क्या होता है जब पूरा देश अपने घरों से निकलना बंद कर देता है?

क्या होता है जब पूरा देश अपने घरों से निकलना बंद कर देता है?

विकास बहुगुणा

ज्यादा पुरानी बात नहीं. पिछला नवंबर. देश की राजधानी दिल्ली में अभूतपूर्व हालात थे. सभी स्कूलों और कॉलेजों को बंद कर दिया गया था. फ्लाइट्स को उतरने की इजाजत नहीं दी जा रही थी. पांच महीने बाद हालात कमोबेश वैसे ही हैं. स्कूल-कॉलेज बंद हैं और एयरपोर्ट सूने.

लेकिन दोनों मामलों में एक दिलचस्प विरोधाभास है. नवंबर में ऐसा प्रदूषण के चलते हुआ था. जहरीली हवा ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे. दिल्ली का एयर क्वालिटी इंंडेक्स (एक्यूआई) 500 को छूने वाला था जिसे गंभीर माना जाता है. इसके चलते लोगों की सेहत के लिहाज से आपातकाल का ऐलान कर दिया गया था. आज भी आपातकाल की स्थिति है. लेकिन दिल्ली की हवा की वजह से नहीं. उसकी गुणवत्ता तो किसी हिल स्टेशन से टक्कर ले रही है. राजधानी का एक्यूआई 60-70 के आसपास घूम रहा है. यह नया आपातकाल कोरोना वायरस की वजह से है.

यह वही कोरोना वायरस है जो भारत सहित पूरी दुनिया में करीब एक लाख लोगों की जान ले चुका है. इसके चलते पैदा हुए असाधारण हालात से निपटने के लिए भारत सरकार को 21 दिन के देशव्यापी लॉकडाउन का ऐलान करना पड़ा. नतीजा यह है कि देश की 130 करोड़ की आबादी पिछले करीब तीन हफ्तों से अपने घर में कैद है.

इसका असर सिर्फ दिल्ली की हवा पर ही नहीं पड़ा है. बीते दिनों जालंधर के लोग तब हैरत में पड़ गए जब उन्हें अपनी छत से बर्फीले पहाड़ नजर आने लगे. ये धौलाधार पर्वतमाला थी जो पंजाब के इस शहर से करीब 200 किलोमीटर दूर है. कुछ ऐसा ही हाल देश के दूसरे शहरों का है. उन 14 में से 13 शहरों का भी जो अपनी जहरीली हवा के चलते बीते साल दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल थे.

रोज गाड़ियों से ठसाठस भरी रहने वाले इन शहरों की सड़कें इन दिनों खाली हैं. यहां पर मौजूद कल-कारखाने भी नहीं चल रहे हैं. और इन शहरों में कंस्ट्रक्शन का काम भी रुका हुआ है. इसका नतीजा यह हुआ है कि हवा में घुले प्रदूषण में असाधारण कमी आई है. अभी तक देश के कई हिस्सों में एयरकंडीशनर चलने भी पूरी तरह से शुरू नहीं हुए हैं और यह भी पर्यावरण को बेहतर बनाने में अपना योगदान दे रहा है. इसकी एक वजह तो यह है कि अभी तक उतनी गर्मी नहीं हुई है और दूसरी यह कि जिन घरों के एसी खराब वे उन्हें सही नहीं करवा पा रहे हैं. एक तो आजकल एसी सही करने वाले नहीं मिल रहे हैं और दूसरा कोरोना वायरस की वजह से उन्हें घर बुलाने में भी डर लग रहा है.

130 करोड़ की आबादी के घर बैठने का असर हवा के साथ-साथ पानी पर भी हुआ है. उत्तर प्रदेश के मथुरा-वृंदावन का ही उदाहरण लें जहां पिछले महीने की इसी तारीख तक यमुना के किनारे खड़े होना तक मुहाल था. पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर हरियाणा और दिल्ली तक तमाम औद्योगिक इकाइयों से नदी में घुलने वाले कचरे के चलते पानी से भयानक बदबू आती थी. लेकिन आज हालात बनिस्बत बेहतर हैं. रोज यमुना दर्शन करने वाले एक भक्त के ही शब्दों में ‘आज हम लोग देख रहे हैं कि यमुना महारानी एकदम स्वच्छ और निर्मल हैं... पहले आचमन करने का भी मन नहीं करता था. इतनी स्थिति यमुना जल की खराब थी. लेकिन जिस दिन लॉकडाउन हुआ उसके नौ दिन के बाद ही यमुना जी इतनी निर्मल हो गईं कि हाथ डालने पर हाथ भी दिखाई दे रहा है. स्नान और आचमन का मन करता है.’

