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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - अनुशासित वर्दीधारियों के बगावती तेवर

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - अनुशासित वर्दीधारियों के बगावती तेवर

- सुभाष मिश्र

कुछ कहा भी न जाये और सहा भी न जाए



हमारा संविधान सभी को अभिव्यक्ति की आजादी देता है। अपनी बातों को रखने के लिए शासकीय सेवक संगठन बना सकते हैं। समय आने पर आंदोलन कर सकते हैं, विरोध दर्ज करा सकते हैं। किन्तु वर्दीधारी पुलिस बल को यह इजाजत नहीं है, इसलिए उन्हें कई बार अपनी मांगों के समर्थन में अपने परिवार जनो को आगे लाना होता है। इधर छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ दिनों से पुलिस परिवार द्वारा चक्काजाम, आंदोलन, प्रदर्शन और सोशल मीडिया के जरिए अपनी बात शासन-प्रशासन तक पहुंचायी जा रही है। छत्तीसगढ़ के बस्तर से नियमित भर्ती के लिए शुरु हुआ पुलिस बल का आंदोलन धीरे-धीरे विस्तारित हो गया। कहने को तो ये आंदोलन खत्म हो गया, परन्तु इसकी आग अंदर-अदर ही सुलगती नजर आती है।

हमारे देश की वर्दीधारी सरकारी मशीनरी से जुड़े किसी भी को संगठन बनाने, अपनी मांगों के लिए आंदोलन आदि करने की छूट नहीं है। सिविल सेवा आचरण नियम के अंतर्गत ऐसा करना अपराध है। बावजूद इसके अलग-अलग राज्यों में पुलिस बल तथा कई बार सेना के अलग-अलग विंग से मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था और अपनी मांगों के लिए असंतोष, आंदोलन के स्वर सुनाई दिखाई देते है। सोशल मीडिया आने के बाद से ऐसे बहुत से वीडियो वायरल हुए हैं जो कारपेट के नीचे की अंदरुनी सच्चाई ,गंदगी को बताती है। वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा अपने मातहत के साथ बदसलूकी, मारपीट, अभद्र व्यवहार से लेकर खाने-पीने की चीजों में गुणवत्ता का अभाव, नियम विरुद्ध की पूरी अवकाश की पात्रता के बावजूद अवकाश नहीं मिलना, काम का दबाव और परिवार के लिए बुनियादी सुविधाएं नहीं जुटा पाने की छटपटाहट के चलते बहुत बार वर्दीधारी लोग कड़े अनुशासन और अनदेखी के चलते आत्महत्या या अपने साथियो की हत्या के लिए आमदा नजर आते है। सेना और पुलिस बल से जुड़े लोगों ने अब अपनी मांगों के लिए अपने परिवारजनों को आगे कर आंदोलन का रास्ता अपनाया है। अभी तक 11 आंदोलनकारियों को जेल भेजा जा चुका है। आंदोलनकारियों में से कुछ लोग सोशल मीडिया पर अभद्र टिप्पणी कर रहे थे।

छत्तीसगढ़ में सहायक पुलिसकर्मियों ने सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए आंदोलन कर काला बिल्ला लाकर काम किया। वर्ष 2017 में सहायक पुलिस अति नक्सल प्रभावित क्षेत्र में अनुबंध पर की गई है। इनका मानदेय दस हजार रुपए है। इसके अलावा अन्य कोई नहीं है। इनकी अनुबंध के आधार पर भर्ती हुई थी। 2020 में आंदोलन करने पर इन्हें दो साल का सेवा विस्तार मिला था। एक वर्ष पूर्ण होने के बाद अभी तक सहायक पुलिस का सेवा विस्तार नहीं किया गया, जिसके कारण आंदोलन शुरु हुआ। इस आंदोलन का विस्तार पुलिस परिवार के रुप में हुआ। पुलिस के आंदोलन में वर्दीधारी सीएफ, डीएफ, सहायक आरक्षक, एसटीएफ, जेल प्रहरी और नगर सेना के परिवार जवान अप्रत्यक्ष रुप से शामिल है, आंदोलन से उपजी स्थितियों से निपटने के लिए राज्य सरकार ने हाई पावर कमेटी का गठन किया है।

राज्य सरकार ने आरक्षकों की पदोन्नति का रास्ता साफ किया, बावजूद इसके पुलिस परिवार के लोग एक बार फिर राजधानी की सड़क पर उतर आये थे। इसके द्वारा कुछ दिनों पूर्व नेशनल हाईवे पर करीब तीन घंटे तक जाम किया गया। पुलिस परिवार के लेागों की मांग है कि वेतन विसंगति को दूर किया जाए, इसके अलावा अन्य विभागों की तरह साप्ताहिक छुट्टी दिए जाने की मांग है। पुलिस कर्मियों की महिलाओं ने कहा कि पुलिस से केवल ड्यूटी कराई जाए। उनसे अधिकारियों के घरों का काम कराने पर रोक लगाई जाए। इसके अलावा सप्ताह में एक दिन छुट्टी दी जाए जिससे वह परिवार को समय दे सके।

