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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -मुख्यमंत्री बदलने से क्या सियासत बदल जायेगी?

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -मुख्यमंत्री बदलने से क्या सियासत बदल जायेगी?

-सुभाष मिश्र
राजनीतिक पार्टियां अपनी साख, अपने घोषणा-पत्र, अपने कॉडर और अपने नेताओं की छबि और चुनावी समीकरण, इंजीनियरिंग के आधार पर चुनाव लड़ती है। आजकल चुनाव से पूर्व प्रशांत किशोर जैसे विशेषज्ञों की राय भी मायने रखने लगी जिसकी ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर पार्टी नेताओं, मुद्दों का चयन होता है। कभी-कभी मुख्यमंत्री तक बदले जाते हैं। अभी हाल ही में देश की सबसे बड़ी और सबसे ज्यादा राज्यों में सत्तासीन भाजपा ने गुजरात के मुख्यमंत्री और सारे मंत्रियों को बदल दिया। इसके पहले उत्तराखंड कर्नाटक में भी मुख्यमंत्री बदले गये। कांग्रेस ने अपने सबसे वरिष्ठ नेता केप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर दलित मुख्यमंत्री के रूप में चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाया। कांग्रेस ने यहां पहली बार दो उप मुख्यमंत्री भी बनाये हैं जिसमें से एक जाट समुदाय के नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा और दूसरे हिन्दू नेता ओपी सोनी हैं। इसके पहले उत्तरप्रदेश मेें सभी राजनैतिक पार्टियों ने ब्राम्हण वोटरों को लुभाने के लिए बहुत सारे उपक्रम किये हैं। देश में अब धर्म जाति की राजनीति चरम पर है। जो नेता वोट दिला या करवा सकता है उसके इर्द-गिर्द वहां की राजनीति सिमट रही है केंद्रीय नेतृत्व राज्यों की बागडोर प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से अपने हाथ में रखना चाहता है। वह नहीं चाहता कि राज्य में उसका कोई नेता इतना लोकप्रिय हो जाये कि वह केंद्रीय नेतृत्व को चुनौती देकर ममता बैनर्जी की ही तरह आपना राज्य कायम कर ले।

भारतीय राजनीति में मूल्यहीनता अब पराकाष्ठा की ओर बढ़ रही है। स्वाधीनता-संग्राम के मूल्यों का विध्वंस हो चुका है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के दौर में लोकतंत्र की प्रतिष्ठा के अनेकानेक प्रयत्न हुए। लोकतंत्र की बुनियाद उन्ही मूल्यों की ज़मीन पर रखी गई थी। नेहरू युग में स्थापित इन मूल्यों में राजनीतिक शुचिता को भी पर्याप्त महत्व दिया गया था लेकिन धीरे-धीरे दांव-पेंच तिकड़म और चालबाजी को राजनीतिक कौशल की तरह अपनाया जाने लगा। खासतौर से चुनाव के संदर्भ में तिकड़मबाजी को अवगुण की तरह देखने-बरतने का रिवाज ख़त्म हो गया। एक तरफ जहां अब चुनाव में ही लोकतंत्र के समूचे मर्म और अर्थ को समेट दिया गया, वहीं दूसरी तरफ रणकौशल को चुनाव जीतने का कारगर नुस्खे के तौर पर ज़रूरी मान लिया गया। इस तरह जनता को जाति और धर्म के आधार पर बांटकर देखने और एक-दूसरे को छकाने का खेल शुरू हुआ। राजनीति अब जनता को बांटने का माध्यम बन गई। मुश्किल यह है कि इसे लोकतंत्र के अवमूल्यन के रूप में देखने की बजाय लोकतंत्र की स्वाभाविक परिणति माना गया। इसे लेकर कोई बेचैनी भी नहीं है। बल्कि इस तरह के गर्हित खेल को सोशल इंजीनियरिंग का नाम देकर गौरवान्वित किया जाता है। कोई भी दल अब इससे अछूता नहीं रह गया है। इसलिये किसी भी चुनाव के पहले अगर कोई दल बहुसंख्यक मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए उनकी धार्मिक या जातिगत पहचान को ध्यान में रखकर नेतृत्व-परिवर्तन करता है तो इसमें कोई अचरज नहीं। हाल ही में कुछ राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों के पहले भाजपा और कांग्रेस द्वारा मुख्यमंत्री बदले जाने को इसी संदर्भ में देखना चाहिए। जनता की राजनीतिक चेतना को विकसित करने की बजाय अब उसे राजनीतिक अशिक्षा का शिकार बना कर भेड़ों के झुंड में बदल दिया गया है।