यही स्थिति गंगा और कई दूसरी नदियों की है जिनके लिए कुछ दिनों के लॉकडाउन ने वह काम कर दिया है जो कई सालों के नमामि गंगे जैसे सरकारी और गैर सरकारी प्रयास नहीं कर पाए थे.

सिर्फ हवा-पानी ही कइयों को बीते वक्त की याद नहीं दिला रहे. लॉकडाउन और इसके चलते इतनी बड़ी आबादी के घर बैठने ने भारत के सार्वजनिक प्रसारक दूरदर्शन को भी बीते वक्त की याद दिला दी है. 28 मार्च से तीन अप्रैल के बीच की ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बीएआरसी) की रेटिंग में दूरदर्शन सभी श्रेणी के चैनलों में पहले नंबर पर रहा. इसका सबसे बड़ा श्रेय लॉकडाउन के दौरान 80 के दशक के लोकप्रिय धारावाहिक रामायण के फिर से प्रसारण को दिया जा सकता है. इस धारावाहिक के पहले दो एपीसोड 17 करोड़ से भी ज्यादा दर्शकों ने देखे. रामायण के अलावा दूरदर्शन महाभारत और शक्तिमान जैसे गुजरे दौर के लोकप्रिय धारावाहिकों का भी फिर से प्रसारण कर रहा है. अधिकारियों का कहना है कि इन धारावाहिकों ने दूरदर्शन के यू-ट्यूब ट्रैफिक को भी दोगुना कर दिया है.

लॉकडाउन का असर डेटा प्रोवाइडर्स पर भी पड़ा है. चूंकि लोग घर पर हैं तो डेटा की डिमांड काफी बढ़ गई है. इतनी बढ़ गई है कि सेल्युलर नेटवर्क पर पड़ रहा बोझ कम करने के लिए एमेजॉन प्राइम और नेटफ्लिक्स सहित कई प्लेटफॉर्म्स को अपने कार्यक्रमों का प्रसारण हाई डेफिनिशन यानी एचडी की जगह स्टैंडर्ड फॉर्मेट में करना पड़ रहा है. हालांकि उनके लिए अच्छी खबर यह है कि जानकार उनके सब्सक्राइबर्स की संख्या में अच्छी-खासी बढ़ोतरी की संभावना जता रहे हैं.

लेकिन जिस फिल्म उद्योग को भारत में मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन कहा जाता है उसकी हालत इस लॉकडाउन ने पस्त कर दी है. टिकटों की बिक्री और फिल्मों की संख्या के लिहाज से देखें तो भारतीय फिल्म उद्योग दुनिया में सबसे बड़ा है. एक अनुमान के मुताबिक यहां हिंदी सहित तमाम भाषाओं में हर साल करीब दो हजार फिल्में बनती हैं. कुछ समय पहले हुए बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के एक सर्वे का कहना था कि भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग की जीडीपी में तीन फीसदी हिस्सेदारी है और करीब 10 लाख लोग इससे अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े हुए हैं. 1.3 अरब की आबादी का घर से न निकलना इन सभी के लिए बुरी खबर है. सिनेमा के कारोबार से जुड़ी कंपनियों के शेयर ढलान पर हैं. शूटिंग सहित तमाम काम रुके हुए हैं. थियेटर बंद हैं और कई फिल्मों की रिलीज डेट आगे खिसकानी पड़ी है. इनमें रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण की फिल्म ‘83’ भी शामिल है जो 1983 में भारत की विश्व कप जीत पर आधारित है. लॉकडाउन से ठीक पहले रिलीज हुई इरफान खान की कमबैक फिल्म अंग्रेजी मीडियम को इसके चलते अब हॉटस्टार पर रिलीज कर दिया गया है. आने वाले समय में और भी कई फिल्मों के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर रिलीज किये जाने की संभावना जताई जा रही है. क्योंकि अभी काफी समय तक सिनेमा हॉल्स का खुल पाना मुश्किल ही दिख रहा है.

