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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - कोरोना अब लाँछन नहीं भय और अवसाद का कारण बना

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - कोरोना अब लाँछन नहीं भय और अवसाद का कारण बना

सुभाष मिश्र
कोरोना काल के एक वर्ष से अधिक के अनुभव से हम जान गए हैं कि इस महामारी ने समाज की अनेक गोपन परतों को उघेर दिया है। राजनीतिक नेतृत्व की स्वार्थपरता, अदूरदर्शिता और बेरहमी से लेकर पूंजीपतियों की संवेदनहीनता, कामगारों-बेरोजगारों की अकथ पीड़ा, असंगठित मज़दूरों के प्रति निष्ठुरता, मध्यवर्ग की आत्मलिप्सा, अर्थतंत्र की दुर्गति और युवाओं की भविष्यहीनता और सबसे ऊपर पर्याप्त समय और अवसर मिलने के बावजूद देश में सर्वत्र स्वास्थ्य-ढाँचे के सर्वनाश के अनेक मंजऱ हमने देखे हैं। अब ऐसी स्थिति आ गयी है कि लगता है राष्ट्र फलक पर कोई पेंडेमिक फि़ल्म चल रही है और हम सब उसके बलात किऱदार बना दिये गए हों।

जब हमारे देश में कोरोना की पहली लहर आई थी और किसी को भी कोरोना के लक्षण दिख रहे थे, तो वह एक तरह का सोशल स्टिगमा यानी लाँछन का कारण बन गया था। सारा समाज ऐसे लोगों को छूआछूत की नजऱ से और सोशल मीडिया पर फैलाई नफऱत के कारण मानव बम समझ रहा था। रायपुर जैसे शहर में कोरोना में पहली पॉजि़टिव पाई गई लड़की के परिवार को बहुत सफ़ाई देनी पड़ी थी। दिल्ली के मरकज़ से निकले तबलिगी समाज को पूरे देश में आंतकवादियों की तरह ढूँढा जा रहा था। कोरोना संक्रमण का बहाना लेकर हिन्दू मुस्लिम के बीच वैमनस्यताफैलाने की भरपूर कोशिश हुई थी।
लेकिन कोरोना की दूसरी लहर के बाद जब पड़ोस ही संक्रमण का शिकार हो गया हो और हर तीसरे-चौथे घर के बाद मरीज़ मिल रहे हों, तब यह लाँछन-बोध सामुदायिक स्तर पर गहरे भय और अवसाद में बदल चुका है। कोरोना का दाग अब इक्के-दुक्के पर नहीं बहुतों पर लग चुका है। कल जो लांछित महसूस करते थे, आज वे भुक्तभोगी की भूमिका में दूसरे भुक्तभोगी के कष्ट में समवेदना की राहत महसूस करते हैं कि वे अब अकेले भुक्तभोगी नहीं हैं। जो भुक्तभोगी नहीं हुए हैं, वे भयभीत हैं। कोरोना का भय धीरे-धीरे आसन्न मृत्यु के भय में बदल रहा है। कोरोना मौत काडर दिखा रहा है। साल भर पहले घण्टी बजाने के कर्मकांड के दौरान का संकल्प हवा हो चुका है। सामुदायिकता बिखर गयी है। सरकारें अपने सामाजिक दायित्व का बस निर्वाह कर रही हैं। उनकी ज़्यादा दिलचस्पी अपने राजनीतिक दायित्व का निर्वाह करने में है। जनता अलग-थलग पड़ती जा रही है। वह या तो घरों में कैद कर दी गयी है, या अस्पतालों-श्मशानों में भटक रही है। हमारी सिविल सोसायटी के बहुत से जि़म्मेदार दृश्य से लगभग ग़ायब हैं। वे लोग जो अनेक अवसरों पर कलफदार झक सफ़ेद कपड़ों में, राजभवनों में, सार्वजनिक समारोह में बहुत सक्रिय दिखते थे, वे लगता है ख़ुद आईसोलेशन में चले गये हैं। ऐसे में कोई मदद का हाथ बढ़ता है, तो लगता है, इंसानियत अभी लहुलुहान ही सही, जीवित है।
कोरोना की दूसरी लहर में हमारा सामाजिक बोध लडख़ड़ाने लगा है। अपनी जान बचाने की ऐसी जद्दोजहद कि घर से अस्पताल में भर्ती होने के लिए गए मरीज़ का जि़ंदा लौटना गनीमत है। कोरोना ने अगर जान ले ली तो परिजनों को अंतिम मुख-दर्शन दुश्वार हो जाये। इस भयावह स्थिति की कल्पना भी न थी। ऐसी आपदा में कैसी दु:खद विडम्बना है कि लचर स्वास्थ्य-प्रबंधको सम्हालने में सरकारी मशीनरी हाँफ रही है, और दूसरी तरफ़ निजी अस्पताल मुनाफ़े की हवस में इंसानियत को दग़ा देने में कतई हिचक महसूस नहीं कर रहे।

