breaking news New

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा
हिन्दी दिवस पर विशेष

- सुभाष मिश्र
भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने कहा है कि ' निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
आज हमारी हिन्दी, हमारी बोली, भाषा कहां पर खड़ी है, हमारा व्यवहार उनके साथ क्या है, ये हमें सोचना होगा। हमारा देश बहुभाषी है, किंतु संविधान में 29 भाषाओं को स्वीकृति दी गई है। हमने अनजाने में ही सही, अपनी बोलियों के साथ अन्याय किया। इंडियन एक्सप्रेस के एक सर्वे के आधार पर हमारे देश में 780 से अधिक बोलियां थीं, लेकिन सन् 2014 तक 250 बोलियां मर गईं यानी समाप्त हो गईं। हिंदी रूपी सागर में समाहित होने वाली, उसे समृद्ध करने वाली बोली की नदी का प्रवाह हमने प्रांत और भाषा के छोटे-छोटे बांध बनाकर रोक दिया, जिसका नतीजा आज यह हुआ कि हिंदी को जितनी तेजी से आगे बढऩा था, वह उतनी ही तेजी से अंग्रेजीयत मानसिकता के चलते धकियाई जा रही है।

जब हम हिंदी की वर्तमान स्थिति की बात करते हैं तो हमें थोड़ा इसके इतिहास में भी जाना होगा। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य के इतिहास का लेखन करते हुए आदिकाल जिसे वीरगाथा काल का नाम भी दिया गया है, सन् 1050-1375 तक माना है। इसके बाद पूर्व मध्यकाल, जिसे भक्तिकाल भी कहा गया है, सन् 1375-1700 तक, उत्तर मध्यकाल, जिसे रीतिकाल कहा गया है। सन् 1700-1900 तक आधुनिक काल, जिसे गद्यकाल कहा गया है। सन् 1900-1984 तक माना है। इस समय को कुछ लोग उत्तर आधुनिक काल बताने की कोशिश में लगे हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य का इतिहास लिखते समय आषाढ़ शुक्ल 5, 1986 को स्वीकार किया था कि 5-6 साल पहले छात्रों के उपयोग के लिए मैंने जो संक्षिप्त नोट तैयार किए थे, जिनमें परिस्थिति के अनुसार शिक्षित जनसमूह की बदलती हुई प्रवृत्तियों को लक्ष्य करके हिंदी साहित्य के इतिहास के काल विभाग और रचना की भिन्न-भिन्न शाखाओं के निरूपण का एक कच्चा ढांचा खड़ा किया था।

भिन्न-भिन्न बोलियों, भाषाओं के साथ चलते हुए हिंदी ने अपनी करीब एक हजार साल की यात्रा में काफी थपेड़े झेले हैं। 14 सितंबर, 1949 संविधान सभा ने एकमत से यह निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी। यही कारण है कि प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को हम लोग हिंदी दिवस मनाते हैं।

आज हिंदी से ज्यादा अंग्रेजी पर राजकाज की निर्भरता टिकी हुई है। आज देश भारत और इंडिया में साफ-साफ विभाजित दिखाई देता है। यूपी बोर्ड की परीक्षा में आठ लाख विद्यार्थियों का हिन्दी में फेल होने का समाचार 2020 में सुर्खियों में था। कुछ दिन बाद जब यूपीपीएससी का रिजल्ट आया तो उसमें भी दो तिहाई से अधिक अंग्रेजी माध्यम के अभ्यर्थी सफल हुए। यह संख्या पहले 20-25 प्रतिशत के आसपास रहती थी। देश में अराजपत्रित कर्मचारियों के चयन के लिए कर्मचारी चयन आयोग (स्टाफ सिलेक्शन कमीशन) सबसे बड़ा संगठन है। इस संगठन की परीक्षाओं से हिन्दी को पूरी तरह बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है। कंबाइंड हायर सेकेंडरी लेबल की परीक्षा में इंग्लिश लैंग्वेज का प्रश्नपत्र है किन्तु हिन्दी का कुछ भी नहीं है। 2009 में हिन्दी माध्यम से जहां 25.4 प्रतिशत परीक्षार्थी सफल हुए थे, वहीं 2019 में यह संख्या घटकर मात्र 3 प्रतिशत रह गई। पहले जहां टॉप टेन सफल अभ्यर्थियों में तीन-चार हिन्दी माध्यम वाले अवश्य रहते थे, वहां 2019 में चयनित कुल 829 अभ्यर्थियों में से हिन्दी माध्यम वाले चयनित अभ्यर्थियों में पहले अभ्यर्थी का स्थान 317वां है।

