हिन्दी दिवस पर अपनी बात.....

हिन्दी दिवस पर अपनी बात.....

सुशील भोले

14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में भारत की राजभाषा के रूप में पारित होने वाली हिन्दी को 14 सितंबर 1953 से 'हिन्दी दिवस" के रूप में मनाकर पूरे देश में प्रचारित और प्रतिष्ठित करने का प्रयास शासकीय और अशासकीय दोनों ही स्तर पर किया जा रहा है। लेकिन आज भी देश में हिन्दी की जो जमीनी स्थिति है, उसे देखकर ऐसा नहीं लगता कि इन वर्षों में हिन्दी ने अपने आपको देश की राजभाषा के रूप में स्थापित कर लिया है।

यह दु:खद अवश्य है, लेकिन उससे भी ज्यादा सोचनीय है कि हम अपने देश को सही मायने में एक राजभाषा आज तक क्यों नहीं दे पाये? आज भी अंगरेजी यहां की राजसत्ता पर पूरे दमखम के साथ विराजित है। जिसे हम चाहकर भी अपदस्थ नहीं कर पा रहे हैं। इसके मूल में यह देखा जा रहा है कि इस देश का नौकरशाह वर्ग इसके लिए सबसे ज्यादा दोषी है। चाहे वह किसी भी क्षेत्र से आने वाला हो। यह वर्ग अंगरेजी के माध्यम से ही राजकीय कार्यों को करना चाहता है। देश के गैर हिन्दी भाषी राज्यों में तो ऐसा दृश्य बहुतायत में दिखता है। यहां के हिन्दी भाषी राज्यों में भी  अंगरेजी ही शासन की प्रमुख भाषा बनी हुई है।

यह बात अलग है कि 14 सितंबर को होने वाले 'हिन्दी दिवस" के नाम पर हम रस्मी तौर पर हिन्दी पखवाड़ा, हिन्दी सप्ताह या पूरा हिन्दी महीना ही मना लेते हैं। शासकीय स्तर पर होने वाले आयोजनों में लाखों-करोड़ों रुपए खर्च भी कर देते हैं। लेकिन उस आयोजन के मंच से उतरते ही अंगरेजी की सवारी में आसीन हो जाते हैं। यह दृश्य हर स्तर पर दिखाई देता है, और हम पूरी निर्लज्जता के साथ उसे अपने कार्य और जीवनशैली में समाहित करते जा रहे हैं।

स्वाधीनता के पश्चात् देश की राजनीति में जिस तरह से नीति और निष्ठागत गिरावट देखी जा रही है, लगभग वही स्थिति सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषायी निष्ठा के प्रति के देखी जा रही है। इस स्थिति के लिए हम सब किसी न किसी रूप में समान रूप से दोषी हैं।

आखिर ऐसी स्थिति क्यों निर्मित हुई यह विचारणीय है।

एक चीज जो मुझे व्यक्तिगत रूप से पीडि़त करती है, वह है, राष्ट्रभाषा के नाम पर देश की अन्य बोली-भाषाओं की उपेक्षा, जिसके कारण उस भाषा के बोलने वालों के द्वारा हिन्दी के साथ अपेक्षाकृत व्यवहार नहीं मिल पाता।

यह एक सामान्य व्यवहार या मानवीय स्वभाव हो सकता है कि जो हमारी  भाषा की उपेक्षा कर रहा है, हम भी उसकी उपेक्षा करें। ऐसा महसूस होता है कि इसके कारण भी हिन्दी के मार्ग में अवरोध उत्पन्न हो रहे हैं।

मेरी अपनी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी है। हम लोग छत्तीसगढ़ राज्य आन्दोलन के साथ ही साथ छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति के लिए होने वाले आन्दोलनों के साथ भी जुड़े रहे हैं। आज भी जुड़े हुए हैं। जहां तक छत्तीसगढ़ राज्य की बात है, तो वह 1 नवंबर 2000 को स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में आ गया, लेकिन यहां की भाषा और संस्कृति की संवैधानिक रूप से अभी भी पहचान नहीं बन सकी है। इसके लिए यहां लगातार आवाज उठती रही है, लेकिन केन्द्र सरकार इस पर पूरी तरह से मौन है।  परिणाम स्वरूप यहां के कई राजनीतिक और सामाजिक लोगों को हिन्दी और अन्य दिगर भाषाओं के प्रति यहां असम्मान जनक टिपण्णी करते हुए देखा और सुना जा सकता है।

छत्तीसगढ़ जो कि एक प्रकार से हिन्दी भाषी राज्य ही कहलाता है, यहां के लोगों में अपनी मातृभाषा के प्रति हो रही उपेक्षा के कारण यदि ऐसी भावना है, तो सोचिए उन राज्यों के बारे में जहां हिन्दी को किसी भी प्रकार के व्यवहार में उपयोग ही नहीं किया जाता, वहां उसके प्रति कैसा दृष्टिकोण होगा?

निश्चित रूप से यह एक गंभीर प्रश्न है, जिस पर हर प्रकार की संकीर्णता से ऊपर उठकर सोचा जाना चाहिए। राष्ट्रीयता का मापदण्ड किसी भी प्रकार से क्षेत्रीय उपेक्षा नहीं हो सकता। आज संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने के लिए देश की कितनी भाषाएँ दावा कर रही हैं, और उनके साथ किस तरह का व्यवहार हो रहा है? यह निश्चित रूप से विचारणीय है।

 ऐसी कितनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया गया है, जिनकी मानक योग्यता दावेदार भाषाओं की अपेक्षा कई स्तरों पर कमतर है। तो प्रश्न उठता है कि ऐसा क्या कारण रहा है कि कमजोर भाषाएं आठवीं अनुसूची में शामिल हो गईं और समृद्ध भाषाएं आज भी कतार में हैं? क्या ऐसी स्थिति में उनसे संबंधित लोगों से हिन्दी अथवा उन अन्य भाषाओं के प्रति सम्मान की अपेक्षा रखना उचित होगा?

हमें यदि सम्मान पाना है, तो हमको भी अन्यों को सम्मान देना होगा, इस सिद्धांत पर आगे बढऩा होगा। यह सोचना होगा कि इस देश की हर भाषा राष्ट्रभाषा है, हर संस्कृति राष्ट्रसंस्कृति है, और इन सबका संरक्षण हम सबका राष्ट्रीय कर्तव्य है। केवल इसी भावना के द्वारा हिन्दी को संपूर्ण राष्ट्रीय फलक पर स्थापित और सम्मानित किया जा सकता है।

 वर्तमान केन्द्र सरकार ने नइ शिक्षा नीति की घोषणा की है, प्राथमिक शिक्षा को मातृभाषा में पढ़ाए जाने पर जोर दिया गया है, यह स्वागतयोग्य है, और उम्मीद की जा रही है कि नई शिक्षा नीति हम जैसे लोगों की अपेक्षा पर खरी उतरेगी, इस देश की हर मातृभाषा को अपेक्षित सम्मान प्राप्त होगा, तथा उसके माध्यम से राष्ट्रभाषा हिन्दी सच्चे अर्थों में राष्ट्रभाषा की आसंदी पर आसीन हो पाएगी.


जय हिन्दी... जय राष्ट्रभाषा...