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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - एक मॉडल राज्य की कल्पना और छत्तीसगढ़

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - एक मॉडल राज्य की कल्पना और छत्तीसगढ़

- सुभाष मिश्र


होती है तो हम रामराज्य कीकल्पना करते हैं।
बकौल गोस्वामी तुलसीदास-
दैहिक दैविक भौतिक तापा
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।
सब नर करहिं परस्पर प्रीती,
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।।

एक नवंबर 2000 को देश के नक्शे में 26वें राज्य के रुप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाला छत्तीसगढ़ आज 21 साल का जवान यानि वयस्क हो गया है। इस 21 साल के सफर में छत्तीसगढ़ ने देश में अपनी अलग पहचान स्थापित की है। कभी पड़ोसी राज्य उड़ीसा के कालाहांडी की ही तरह छत्तीसगढ़ के बहुत से जिले भूख, गरीबी, कुपोषण और पलायन की मार झेल रहे थे। आज तस्वीर बदली है, ये अलग बात है कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल आज भी नक्सलवाद से बड़ी चुनौती कुपोषण की समस्या को मानते हैं और इसको लेकर उन्होंने एक बड़ा सुपोषण अभियान संचालित किया है। छत्तीसगढ़ में जनवरी 2019 की स्थिति में चिन्हांकित कुपोषित बच्चों की संख्या 4 लाख 33 हजार 541 थी, इनमें से मई 2021 की स्थिति में लगभग एक तिहाई 32 प्रतिशत यानी एक लाख 40 हजार 556 बच्चे कुपोषण से मुक्त हो गए हैं। छत्तीसगढ़   के मुख्यमंत्री  भूपेश बघेल ने महात्मा गांधी की 150वीं जयंती 2 अक्टूबर 2019 से छत्तीसगढ़ को कुपोषण मुक्त बनाने के लिए अभियान शुरू किया था, जो अब रंग ला रहा है। अभी भी सरकार इसे बड़ी और पहली चुनौती के रुप में देख रही है। यह एक कल्याणकारी राज्य के लिए अच्छा संकेत है।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जरुर कह रहे हैं कि हम छत्तीसगढ़ राज्य को एक मॉडल राज्य बनाना चाहते हैं। हम गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ की इच्छाशक्ति के साथ आगे बढ़ रहे हैं।

छत्तीसगढ़ राज्य के गठन को 21 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। किसी राज्य की प्रगति के आकलन के लिए दो दशक की अवधि में हुए विकास-कार्यों का लेखाजोखा अपर्याप्त नहीं हैं। छत्तीसगढ़ 21 वीवीं शताब्दी का राज्य है। जाहिर है 21वीं शताब्दी के मानक के अनुरूप छत्तीसगढ़ में पूंजी, टेक्नोलॉजी और बाज़ार के संयुक्त उद्यम से विकास का एक उत्तर आधुनिक परिदृश्य निर्मित हुआ है। दूसरी तरफ आज भी छत्तीसगढ़ कृषि-प्रधान राज्य है। प्रदेश की एक बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है। ज़ाहिर है, प्रदेश की अर्थव्यवस्था में खेती का योगदान अब भी सर्वाधिक है। इसलिए किसानों की समस्याओं पर ध्यान देने के आश्वासन के चलते प्रदेश में सत्ता परिवर्तन भी हो चुका है। लेकिन औद्योगिक विकास के क्षेत्र में भी पिछले दो दशकों में प्रगति हुई है। बहुराष्ट्रीय पूंजी का प्रवेश होने से उसकी रफ्तार तीव्र हुई है तथा तैयार माल की उपलब्धता अब गाँवों तक भी संभव हो गई है। कहा जा सकता है कि वैश्वीकरण की शक्तियों की पहुँच प्रदेश के अछूते कोनों तक हो चुकी है और शहर तथा गाँव में रहने वाले लोगों की जीवनशैली के बीच फासला कम हुआ है। इसके कारण उपभोक्ता संस्कृति का व्यापक प्रसार हुआ है। इसके साथ यह भी गौरतलब है कि शहरों पर अब गांवों की निर्भरता पूर्वापेक्षा बढ़ती चली गयी है। यह तथ्य है कि एक तरफ़ जहाँ खेती के रकबे में कमी और औद्योगिकीकरण की रफ्तार में उसी अनुपात में बढ़ोत्तरी हुई है, वहीं खेती और किसान की समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। कुछ लोग इसे आधुनिक विकास का अनिवार्य नतीजा मान कर समस्या की गम्भीरता को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। मगर इससे किसानों की दूभर होती ज़िन्दगी का यथार्थ छिप नहीं जाता। दिलचस्प बात है कि यह दारुण यथार्थ ऊपर से दिखाई नहीं देता है। इसलिये किसानों की आत्महत्या की घटनाएँ ख़बर नहीं बनतीं, जबकि लगभग एक दशक से राज्य में अनेक किसान इसका शिकार हुए हैं।