यहां सवाल यह भी है कि क्या सरकारी नौकरियों, प्रशासन और न्याय व्यवस्था में अंग्रेजी के वर्चस्व के लिए जनता जिम्मेदार है या सरकार और उसकी नीतियां? आज शिक्षा को व्यापार और मुनाफे के लिए ज्यादातर निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया गया है। देश के अधिकांश राज्य सरकारों ने सरकारी विद्यालयों को भी अंग्रेजी माध्यम में बदल दिया है और हमारे नौनिहालों से उनकी मातृभाषाएं क्रूरतापूर्वक छीन ली हैं। केन्द्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों में भी ऐसी व्यवस्था कर दी गई है कि बच्चों की हिन्दी आठवीं-नवीं के बाद ही छूट जाती है। उनका तर्क है कि अभिभावकों की यही मांग है। प्रश्न यह है कि जब अफसर से लेकर चपरासी तक की सभी नौकरियां अंग्रेजी के बल पर ही मिलेंगी तो कोई अपने बच्चे को हिन्दी पढ़ाने की मूर्खता कैसे करेगा? वास्तव में व्यक्ति चाहे जितनी भी भाषाएं सीख ले किन्तु वह सोचता अपनी भाषा में ही है। हमारे बच्चे दूसरे की भाषा में पढ़ते हैं फिर उसे अपनी भाषा में सोचने के लिए अनूदित करते हैं और लिखने के लिए फिर उन्हें दूसरे की भाषा में ट्रांसलेट करना पड़ता है। इस तरह हमारे बच्चों के जीवन का एक बड़ा हिस्सा दूसरे की भाषा सीखने में चला जाता है। इसलिए मौलिक चिन्तन नहीं हो पाता। मौलिक चिन्तन सिर्फ अपनी भाषा में ही हो सकता है। पराई भाषा में हम सिर्फ नकलची पैदा कर सकते हैं। अंग्रेजी माध्यम वाली शिक्षा सिर्फ नकलची पैदा कर रही है।

आजादी के बाद क्षेत्रीय राजनीति के चलते जहां कुछ राज्यों ने अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए राष्ट्रभाषा हिंदी का विरोध किया, वहीं जिन राज्यों में यह बोली जा रही थी, उन्होंने भी इसकी सहोदर बहनें स्थानीय बोली के साथ भी कोई अच्छा व्यवहार नहीं किया। बोली-भाषा के इस झगड़े में व्यापार की भाषा अंग्रेजी, जो ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ यहां आई थी, बाजार के विस्तार के साथ इस तेजी से आगे बढ़ी कि अब हमारे महानगरों में यह पूरी तरह से बोल-चाल, कार्य-व्यवहार की भाषा बन गई। अंग्रेजी को मिलने वाले सम्मान और रोजगार के अवसरों ने पूरे हिंदुस्तानियों को अंतरराष्ट्रीय होने या भाषा के जरिए रोजगार पाने का वह सब्जबाग दिखाया कि गांव-गांव में रातों रात कॉन्वेंट स्कूल खुलने लगे। जरा-बहुत भी पढ़ा-लिखा आदमी अपने बच्चे को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाने की अंधी दौड़ में शामिल हो गया। स्थानीय बोली, भाषा में बोलने वाला व्यक्ति गँवार तथा अंग्रेजीदा आदमी सभ्य के साथ विद्वान समझा जाने लगा। भाषा के नाम पर अपमान और ठगी का बाजार विस्तारित हो रहा है। बाजार अपने तरीके से नई भाषा में है। कुछ सालों में नए ग्राहक और नए प्रोडक्ट के जरिए बाजार भाषा के साथ स्थानीय बोली, भाषा, विशेषकर हिंदी बेस्ट में घुसपैठ बना रहा है। नए ग्राहक की चाहत ने मजबूरी में ही स्थानीय बोली, भाषा, खासकर हिंदी को बढ़ाया है। टी.वी. पर तेजी से बढ़ते हिंदी के चैनल, समाचार पत्र वेबपोर्टल इस बात के गवाह हैं कि नए ग्राहक, नए बाजार और लोगों की बढ़ी हुई खरीद शक्ति (परचेजिंग पावर) को देखकर बहुराष्ट्रीय कंपनियां, देशी बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने संचार तकनीक के नए-नए माध्यम से, जिनमें स्थानीय बोली-भाषा भी महत्वपूर्ण, कारगर हथियार हैं, से लैस होकर लोगों की जेबें खाली करने में लगी हुई हैं। छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं है।