पुलिस प्रमुख रहे प्रकाश सिंह कहते है कि पुलिस से लिए जाने वाले ड्यूटी का समय निर्धारित नहीं होने से पुलिसकर्मियों की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है। लंबी ड्यूटी, बढ़ते काम के दबाव और पारिवारिक चिंता ने पुलिस वालों की सेहत बिगाड़ दी है। बढ़ते तनाव की वजह से पत्नी और बच्चों को बात-बात पर डांटते और झिड़क देते हैं। पुलिसकर्मियों में अनिद्रा, तनाव, शुगर और बीपी की बीमारी बढ़ती जा रही है। दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में पुलिसकर्मियों के आत्महत्या के मामले बढ़े हैं। आज पुलिस अफसर और निचले कर्मचारियों के बीच दूरी बढ़ गई है। इस वजह से समस्या आ रही है।

पुलिस परिवार का आंदोलन सड़क से सोशल मीडिया पर आ गया। महासमुंद के खल्लारी थाने में पदस्थ एक आरक्षक ने एक महिला पुलिस अधिकारी के खिलाफ अभद्र टिप्पणी कर वीडियो अपलोड किया। पुलिस ने उसे खिलाफ धारा 509(ख) के तहत मामला दर्ज किया और उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। पुलिस परिवार द्वारा भाठागांव में किये गए प्रदर्शन के आरोपी और इस आंदोलन का नेतृत्व करने वाले, उज्जवल दीवान सहित आरक्षक अन्य लोगों को गिरफ्तार कर उनके विरुद्ध पुलिस द्रो उद्दीपन अधिनियम और धारा 109, 505(1)126(बी) के तहत प्रकरण दर्जकर उन्हें जेल भेज दिया। भाठागांव में प्रदर्शन के दौरान एक प्रशिक्षु महिला आईपीएस के साथ झुमा-झटकी और एक महिला सब इंस्पेक्टर के साथ मारपीट का वीडियो वायरल हुआ था।
कहावत है कि सैया भये कोतवाल तो कर काहे का किन्तु यहां मामला कुछ उल्टा ही है। पुलिस परिवार के लोग संभावित कार्यवाही से डरे हुए है। वे बाकी सरकारी कर्मचारियों की 2500 ग्रेड पे की मांग कर रहे है। इनका वेतनमान मध्यप्रदेश की तुलना में कम है। जो लोग नक्सल प्रभावित इलाके में पदस्थ है। वे अपने बाकी साथियों की तरह आउट ऑफ टर्न प्रमोशन चाहते है।

नक्सल क्षेत्र में पुलिस बल का 60 प्रतिशत अमला पदस्थ है। पुलिस परिवार के लोग सरकार की घोषणा के अनुरुप साप्ताहिक अवकाश भी चाहते है। बहुत सारे पुलिस कर्मी जो आंदोलन में शामिल तो नहीं किन्तु अप्रत्यक्ष रुप से अपने आंदोलनरत साथियों, परिवार को समर्थन कर रहे है। दरअसल वर्दीधारी अनुशासित का डर के साथ यही विडंबना है कि कुछ कहा भी न जाये और सहा भी ना जाये। छत्तीसगढ़ में अधिकारी-कर्मचारी मिलाकर 72 हजार पुलिसकर्मी अलग-अलग जगह तैनात है। सरकार ने सहायक आरक्षकों को आरक्षक बनाने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पहल आगे बढ़ाया है।

यूं तो प्रशासनिक सुधार के लिए समय-समय पर बहुत सी कमेटी आयोग बने है किन्तु पुलिस व्यवस्था में व्याप्त शोषण, लालफीताशाही और अनुशासन के नाम पर होने वाली ज्यादतियो को लेकर कोई कमी नहीं आई। अंग्रेजों द्वारा लागू पुलिसिया नियम और व्यवस्थाएं बहुत हद तक यथावत है। यही वजह है कि पुलिस की छवि अभी भी मित्र की नहीं बन पाई है। पुलिस को देखकर लोग मदद के लिए कम मजबूरी की वजह से ज्यादा जाते हैं। इसके उल्ट पुलिस बल का बहुत बड़ा हिस्सा चुस्त-दुरूस्त रहकर मुस्तैदी के साथ हमारी आंतरिक सुरक्षा की चिंता करता है। पुलिस बल बेहतर तरीके से काम कर सके इसके लिए जरुरी है कि उनकी जायज मांगो पर तत्काल विचार करके उनका निराकरण किया जाये।