सरकार द्वारा घोषित सारी दरें बेमानी साबित हो रही हैं। जिन्हें मुनाफ़ा कमाना हैं, वे डर का फ़ायदा उठाकर बहुत से तरीक़ों से पैसा कमा रहे है। एक तरफ़ भीषण दबाव में हलकान स्वास्थ्य अमला है तो दूसरी ओर बेरहम पूंजीवादी स्वास्थ्य तंत्र। सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति राजसत्ता को जवाबदेही से मुक्त करने की नव उदारवादी सैद्धांतिकी ने कल्याणकारी राज्य का शीराज़ा बिखेर दिया है, और वह कोरोना से ज़्यादा कहर बरपा रही है। सार्वजनिक क्षेत्र के नष्ट कर दिए जाने की प्रक्रिया में प्रसन्न मध्यवर्ग अभी भी निजी क्षेत्र के सम्मोहन में बँधा हुआ है। बावजूद इस तथ्य के कि कोरोना ने उसकी बचत को लूटने का पूरा इंतज़ाम कर लिया है। इसी मध्यवर्ग से वह अंधभक्त आबादी आती है जो राज्य व्यवस्था की कमज़ोरी और संवेदनहीनता पर सवाल उठाने वालों कोनफरत की निगाह से देखती है। अब हमारे यहाँ सवाल उठाना भी एक तरह से अपराध सा हो गया है। देशभर में हो रही बहुत सारी गतिविधियों को देखकर आपको अपना सिर पीटने का मन होता है। हरिद्वार के कुंभ से लेकर चुनाव रैलियाँ हमें हमारी बेवकूफिय़ों की याद दिला रही हैं। ऐसी ही ग़लतियों हमने पिछले साल भी की थी। यही मध्यवर्ग साल भर पहले घण्टी और थाली बजाते हुए अपने घरों में अंधेरा कर फिर दीपक जला कर कोरोना को भगाने का टोटका कर रहा था। आज झाड़-फूंक सरीखे इस घोर अवैज्ञानिक कृत्य के व्यर्थ हो जाने और कई गुना घातक रूप में महामारी की वापसी के बाद किसी को ग्लानि भी नहीं है। अजब है कि कोरोना की पहली लहर में उसे कथित सामुदायिक इच्छाशक्ति से भगाने का आह्वान करने वाले वर्ग के लोग कोरोना संक्रमित होने के बाद तब ठीक वैसा ही अनुभव करते थे, जैसे आदिम समाज में प्रेतबाधा ग्रस्त होने पर पीडि़त व्यक्ति स्वयं को लांछन का शिकार महसूस करता था। कोरोना के दैहिक आक्रमण से ज़्यादा चिंताजनक यह सामाजिक लाँछन था। वह भी ऐसे समय में जब कोरोना के बारे में मीडिया तमाम वैज्ञानिक और चिकित्सकीय जानकारी की बमबारी कर रहा हो। लगता है, भारतीय समाज आज भी अपने आदिम संस्कारों से मुक्त नहीं हो सका है।