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म्यूकॉरमाइकोसिस का एंटीबायोटिक्स या स्टेरॉयड्स से लेना देना नहीं – डॉ कौशिक

म्यूकॉरमाइकोसिस का एंटीबायोटिक्स या स्टेरॉयड्स से लेना देना नहीं – डॉ कौशिक

भिलाई, 20 मई। म्यूकॉरमाइकोसिस का एंटीबायोटिक्स या स्टेरॉयड्स से कोई लेना देना नहीं है। यह कोई नया-नया नहीं आया है। कोविड के पहले दौर में भी इसके मामले सामने आए थे पर अधिकांश अस्पतालों में इसकी पहचान ही नहीं हो पाई। अब जब सभी को इसके लक्षणों का पता चल गया है तो ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं। यह कहना है हाइटेक सुपर स्पेशालिटी हॉस्पिटल के श्वांस रोग विशेषज्ञ डॉ प्रतीक कौशिक का।

डॉ प्रतीक कौशिक ने बताया कि कोविड के पहले दौर में भी हमारे सामने कम से कम 9 मामले म्यूकॉरमाइकोसिस के आए थे। इन सभी मरीजों का इलाज अन्य अस्पतालों में हुआ था जहां से वे यह संक्रमण लेकर आए थे। इस बार भी अब तक 7 मामले सामने आ चुके हैं। इनमें से एक रोगी की मौत हो गई जबकि एक रोगी की आंख निकालनी पड़ी। म्यूकॉरमाइकोसिस को पहले जाइगोमाइकोसिस कहा जाता था। यह म्यूकॉरमाइसिटीस नामक फंगस से होता है जो पर्यावरण में आम होता है। जब इम्यून सिस्टम बहुत ज्यादा कमजोर हो जाए तो यह संक्रमित करता है। ऐसा उन लोगों में होने की संभावना ज्यादा होती है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता किसी बीमारी से या किसी दवा के चलते कमजोर हो।

डॉ कौशिक ने बताया कि ऑक्सीजन डिलीवरी सिस्टम से म्यूकॉर माइकोसिस का सीधा संबंध है। ऑक्सीजन चेम्बर को ठीक से साफ नहीं करना, आवश्यकता नहीं होने पर भी नम आक्सीजन देना खतरे को बढ़ाता है। कोविड में अधिकांश मरीजों को ड्राई (शुष्क) ऑक्सीजन ही देने की जरूरत होती है। ऊपर से कुछ अस्पतालों में ऑक्सीजन सप्लाई लाइन में डाले जाने वाले पानी की शुद्धता तक का ख्याल नहीं रखा गया। बीमारी से पहले ही कमजोर पड़े मरीज पर यह संक्रमण भारी पड़ गया और स्थिति गंभीर हो गयी।

काफी परिष्कृत हुआ इलाज 

 उन्होंने कहा कि कोविड के पहले दौर में जहां हम पूरी तरह से अंधेरे में तीर चला रहे थे वहीं इस बार हमारे पास पहले से कहीं ज्यादा अनुभव है। हमारे पास ज्यादा विकल्प हैं। स्टेरायड्स के उपयोग को लेकर भी हम पहले से ज्यादा सावधान हैं। पहले जहां 1 ग्राम की मात्रा दी जा रही थी उसे अब चौथाई कर 250 मिग्रा कर दिया गया है। सभी दवाइयों और इंजेक्शन्स को लेकर पिछले दौर की तुलना में हमारे पास ज्यादा अनुभव है और हम बेहतर स्थिति में हैं। कोविड रक्त को गाढ़ा कर देता है जो दिल के दौरे का कारण बनता है। अब इसे भी नियंत्रण में रखने के उपाय किये जा रहे हैं।

आईसीयू से ठीक होकर लौटे मरीजों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि कुछ ही दिनों में हम एक नए विषय पर चर्चा सुनने जा रहे हैं। यह चर्चा क्रिटिकल केयर मायोपैथी और क्रिटिकल केयर न्यूरोपैथी की होगी। आईसीयू में तीन दिन से ज्यादा एक ही स्थिति में पड़े रहने वाले मरीजों की मांसपेशियों एवं स्नायुतंत्र में एक तरह की शिथिलता आ जाती है जो रिकवरी को धीमा कर देती है। इस बात का भी ध्यान रखा जाना बेहद जरूरी है।