‘83’ को इसी महीने आईपीएल की शुरुआत से पहले रिलीज होना था. न यह रिलीज हुई और न ही आईपीएल जैसा भव्य टूर्नामेंट शुरू हो पाया. यानी लॉकडाउन का असर उस खेल पर भी पड़ा है जिससे भारत में स्पोर्ट्स व्यूअरशिप का 80 फीसदी आता है. करीब डेढ़ महीने चलने वाले 12 साल पुराने इस टूर्नामेंट की ब्रांड वैल्यू करीब सात अरब डॉलर बताई जाती है. प्रसारकों और विज्ञापनदाताओं, दोनों के लिए यह सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है. माना जा रहा है कि अगर इस साल इसका आयोजन रद्द होता है तो भारतीय क्रिकेट के आर्थिक तंत्र और नतीजतन लाखों लोगों की रोजी-रोटी को बड़ा झटका लग सकता है. बाकी खेलों के लिए भी स्थितियां कमोबेश ऐसी ही हैं. और यह आंकड़ा खेल से होता हुआ हर उस गतिविधि तक जाता है जिसके लिए वे लोग हर रोज़ बाहर निकलते हैं जो इन दिनों घर में बैठे हुए हैं.

वैसे घर बैठना हिंदी का एक मुहावरा भी है जिसका मतलब होता है बेरोजगार होना. भारत में करीब दो महीने पहले जब कोरोना वायरस संक्रमण की शुरुआत हो रही थी उसी वक्त यह खबर आई थी कि भारतीय अर्थव्यवस्था छह साल में सबसे धीमी रफ्तार से बढ़ रही है. माना जा रहा है कि तब से अब तक हालात काफी खराब हो चुके हैं. अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इसके चलते देश में बेरोजगारी दर रिकॉर्ड ऊंचाई पर जा सकती है. यानी अभी भले ही लोग लॉकडाउन के चलते घर बैठे हुए हैं, लेकिन आगे एक बड़ी आबादी के लिए नौकरी खोने के चलते लंबे समय तक घर बैठने की नौबत आ सकती है. और जिनके पास पहले ही नौकरी नहीं थी उनको नौकरी मिलना अब थोड़ा और भी मुश्किल हो सकता है.

हालात इस वक्त अपना खुद का धंधा करने वालों के लिए भी बेहद खराब हैं. इस समय केवल वे लोग ही कारोबार कर पा रहे हैं जिनके काम जरूरी की श्रेणी में आते हैं. बाकी कारोबारियों की आमदनी पूरी तरह से बंद है. उनका माल और पैसा फंसा हुआ है और उन्हें अपनी दुकान और ऑफिसों आदि का न केवल किराया देना पड़ रहा है बल्कि कम से कम कुछ जरूरी लोगों को सैलरी भी देनी पड़ रही है. इनमें हजारों ऐसे लोग भी शामिल हैं जो फ्लिपकार्ट या एमजॉन जैसे ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म्स के जरिये अपना सामान बेचा करते थे. ज्यादातर ऐसे प्लेटफॉर्म्स ने फिलहाल जरूरी सामानों के अलावा सभी तरह के सामान बेचने बंद कर दिये हैं.

लॉकडाउन की स्थिति में उन कारोबारों के हालात और भी खराब हैं जिनकी हालत पहले ही अच्छी नहीं थी. इनमें विभिन्न एयरलाइंस भी शामिल हैं. पिछले कुछ समय से तेल के दाम कम होने की वजह से इन्हें अपने खर्चे कुछ कम होने की उम्मीद बंध रही थी लेकिन कोरोना वायरस ने इनकी उम्मीदों पर एक लंबे समय के लिए पानी फेर दिया. अब पहले तो लॉकडाउन को हटना है, फिर लोगों को पहले जरूरी कामों और फिर पर्यटन आदि के लिए आना-जाना शुरू करना है. इसमें काफी वक्त लग सकता है और इस दौरान एवियेशन सेक्टर एक बहुत बुरे दौर से गुजरने वाला है.

वैसे नोटबंदी की तरह लॉकडाउन का एक प्रभाव डिजिटल लेन-देन में बढ़ोत्तरी के रूप में भी देखने को मिल रहा है. लोगों के पास घरों में इस समय नकदी कम है और अगर है भी तो उसे बुरे वक्त के लिए बचाकर रखा जा रहा है. इसके अलावा लोग कोरोना वायरस के डर से नोटों को छूना भी नहीं चाहते. ऐसे में पेटीएम जैसे डिजिटल पेमेंट सिस्टम इस समय जबर्दस्त चलन में आ गये हैं. पिछले दिनों सरकार ने ऑनलाइन मेडीकल कंसल्टेशन की एक पॉलिसी भी बनाई है और विभिन्न अस्पतालों की ओपीडी बंद होने और लॉकडाउन होने के चलते जानकारों का यह भी मानना है कि आने वाले समय में डॉक्टरों से ऑनलाइन परामर्श लेने का चलन भी काफी बढ़ सकता है. और यह भी डिजिटल पेमेंट्स को ही बढ़ावा देने का काम करेगा.