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लॉकडाउन में पढ़ाई के लिए अनोखे प्रयोग- विवेक शर्मा

लॉकडाउन में पढ़ाई के लिए अनोखे प्रयोग- विवेक शर्मा


कोविड महामारी में बच्चे स्कूल नहीं जा पाए तो पढ़ाई का नुकसान कम करने की चुनौती से शिक्षक, सरकारें और माता पिता सभी जूझते नजर आए. इन चुनौतियों ने कई नई राहें भी खोलीं.

पिछले साल मार्च (2020) से बंद पड़े स्कूलों की वजह से जो सबसे बड़ी चिंता जताई जा रही है वो ये है कि पहली से आठवीं तक के छोटे बच्चे इस दौरान वो सब कुछ भूल सकते हैं जो उन्होंने लॉकडाऊन शुरू होने से पहले सीखा था.


खास तौर पर अंकों को जोड़ने-घटाने की क्षमता और भाषा पढ़ने की योग्यता जैसी आधारभूत बातें. इस नुकसान का असर मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे पहली से आठवीं तक के 50 लाख से अधिक विद्यार्थियों पर भी पड़ा है.


ऐसे में मध्य प्रदेश में कुछ अनूठी पहलें भी देखने को मिलीं. मसलन 'हमारा घर-हमारा विद्यालय' नाम से एक योजना को जुलाई 2020 से शुरू किया गया जिसमें शिक्षक पहली से आठवीं तक के छात्रों के मोहल्लों में पहुंचे, आस-पास के बच्चों को इकठ्ठा किया और पढ़ाई शुरू करवाई. इसे मोहल्ला क्लास और ओटला क्लास का नाम दिया गया.


कैसे चली ओटला क्लास

इंदौर के शासकीय मिडिल स्कूल नंबर 6 के प्राचार्य संजय महाजन बताते हैं कि कोविड काल के दौरान सबसे बड़ी चुनौती बच्चों से संपर्क बनाकर रखने की रही. चुनौती उन बच्चों को लेकर थी जिनके पास स्मार्ट फोन नहीं था. 96 विद्यार्थियों वाले इस स्कूल में 20 प्रतिशत ऐसे बच्चे थे जिनके पास एंड्रॉयड मोबाइल नहीं था. ऐसे बच्चों पर ज्यादा ध्यान दिया गया.


संजय बताते हैं कि जो बच्चे जुलाई 2020 में पहली कक्षा में भर्ती हुए, उन्होंने अभी तक स्कूल का मुंह नहीं देखा है. उनके घर जाकर ही दाखिला दिया गया और उनकी पढ़ाई भी घर पर हुई है. जिन बच्चों के पास मोबाइल फोन नहीं था, उनके घर जाकर शिक्षकों ने अपने मोबाइल के जरिए बच्चों को साप्ताहिक टेस्ट में शामिल किया.


जिन बच्चों के परिवार में स्मार्टफोन था उनके लिए हर क्लास का वॉट्सऐप ग्रुप बनाया गया और साथ में बच्चों के पैरेंट्स को भी उस ग्रुप में जोड़ा गया. साथ ही बच्चों को दूरदर्शन पर कार्यक्रम देखकर शिक्षकों को जानकारी देने का काम भी सौंपा गया. इस दौरान रेडियो के कार्यक्रमों में भाषा और गणित पर केन्द्रित कार्यक्रम भी प्रसारित किए गए. जिन बच्चों के पास मोबाइल फोन, टीवी या रेडियो नहीं था उनके घर पर वर्क बुक और टेक्स्ट बुक टीचर के माध्यम से पहुंचाई गई.

334 छात्राओं वाले शारदा कन्या माध्यमिक विद्यालय क्रमांक एक की प्रिंसिपल सरला नाईक बताती हैं कि छोटे बच्चों की समस्या ज्यादा रही. वह कहती हैं, "पहली, दूसरी और तीसरी के बच्चे भूल जाते हैं और ज्यादातर ये शिक्षकों पर ही निर्भर रहते हैं. उनका मन खेलने में ज्यादा रहता है. इसलिए इस दौरान बच्चों से ड्रॉइंग बनवाना, कहानी सुनाना और गेम्स खिलवाने जैसे रोचक चीजें करवाई गईं ताकि स्कूल बंद होने के बावजूद वे शैक्षणिक गतिविधियों से जुड़े रहें.”