इस वास्तविकता का एक दूसरा पहलू प्रदेश में, खासकर बस्तर क्षेत्र में माओवाद के प्रसार से जुड़ा हुआ है। छत्तीसगढ़ को माओवादी समस्या विरासत में मिली है। लेकिन दो दशक के बाद माओवादी अगर पहले की तुलना में लगातार मज़बूत हुए हैं तो इसके पीछे राज्य सरकारों की प्रशासनिक कमियों के अलावा एक बड़ा कारण यह भी है कि बस्तर को बहुराष्ट्रीय पूंजी के शरणस्थल के रूप में देखने का प्रशासनिक नज़रिया ज्यों-का-त्यों बना हुआ है।

पिछले दो दशकों में शिक्षा और स्वास्थ्य का ग्रामीण और शहरी ढाँचा लगभग यथावत है, बावजूद इसके कि राज्य शासन ने अनेक नये विश्वविद्यालय खोले हैं और निजी तथा सरकारी क्षेत्र में कुछ नए अस्पताल और मेडिकल कॉलेज खुले हैं। प्रश्न यह है कि निजी क्षेत्र के शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों तक आम जनता की पहुँच कितनी है? महामारी के दौर में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी साफ दिखाई दे रही थी और ऑनलाइन शिक्षा की वैकल्पिक व्यवस्था से लाभान्वित विद्यार्थियों की वास्तविक संख्या और उसके लिये जरूरी संसाधनों की उपलब्धता पर ग़ौर करें तो शिक्षा के दुर्बल ढाँचे का ज्ञान सहज ही हो जाता है। कहने की ज़रूरत नहीं है कि राज्य के सरकारी विश्वविद्यालय महज़ परीक्षा आयोजित करने वाले संस्थानों में बदल गए हैं। गुणवत्ता के पैमाने पर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था फिसड्डी साबित हुई है।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जरुर कह रहे हैं कि हम छत्तीसगढ़ राज्य को एक मॉडल राज्य बनाना चाहते हैं। हम गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ की इच्छाशक्ति के साथ आगे बढ़ रहे हैं।
युवा छत्तीसगढ़ ने पिछले 21 सालों में ऐसा क्या हासिल किया है जो उसे दूसरे राज्यों से अलग खड़ा करते हैं। छत्तीसगढ़ के साथ उत्तराखंड और झारखंड राज्य का निर्माण हुआ। इसके बाद तेलंगाना राज्य बना। छत्तीसगढ़ जो अपने प्राकृतिक संसाधनों, अपने मानव श्रम और शांतिप्रिय स्वभाव के कारण देश के नक्शे में अलग से जाना चाहता है। इसकी वन संपदा, इसकी 32 प्रतिशत जनजाति आबादी इसके सौंदर्य में चार चांद लगाते हैं। माओवाद या कहें नक्सलवादी गतिविधियों के कारण कभी आतंक और भय का पर्याय बनने जा रहा छत्तीसगढ़ आज बहुत हद तक इस छबि से अपने को मुक्त कर पाने में सफल है। धुर नक्सल जिला दंतेवाड़ा अब अपने एजुकेशन हब के कारण अपनी नई पहचान गढ़ रहा है।

बस्तर का जगदलपुर अब अध्ययन, अध्यापन कला संस्कृति और खेल गतिविधियों का नया केन्द्र बन रहा है। 24& 7 यानी चौबीस घंटे संचालित यहां की लाला जगदलपुरी लायब्रेरी हो या बादल के नाम से विकसित आर्ट कल्चर का नया केन्द्र हो या फिर फ्लड लाईट में जगमगाते यहां के खेल मैदान। धीरे-धीरे बस्तर बदल रहा है, छत्तीसगढ़ गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ की रिदम पर राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य समारोह आयोजित कर देश दुनिया के लोगों को अपने यहां आने का न्यौता दे रहा है। अमीर धरती के गरीब लोग अब धीरे-धीरे अपनी और अपनी धरती की उर्वरा शक्ति, संसाधन को समझकर उसका बेहतर उपयोग करना सीख रहे हैं। यह नया मार्डन छत्तीसगढ़ है।

जिस तरह चांद को कभी-कभी ग्रहण भी झेलना पड़ता है, उसी तरह शांति के टापू छत्तीसगढ़ को भी कवर्धा, जशपुर, कोंडागांव में घटी घटनाओं की वजह से कलंकित भी होना पड़ता है। उम्मीद की जा सकती है कि यहां की जनता कथित सोशल मीडिया पर दी जा रही असामाजिक सूचनाओं को खारिज करके संत कबीर और बाबा घासीदास की परपंरा के छत्तीसगढ़ के मूल चरित्र को बनाए रखेगी।

भगवान राम के ननिहाल और रामवनगमन पथ के रुप में छत्तीसगढ़ अपनी नई पहचान बना रहा है। दक्षिण कौशल कहलाने वाले छत्तसीगढ़ के पास दंडकारण्य है जहां के बारे में कहा जाता है कि भगवान राम ने अपने वनवास का अधिकांश समय गुजारा। छत्तीसगढ़ की सरकार यहां 8 वनगमनपथ बनाकर उसे पर्यटन केन्द्र के रुप में विकसित कर रही है। दीवार फिल्म में सलीम जावेद द्वारा लिखित अमिताभ बच्चन और शशिकपूर के बीच हुआ डॉयलाग अयोध्या में बन रहे रामलल्ला के भव्य मंदिर के संदर्भ में प्रासंगिक है। आज मेरे पास बिल्डिंग है, प्रापर्टी है, बैंक बैलेंस है, बंगला है, गाड़ी है, तुम्हारे पास क्या है?  मेरे पास मां है।

छत्तीसगढ़ के पास कौशल्या मां है। छत्तीसगढ़ के चंदखुरी में 51 फीट की ऊंची प्रतिमा के साथ कौशल्या माता का भव्य मंदिर बन रहा है। भगवान राम का यह ननिहाल है और वे यहां के भांजे हैं। यह नई पहचान इधर के दिनों में काफी लोकप्रिय और चर्चित हुई है। जय-जय श्रीराम के जयघोष के बीच कौशल्या के राम का स्वर थोड़ा शांत, संतुलित और आधुनिकता लिए हुए है।
छत्तीसगढ़ राज्य में इस समय 32 जिले हैं। अविभाजित मध्यप्रदेश के सात जिले रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, बस्तर, बिलासपुर, रायगढ़, अंबिकापुर का विभाजन होकर पहले 11 फिर 18 फिर 27 और फिर 29 होकर 32 हो गए। छोटे राज्य की तरह छोटे जिलों में प्रशासनिक कसावट और विकास के नाम पर बनाये जा रहे ये जिले अपने उद्देश्य में कितने सफल हो पायेंगे, यह भविष्य के गर्भ में है। यह जरूर है कि अब शासन-प्रशासन तक लोगों की पहुंच आसान हुई है। सबको सबके बारे में सब पता है। एक तरह से आई यह पारदर्शिता, भ्रष्टाचार और लालफीताशाही को क्या कम कर पा रही है यह अध्ययन का विषय है। जानकार कहते हैं कि छत्तीसगढ़  में आये फंड और खर्च के बढऩे से संसाधन का दोहन और लाभ के हिस्से का बंदरबांट कुछ ज्यादा जरुर बढ़ा है।
छत्तीसगढ़ ऊर्जा प्रदेश कहलाता है। यहां बिजली का पैसा संकट नहीं है, जैसा कि देश के अन्य राज्यों में दिखलाई पड़ता है। जनवरी 2008 से राज्य में बिजली कटौती खत्म हुई है। वर्ष 2009-10 में राज्य में प्रति व्यक्ति विद्युत खपत 1547 यूनिट दर्ज की गई है।

दंतेवाड़ा को शिक्षा ने नई पहचान दी है। अपनी विशिष्ट पहचान बना रहे दंतेवाड़ा का किरंदुल-बचेली सहित काफी क्षेत्र को अभी तक आयरनयुक्त और लाल पानी की समस्या से मुक्ति नहीं हो पाई है। ये अलग बात है कि हर पार्टी चुनाव के दौरान इस समस्या से निजात दिलाने का भरोसा दिलाती है।

सेवा गारंटी अधिनियम के दायरे में अब तक 31 विभागों की 251 सेवाएं शामिल की गई है किन्तु प्रभावी क्रियान्वयन जमीनी स्तर पर कम दिखाई देता है। छत्तीसगढ़ की अस्मिता को लेकर भी इधर के सालों में कुछ ज्यादा फोकस रहा है। सरकारों ने राज्य उत्सव के दौरान छत्तीसगढ़ की विभूतियों के नाम से अलंकरण और पुरस्कारों की परंपरा प्रारंभ की। शिक्षा के क्षेत्र की बात करें तो प्रायमरी एजुकेशन से लेकर हायर एजुकेशन तक बहुत ज्यादा इजाफा हुआ है। राज्य बनने के समय प्रायमरी स्कूलों की संख्या जहां 13 हजार केआसपास थी वह आज बढ़कर 37 हजार हो गई है। इंजीनियरिंग  कालेज 14 से बढ़कर 49 हो गए हैं। मेडिकल कालेजों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। आईआईएम, आईआईटी, ट्रिपल आईटी, एनआईटी, एम्स जैसी संस्थाएं भी राज्य बनने के बाद यहां आई हैं। बिलासपुर, रायगढ़, जगदलपुर, राजनांदगांव, अंबिकापुर सभी जगह मेडिकल कालेज का होना छत्तीसगढ़ में बढ़ती स्वास्थ्य सेवाओं का परिचायक है। छत्तीसगढ़ की भूपेश सरकार ने आत्मानंद विद्यालय के नाम पर अंग्रेजी और हिन्दी के उत्कृष्ट विद्यालयों की स्थापना की है। छत्तीसगढ़ राज्य का अब अपना राजगीत-अरपा पैरी के धार महानदी हे अपार इन्द्रावती ह पखारय तोर पइंया महूं पांव परंव तोर भुइंया जय हो जय हो छत्तीसगढ़ मइया। छत्तीसगढ़ की अपनी फिल्म नीति भी बन चुकी है। निकट भविष्य में फिल्म सिटी बनाने की कोशिशें जारी हैं। छत्तीसगढ़ ने समर्थन मूल्य से अधिक पर किसानों से धान खरीदकर उन्हें राजीव न्याय योजना से बोनस दिलाकर, गोबर खरीदकर, किसानों का कर्ज माफ करके अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

भाजपा जिनके शासनकाल में छोटे राज्य बनाने की पहल हुई उसका मानना है कि यदि राज्य छोटे होंगे तो केन्द्र मजबूत होगा। छत्तीसगढ़ में अन्य छोटे राज्यों की तरह राजनीतिक अस्थिरता का माहौल नहीं है। राज्य बनने के प्रारंभ में विधायकों की खरीद-फरोख्त और तीसरा दल बनाने की कोशिश हुई किन्तु यहां के लोगों को दो दलीय व्यवस्था ही पसंद है। यही वजह है कि यहां चाहे विद्याचरण शुक्ल रहें हो या अजीत जोगी दोनों के ही नेतृत्व वाले क्षेत्रीय दल को कोई खास सफलता नहीं मिली। सत्ता संघर्ष के चलते अब दलों में भी गुटबाजी देखने को अवश्य मिल रही है।