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ध्रुव शुक्ल की कविताः ऐसी ही यह दुनिया हमने पायी है

ध्रुव शुक्ल की कविताः ऐसी ही यह दुनिया हमने पायी है


उसे छोड़कर कोई कहीं नहीं जाता

सब उसके भीतर आते-जाते रहते हैं

सब रचते हैं अपने-अपने घावों को

सब अपने-अपने भावों को ही भजते हैं

सब डूबे हैं अपनी-अपनी बातों में

जिसके जी में जो आये सो कहते हैं

ऐसी ही यह दुनिया हमने पायी है


कोई इस दुनिया में 

होकर रहता है इस दुनिया का

कोई इस दुनिया में

खोकर रहता है इस दुनिया को


हम उपमा देकर ठगे गये


दुनिया की सबसे महंगी ख़राब पेंटिंग Worst Painting Of World

हम अपने को छोड़

अपने-से बाहर चले गये!

अपने कल्पित सच हमको

ऐसे लगे नये

धरती के भाग जगे जैसे!

कल्पित महिमा गायी हमने

जैसे हों सब प्रेम पगे!

कहीं नहीं था अपना कोई

मान लिया हैं सभी सगे!

किसी और ने नहीं छला

हम अपने-से ही छले गये

कहाँ ख़ुदाई जान सके हम

उपमा देकर ठगे गये!