विष्णु नागर की कविता महा पलायन : गाँव की ओर

विष्णु नागर की कविता महा पलायन : गाँव की ओर


जैसे आंधी से उठी धूल हो

लोग शहर से गाँव चले जा रहे हैं 

जैसे 1947 फिर आ गया हो 

लोग चले जा रहे हैं 

भूख चली जा रही है  

आंधी चली जा रही है 

गठरियाँ चली जा रही हैं

झोले चले जा रहे हैं

पानी से भरी बोतलें चली जा रही हैं

जिन्होंने अभी खड़े होना सीखा है

दो कदम चलना सीखा है

जिन्होंने अभी- अभी घूँघट छोड़ना सीखा है

जिन्होंने पहली बार जानी है थकान

सब चले जा रहे हैं गाँव की ओर


कड़ी धूप है ,लोग चले जा रहे हैं 

बारिश रुक नहीं रही है 

लोग भी थम नहीं रहे हैं 

भूख रोक रही है 

लोग उससे हाथ छुड़ा कर भाग रहे हैं 

महानगर से चली जा रही है उसकी नींव

उसका मूर्ख आधार हँस रहा है


 उसका बेटा चला जा रहा है

 मेरी बेटी चली जा रही है

आस टूट चुकी है 

आँखों में आँसू थामे

चले जा रहे हैं लोग

बदन तप रहा है

लोग चले जा रहे हैं

चले जा रहे हैं कि कोई 

उन्हें देख कर भी नहीं देखे

 चले जा रहे हैं लोग

आधी रात है 

आँखें आसरा ढूँढना चाहती हैं

पैर थकना चाहते हैं

भूख रोकना चाहती है

कहीं छाँव नहीं है

रुकने की बित्ता भर जमीन नहीं है

लोग चले जा रहे हैं


सुबह तब होगी

जब गांव आ जाएगा 

रोना तब आएगा

जब गांव आ जाएगा

थकान तब लगेगी

बेहोशी तब छाएगी

जब गांव आ जाएगा

हाथ में बीड़ी नहीं 

चाय का सहारा नहीं होगा

800 मील दूरी फिर भी

पार हो जाएगी

गांव आ जाएगा

 

एक नर्क चला जाएगा

एक नर्क आ जाएगा 

अपना होकर भी 

जो कभी अपना नहीं रहा

वह आसमान आ जाएगा 

गांव आ जाएगा


एक दिन फिर लौटने के लिए

गाँव आ जाएगा

फिर आँधी बन  लौटने के लिए

गांव आएगा

मौत आ जाएगी

शहर की आड़ होगी

गाँव छुप जाएगा।

चित्र : Manoj Kulkarni