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ऋतुकाल की बाँसुरी में बसा जीवन-राग

ऋतुकाल की बाँसुरी में बसा जीवन-राग

*ध्रुव शुक्ल*


जन्म और मृत्यु के बीच मनुष्य में यह जानने की उत्कण्ठा रही है कि इस सृष्टि का आलाप क्या है, राग की वह उपज क्या है जिससे एक पूरी बंदिश प्रकट होकर जीवन पर छा जाये? ऋतुकाल में बसा यह राग हमारी वाणी में, दृष्टि में, श्रुति में और मन में प्रतिष्ठित होता रहता है। यह सृष्टि किसी की कल्पना नहीं, एक अखण्ड वास्तविकता है। इसे खण्डित करके कोई बेसुरी बाज़ारू धुन कल्पित करने से जीवन विखण्डित होने लगता है। फिर लोग दुनिया में आकर कई पीढ़ियों तक खटते-खपते तो रहते हैं पर जीवन का संगीत खो जाता है।


जीवन एक धुन है जो ऋतुकाल की बाँसुरी के छह सुरों ...गीष्म, वर्षा, शरद, शिशिर, हेमन्त और बसन्त में बसी हुई है। यह धुन बार-बार प्रत्येक संवत्सर में जीवन का स्पर्श करती है और जीवन को यह स्पर्श साधना पड़ता है। यह सृष्टि एक गहरे कुण्ड जैसी है जिसमें सब रूप अपने-अपने आयतन में डूबे हैं। यह सृष्टि संयम में फलित होती है और तृष्णा में मुरझाने लगती है। 


आधुनिक 'शैतानी सभ्यता' जो नया किस्सा गढ़ रही है, उसके पात्र तृष्णा के विस्तार में जन्म ले रहे हैं और मर भी रहे हैं। ये पात्र सभी जीवन रूपों से समवेदित नहीं हो सकते। जीवन एक चक्र है, वह सीधी रेखा पर नहीं चलता। जीवन घूम रहा है। वह अपने बीच से किसी को पीछे छोड़कर आगे नहीं ले जाया जा सकता। वह सबके पास ही लौट सकता है। पर उसे एक सीधी रेखा पर दौड़ाकर शारीरिक और मानसिक रूप से भयभीत करके उसमें बसे प्रेम के उद्यान को उजाड़ा जा रहा है। असुरक्षा और अनिश्चितता से भरते जा रहे जीवन के उपवन में राजनीति की बदसूरत खरपतवार उग रही है। परस्पर आश्रित जीवन को निराश्रितों के शिविर में क्यों बदला जा रहा है?


गाँव को देखो, वह एक गोलाई में बसता है। सीधी रेखा पर तो शहर ही बसाये जाते हैं। जब गाँव पर विपत्ति आती है तो सब अपने घरों से निकलकर खुले मैदान में सबके बीच खड़े हो जाते हैं और शहर एक-दूसरे को पीछे छोड़कर भागता है। अभी महामारी काल में हमारे भाईबंद शहरों से अपने गाँवों की ओर ऐसे ही तो भागे हैं। पृथ्वी पर सीधी रेखा में भरते बाज़ारों में कोई किसी को नहीं पहचानता। पर एक गोलाई में भरते गाँव-कस्बों के हाट में कोई दुआ-सलाम के लिए नहीं तरसता। घूम-फिरकर सब किसी न किसी पगडण्डी पर मिल ही जाते हैं। 


अपनी सत्ता के भूखे दुनिया के मुट्ठी भर नेताओं, विक्रेताओं और अधकचरे प्रणेताओं ने समूचे जीवन के स्वभाव को भूलकर कितने तरह के राज-काज, धर्म-अधर्म, जन्नत और दोजख़, विवशता और लूट, पाप और पुण्य, नैतिकता और बेशर्मी, वाद-विवाद, नकली प्रतिभा और तकनीक के ईजाद, ग़ुलाम और आज़ाद, तानाशाही और समाजवाद, विवेकशून्य नायक और पीठाधीश्वर पूज्यपादों का बाज़ार लगाया और कुछ ही सदियों में अपने स्वराज्य से विच्छिन्न होकर अपनी लोककला में दक्ष बहुरंगी हुनरमंद जीवन बिखरने लगा। 


जीवन का शोध सिर्फ इतना ही रह गया है कि बाज़ार के पक्ष में सृष्टि और मनुष्य के शरीर को कैसे मोड़ा जाये। इसके लिए नयी जुगलबंदियाँ रची जा रही हैं, कपट कौशल और रोबोट तंत्र, असंयमित महत्वाकांक्षा और प्रतियोगिता, नस्ल और घृणा. राजनीति और राष्ट्रवाद, धर्म और पाखण्ड, हिंसा और प्रतिहिंसा, विध्वंस और विकास, कामुकता और क्रूरता, मर्ज़ और कर्ज़, महँगा इलाज और बीमा भरे बाज़ार में अपना दीर्घ आलाप ले रहे हैं और जीवन की साँसें रुँधती जा रही हैं। आक्सीजन और दवाओं के काले बाज़ार में मरते लोगों से भारत के निर्लज्ज और संवेदनहीन नेता अपनी सत्ता बचाये रखने के लिए वोट माँग रहे हैं।


ऋतुकाल से अभी भी बाँसुरी की टेर सुनायी देती रहती है जिसके छह सुरों में जीवन का दीर्घ आलाप बसा हुआ है। इस आलाप को हम भारत के लोग मिलकर आज भी साध सकते हैं। जीवन बाँस की पोरों जैसा ही है। बढ़ते हुए बाँस के बीच बनती पोरें जब आपस में जुड़ी रहकर सहज ही पकती हैं तो प्रत्येक पोर में बाँसुरी होने की संभावना भी बनी रहती है। भारत के इतिहास की भागवत धारा में अन्याय के विरुद्ध बाँसुरी एक आजमाया हुआ अस्त्र है।