हिंदी के भविष्य या शैक्षणिक उपयोग की बात यदि हम करें तो नए राज्य छत्तीसगढ़ में हिंदी पढऩे वालों की संख्या बहुतायत में है। छत्तीसगढ़ के सभी इलाकों में अभी तक हिंदी में ही पठन-पाठन का कार्य होता रहा है। सरकारी स्तर के स्कूल हिंदी माध्यम के हैं। अंग्रेजी की पढ़ाई-लिखाई निजी स्कूलों के जरिए हो रही है। अब सरकार ने भी अंग्रेजी स्कूल की शुरुआत कर दी है। जहां कहीं भी लोगों के पास थोड़ा-बहुत सामथ्र्य, संसाधन और विकल्प उपलब्ध हैं, वहां लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में ही पढ़ा रहे हैं। विकल्पहीनता या अंग्रेजी स्कूलों की फीस नहीं भर पाने के कारण मन मसोसकर लोग अपने बच्चों को सरकारी, हिंदी भाषी स्कूलों में भेज रहे हैं। अंग्रेजीयत का भूत इस कदर हमारे ऊपर सवार है कि हमें सारी तरक्की के रास्ते अंग्रेजी से होकर जाते दिखते हैं। हकीकत बिलकुल इसके उलट है। जिसके पास हुनर है, होशियार है और अवसर को भुनाने का सामथ्र्य है, वहीं उम्मीदवार सीमित अवसरों की नाव पर सवार है। अब धीरे-धीरे लोगों के मन से यह भ्रम भी दूर होने लगा है कि केवल भाषा के आधार पर उन्हें रोजगार के अवसर मिल जाएंगे। सीमित सरकारी नौकरी के चलते आने वाले समय में बाबा-बेबी लोगों की भीड़ अंग्रेजी में हेल्प-मी, हेल्प-मी कहते सुनी जाएगी। बाजार उसी को रोजगार/काम देगा, जिसमें बाजार के अनुकूल चीजें बेचने, बनाने का हुनर होगा। केवल बोली, भाषा के नाम पर किसी भी प्रकार का कचरा नहीं खपाया जा सकता। जब तक आपका माल सामग्री या बाजार की भाषा में कहूं प्रोडक्ट जनता को नहीं लुभाएगा, तब तक उसकी कोई कीमत नहीं होगी। केवल भाषा की वैतरणी के सहारे बाजार के समंदर को पार नहीं किया जा सकता।

मीडिया धीरे-धीरे अपने लिए एक नए किस्म की भाषा तैयार कर रहा है। इसे लेकर अधिकांश लोगों को कोई गुरेज भी नहीं है। धीरे-धीरे यह भाषा आम बोलचाल में भी समाहित हो रही है। भाषा वैज्ञानिक कहते हैं कि भाषा हमेशा से कठिनाई होती है, जुबान उसकी जगह उसी से मिलता-जुलता शब्द तलाश लेती है। सुप्रसिद्घ कथाकार, चित्रकार प्रभु जोशी कहते हैं कि-
हिंदी ने सब से बड़ा धोखा
हिन्दी के अखबारों से ही खाया है। जैसे ही अखबारों
में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया
मालिकों ने अखबार के कर्मचारियों को कहा,
अब प्रेस-कॉपी में सत्तर प्रतिशत
तक अंग्रेजी के शब्द होने चाहिए।
जो असहमत हो, वे तय कर लें उन्हें हिंदी
प्यारी है कि अपनी नौकरी।