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी को अचानक अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। गुजरात में बीजेपी ने सरकार के खिलाफ लोगों में नाराजगी की काट के लिए नया चेहरा भुपेंद्र पटेल के रूप में लाया है। पिछले 6 महीने में बीजेपी ने 4 मुख्यमंत्री बदल दिए हैं। गुजरात के रूपाणी से पहले कर्नाटक में जुलाई में बीएस येदियुरप्पा को कुर्सी छोडऩी पड़ी। लिंगायत समुदाय के बड़े नेता और दक्षिण में पहली बार भाजपा को सत्तासीन करने वाले येदियुरप्पा की जगह अब उनके ही करीबी नेता बीएस बोम्मई को कुर्सी सौंपी गई है।

उत्तराखंड में पहले तीरथ सिंह रावत को हटा दिया गया, मार्च में ही त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटाकर उन्हें सीएम बनाया गया था। वह अधिक दिन तक कुर्सी नहीं संभाल पाए। अब वहां पुष्कर सिंह धामी को जिम्मेदारी दी गई है।  

असम में सर्बानंद सोनेवाल जो पांच साल तक मुख्यमंत्री रहे और उन्हें चुनाव के बाद हटाकर हिमंत बिस्व सरमा को मुख्यमंत्री बना दिया गया।  
बीजेपी में सत्ता हस्तांतरण हुए तीन राज्यों और पंजाब की सियासी स्थिति में अंतर है। तीनों ही राज्यों में बीजेपी ने चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ा था, लेकिन पंजाब में स्थिति एकदम उलट है। यहां कांग्रेस का मतलब ही कैप्टन अमरिंदर सिंह हैं और राज्य में साल 2017 के चुनावों में पार्टी की जीत कैप्टन की जीत थी। कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा को हटाकर नया सीएम नियुक्त किया है। येदियुरप्पा कर्नाटक में जनाधार वाले नेता होने के साथ-साथ लिंगायत समुदाय के है जिसका वहां बड़ा जनाधार है।

आम आदमी पार्टी का कहना है कि अरविंद केजरीवाल मॉडल के डर से कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को उन राज्यों में अपने मुख्यमंत्री बदलने पर मजबूर होना पड़ा है, जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं।

टीएमसी की स्थापना साल 1998 में हुई थी। कांग्रेस में 25 साल रहने के बाद पार्टी से अलग हुई ममता बनर्जी की पार्टी को बंगाल में सत्ता 2011 में हासिल हुई। 2011 में टीएमसी ने 34 सालों से बंगाल की सत्ता पर काबिज वामपंथी सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। अब पश्चिम बंगाल में टीएमसी वर्सेस भाजपा हो गया है वहां माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस लगभग हाशिये पर है।

भारतीय राजनीति के दिग्गज नेताओं में शामिल अर्जुन सिंह जो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री समेत राज्य और केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे। एक समय ऐसा भी आया, जब अर्जुन सिंह एक दिन के लिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने और अगले दिन उन्हें दूसरे दिन मुख्यमंत्री पद से हटाकर पंजाब का राज्यपाल बना दिया गया। उनकी जगह राजनीति सौम्य समझे जाने वाले कम चर्चित मोतीलाल वोरा को आला कमान ने मुख्यमंत्री की कमान सौंप दी। उमा भारतीय जो कि रामजन्मभूमि आंदोलन की फायरब्रांड नेता थी उन्होंने 2003 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को दो-तिहाई सीटें जीतने के बाद मध्यप्रदेश में सत्ता सौंपी थी और एक साल बाद ही उन्हें मुख्यमंत्री के पद से त्यागपत्र देना पड़ा। उनके स्थान पर शिवराज सिंह चौहान को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। उमा भारतीय तब से अब तक मध्यप्रदेश की राजनीति से बाहर है। राजनीति में पुर्नवास बड़ी मुश्किल से होता है। एक बार जो सत्ता की रेस में बाहर हो गया उसे सत्ता के केंद्र में आने के लिए बहुत से पापड़ बेलने पड़ते हैं। बहुत बार अपनी पूछपरख के लिए पार्टी से बगावत तक का झंडा उठाना पड़ता है या फिर राज्यपाल आदि का पद पाकर संतुष्ट होना पड़ता है।

दरअसल अब अधिकांश राजनीतिक पार्टियां चुनाव से काफी पहले तरह-तरह के सर्वे कराती है। पीआर कंपनियों की मदद से ऐसे चेहते मुद्दे तलाशती है जो जीत का मार्ग प्रशस्त करें। मुख्यमंत्रियों के बदलाव को भी इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए।