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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -यह सिम्पैथी नहीं एक्शन का टाईम है

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -यह सिम्पैथी नहीं एक्शन का टाईम है

-सुभाष मिश्र
सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई कहते हैं की-गरीब आदमी न तो ऐलोपैथी से अच्छा होता है, न होमियोपैथी से, उसे तो ''सिम्पैथी (सहानुभूति) चाहिए।
ये बात अब गरीब तक सीमित नहीं है। कोरोना से जुझ रहे बहुत से परिवारों को इस समय सहानुभूति चाहिए, जो नहीं मिल रही है।

इस कोरोना संक्रमण के भयावह समय में जब सारे हाथ असहाय से दिख रहे हों, जान-पहचान से लेकर बड़े से बड़े अस्पताल के डॉक्टर अपना मोबाइल स्विच आफ कर बैठे हों, सरकारें एक-दूसरे के आक्सीजन का लेबल नापने पर लगी हों, मंदिर-मस्जिद के दरवाज़े बंद हो, मीडिया समझाईश की शक्ल में डरा रहा हो, तब उस देश का आदमी क्या करे?

जो सक्षम लोग अपने-अपने घरों में हाथ पर हाथ धरे बैठकर सोशल मीडिया के ज़रिए चिंता व्यक्त कर रहे हैं ऐसे लोगों को देखकर, सुनकर एक बार फिर परसाईजी याद आते हैं और कहते हैं, मुझे दिखाऊ सहानुभूति से सख्त नफरत है। अभी भी दिखाऊ सहानुभूति वालों को, चांटा मार देने की इच्छा होती है। जप्त कर जाता हूं वरना तो शुभचिंतक पिट जाते।

हमारे कथित शुभचिंतकों में हमारी सरकारें और उसकी मशीनरी भी शमिल है। जब कोरोना आया था तो हमने इसे नई वैश्विक बीमारी कहकर बहुत सी ग़लतियों से पल्ला झाड़ लिया था। अब इसे आये सवा साल हो गये और हम व्यवस्थाओं के मामले में आज भी पहले से भी बदतर स्थिति में खड़े हैं।

सरकारों द्वारा जारी आदेश और व्यवस्थाएँ कागज़़ी साबित हो रही हैं। नोडल अधिकारी असहाय हैं। केन्द्रीय टीम केवल आब्जर्वर से ज़्यादा कुछ नहीं। सरकारों द्वारा घोषित दरों को, आदेश को अस्पताल, विक्रेता मान नहीं रहे हैं। आपदा में अवसर तलाशने वाले लूट के नये-नये तरीक़े ढूँढ रहे हैं। इस देश के रक्षा मंत्री, सेना प्रमुख रहे केन्द्रीय मंत्री वी के सिंह अपने भाई के लिए सोशल मीडिया पर बेड की गुहार कर रहे हैं। युवाओं के पसंदीदा कवि जिन्हें सुनने हज़ारों लोग इक्कठे हो जाते हैं ऐस कुमार विश्वास अपने वरिष्ठ कविवर कुंवर बैचेन के लिए हर अस्पताल में, परिचित को गुहार लगाते हैं और अस्पताल में जगह नहीं मिलती, फिर आम आदमी की क्या गत होगी, ये आप सोच सकते हैं। श्मशान में वेटिंग और निगम अमले के इंकार से ठेके पर अंतिम संस्कार की कोशिश बताती है की हमने आपदा प्रबंधन के कोई उपाय नहीं किये।

कोरोना संक्रमण में हमने लॉक डाउन को हथियार बनाकर उन सारी व्यवस्थाओं को दरकिनार किया जो भविष्य के लिए ज़रूरी थी। अभी भी केवल आदेश-निर्देश के ज़रिये इस महामारी कोरोकने की दिखावटी कोशिशें हो रही है। हमें देश के 135 करोड़ लोगों के लिए टीकाकरण की ज़रूरत है। हमने दो देसी कंपनियों को ही इजाज़त दी। एक कंपनी ने अपना उत्पादन बढ़ाने आर्थिक सहायता माँगी तो कुछ नहीं किया और अब समझ रहे हैं की विदेशी दवा कंपनियाँ हमें अपने वैक्सीन दे देगी। हाँ ज़रूर देगी पर मन चाही क़ीमत वसूल के। हमने पूरे देश को आक्सीजन पर ला दिया, पर आक्सीजन के प्लांट और सिलेंडर का उत्पादन समय रहते नहीं बढ़ाया। अब जाकर 162 प्लांट की अनुमति के साथ आक्सीजन एक्सप्रेस चलाकर हम आक्सीजन पहुँचाने की बात कर रहे हैं। इस बीच पता नहीं कहाँ-कहाँ कितने लोगों ने आक्सीजन की कमी के चलते दम तोड़ा।

रेमडेसिविर की कालाबाज़ारी, आक्सीजन और बेड की कमी, मरीज़ों का यहाँ वहाँ अपने घरवालों के साथ इलाज और जाँच के लिए भटकना जारी है।
एक ओर हमारे देश के नेताओ और चुनाव आयोग ने प्रजातंत्र में अपनी कथित आस्था का प्रदर्शन करते हुए जान जाये पर वोट ना जाये नारे को महत्ता देते हुए पाँच राज्यों में चुनाव कराया है, वो बताता है की हम कोरोना बीमारी को लेकर कितने संजीदा हैं। एक ओर डॉक्टर और सरकार भी अब ये स्वीकार रही है की कोरोना का वायरस गर्मी में साँसों से हवा में किसी स्प्रे की तरह फैल सकता है, वही दूसरी ओर तमाम भीड़भाड़ की गतिविधियों को प्रोत्साहित भी किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर हमारे वैज्ञानिक कह रहे हैं की कोविड का इंडियन वेरिएंट प्रतिरोधक क्षमता को चकमा देने में सक्षम है। इजऱाइल जैसे छोटे से देश ने सही प्रबंधन और कोरोना नियमों का पालन करके अपने देश में 53 प्रतिशत आबादी का टीकाकरण करके खुद को कोरोना और मास्क से फ्री कर लिया। हमारे देश में सारे आपदा प्रबंधन की अनदेखी कर, नियमों में ढिलाई के कारण आज हम कोरोना संक्रमण में अमेरिका के पीछे छोड़ आगे निकलने वाले हैं।

हमारे देश में किसी भी तरह की आपात स्थिति, महामारी, प्राकृतिक आपदा से निपटने का कोई दीर्घकालिक योजनाबध्द प्लान नहीं है। हमारे नेता आपदा में अवसर ढूँढकर नई-नई आपदाएँ खड़ी करते हैं ताकि जनता का ध्यान मूलमुद्दों पर ना जाये।

सरकारों की लापरवाही, लेटलतीफी और अनदेखी से परेशान लोगों को न्यायालय की शरण में जाना पड़ा। जबलपुर उच्च न्यायालय ने कोरोना संक्रमण से जुड़ी बहुत सी याचिकाओं की सुनवाई के बाद ये फ़ैसला देते हुए कहा है की-ऑक्सीजन और रेमडेसिविर की नियमित आपूर्ति सरकार सुनिश्चित करे। केंद्र सरकार दखल देकर ऑक्सीजन की कमी दूर करवाए। उद्योगों को दी जाने वाली ऑक्सीजन हेल्थ सेक्टर को दी जाए और रेमडेसिविर का उत्पादन बढ़वाने सरकार प्रयास करे। ज़रूरत हो तो रेमडेसिविर का आयात केंद्र सरकार करवाए। निजी अस्पताल मरीजों से मनमानी वसूली ना कर पाएं। सरकार कोरोना इलाज की दर फिक्स करे।

कोरोना संकट पर दायर याचिकाओं फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अस्पतालों में रेमडेसिविर की कीमत चस्पा करवाई जाए, मांग के 1 घण्टे के भीतर मरीज को रेमडेसिविर मिले, प्रदेश के सभी कोविड केयर सेंटर्स को फिर प्रदेश सरकार चालू करे, मरीजों को 36 घंटों के भीतर आरटीपीसीआर रिपोर्ट दी जाए, कोरोना का फैलाव रोकने प्रदेश में कोरोना जांच बढाई जाए। स्कूल, कॉलेजों, मैरिज हॉल, होटल, स्टेडियम को अस्थाई अस्पतालों के लिए अधिग्रहित किया जाए, प्रदेश में विद्युत शवदाह गृहों की संख्या बढ़ाएं, स्वास्थ्य विभाग के खाली पदों पर संविदा पर तत्काल नियुक्ति करें।

यहां सवाल यह भी है की जो हाल मध्यप्रदेश का है वही हाल बाकी राज्यों का भी है। सरकारें अचानक सोते से जागकर ना तो वैक्सीन का उत्पादन रातों रात बढ़ा सकती है, ना ही आक्सीजन की आपूर्ति। जिन जगहों पर सालों से लगे विधुत शव गाह प्रांरभ नहीं हो पाये, वहां अचानक से विधुत शव कैसे चालू होंगे। जो बात माननीय न्यायालय कह रहा है क्या ये आपदा प्रबंधन का विषय नहीं है। ऐसा क्यो होता है की सरकारें न्यायालयों के आदेश के बाद ही एक्शन टेकन रिपोर्ट के मूड में आती है। सारे नेता, आला अफसर और सिस्टम से जुड़े लोग आज की जमीनी सच्चाई जान रहे हैं, परन्तु वे आज भी शतुरमुर्ग की तरह गर्दन नीचे छिपाए बैठे हैं।