लॉकडाउन के दौरान बच्चों के माता-पिताओं को दो-तीन महीने का राशन हर बच्चे के हिस्से के मुताबिक एक साथ दिया गया जिसमें गेहूं, दाल, चावल और तेल शामिल थे.


स्कूल बंद होने के बावजूद इस दौरान साप्ताहिक और मासिक टेस्ट भी बच्चों के घर पहुंचकर ही लिए गए. प्रश्नपत्र में भाषा और गणित के विषयों के बहुविकल्पीय सवाल थे. बच्चे टीचर के मोबाइल फोन पर ही किसी एक जवाब को चुनते और हाथों-हाथ नतीजा भी उन्हें बता दिया जाता. वार्षिक परीक्षा के लिए सभी विषयों की वर्कशीट बच्चों के घर जाकर वितरित की गई और पांच दिन के बाद बच्चों से वापस ली गई, जिसके बाद मूल्यांकन किया गया.


कोरोना महामारी के असर को जानने के लिए डालबर्ग ने भारत के दस राज्यों में कम आय वाले परिवारों की लगभग 15 हजार महिलाओं और 2,300 पुरुषों को सर्वे में शामिल किया.

हालांकि 'हमारा घर-हमारा विद्यालय' योजना पर तब विराम लग गया जब अप्रैल 2021 में दूसरी लहर के बाद लॉकडाउन लगा. इस दौरान वायरस का प्रकोप गंभीर था इसलिए इन मोहल्ला और ओटला क्लासेस को स्थगित रखा गया.


मोबाइल फोन बना माता-पिता की चिंता

बच्चों के माता-पिता भी पढ़ाई को लेकर चिंतित हैं. कपड़े सिलने का काम करने वाले और तीन लड़कियों के पिता घनश्याम बताते हैं कि उनके स्मार्टफोन नहीं है इसलिए घर पर पढ़ाई के लिए पास ही रहने वाले बच्चों के मामा के स्मार्ट फोन की मदद लेते हैं.


मजदूरी करके अपनी आजीविका चलाने वाली शारदा का बेटा सचिन छठी क्लास में है. वह बताती हैं एक ही मोबाइल फोन पर तीन बच्चों की पढ़ाई होती है. वह कहती हैं, "स्कूल बंद होने के बाद बच्चों का पढ़ाई में कम ही मन लगता है. स्कूल में अच्छी पढ़ाई होती है जो घर में नहीं हो पाती. बच्चा छठी क्लास का लगता ही नहीं है.”

एनसीईआरटी की प्रोफेसर ऊषा बताती हैं कि डिजिटल डिवाइड का मसला गंभीर है. वह कहती हैं, "जिन बच्चों के पास कोई डिवाइस नहीं है, उनके लिए रेडियो के कार्यक्रम सहायक हो सकते हैं. एनसीईआरटी की ओर से टीवी पर ई-विद्या चैनल शुरु हुए हैं जो कक्षा एक से 12वीं क्लास के लिए है. पैरेंट्स और कम्युनिटी के सदस्यों को भी पढ़ाने का काम दिया जा सकता है. इस दौरान मूल्यांकन के लिए फोन पर मौखिक परीक्षण भी सहायक हो सकता है.”


नई रणनीति की जरूरत

इन 17 महीनों के दौरान बच्चों के नुकसान की भरपाई के लिए अब नई रणनीति बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है. अगर अगले कुछ और महीनों में भी छोटे बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं तो इस समस्या से निपटने के लिए मेंटॉर बनाना शुरू किया गया है.


इंदौर के जिला परियोजना समन्वयक अक्षय राठौर बताते हैं, ”जिन बच्चों के पास स्मार्टफोन नहीं है उनके आस-पड़ोस के ऐसे 10वीं या 12वीं पास युवाओं को खोजा जाएगा जिनके पास स्मार्टफोन हों ताकि उन्हें मेंटॉर बनाया जा सके और वो पहली से आठवीं तक के बच्चों को पढ़ा सकें.”

इस चुनौती के बीच डिस्टेंस और आनलाइन शिक्षा ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा है. नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (एनईओएस) जैसे संस्थान की अहमियत और जरूरत बढ़ी है. संस्थान की चेयरपर्सन प्रोफेसर सरोज बताती हैं, ”सिर्फ किताबी ज्ञान ही नहीं बल्कि पेंटिंग-ड्रॉईंग जैसे कौशल की सीख भी शिक्षा का हिस्सा है और ये बातें एनआईओएस के पाठ्यक्रम में शामिल हैं.”