सन्दर्भ से काटकर उसकी सामाजिक भूमिका गौण बनाते हुए, उसे आध्यात्म के आकाश में विचरते दिखाना चाहते हैं। ऐसा हाल ही में गांधीजी के सम्बन्ध में भी जान-बूझकर किया जा रहा है। देश के स्वतन्त्रता संग्राम में उनकी विराट भूमिका पर बल न देकर, जिसमें उन्होंने संसार की सबसे शक्तिशाली साम्राज्यवादी सरकार के विरुद्ध देश के लाखों-लाख लोगों को खड़ा कर दिया और देशवासियों में एक नई रूह फूंक दी, उनकी सत्य और अहिंसा सम्बन्धी मान्यताओं को, देश और काल से काटकर, प्रमुखता देते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने की औपचारिकता निभाई जाती है। यह गांधीजी के प्रति घोर अन्याय है। कबीर के साथ भी ऐसा ही करने की प्रवृत्ति पाई जाती है, जो हाल ही में कबीर-जयंती के समय प्रस्तुत रेडियो और टेलीविजन के कार्यक्रमों में लक्षित हुई। अपने काल के यथार्थ से और उस यथार्थ के विरुद्ध उनके विकट संघर्ष को न दिखाकर कबीर को ब्रह्म में लीन अध्यात्म के गायक सन्त के रूप में दिखाना कबीर के साथ भी अन्याय करना ही है।
कबीर बिना डर बेबाकी से अपनी बातें कहते हैं यदि आज के समय में कबीर होते तो शायद ही उन्हें इतनी अभिव्यक्ति की आजादी मिली होती। उनके प्रतिरोध को किसी न किसी कानून की आड़ में दबाया जाता। तब भी कबीर यही कहते-
कबीर तूं काहे डरै, सिर पर सिरजनहार।
हाथी चढि़ करि डोलिए, कूकर भुकै हजार।
कबीर सोई पीर है जो जानै पर पीर।
जो पर पीर न जानई, सो काफिर बेपीर।।