breaking news New

मुक्तिबोध की याद में ध्रुव शुक्ल की कविताः हमारी भूल ग़लती ही कोई

मुक्तिबोध की याद में ध्रुव शुक्ल की कविताः हमारी भूल ग़लती ही कोई


हमारी भूल ग़लती ही कोई 

हमारी राह में बो रही कीलें

गगन में मँडरा रही चीलें

जैसे महामारी कोई

उतरने को धरा पर

खोजती हो राह


कीलों से उगेंगे पेड़ लोहे के

बनेंगी खूब बंदूकें

रहस्यों से भरी अनगिनत संदूकें

उठे हाथों के लिए

बनेंगी खूब हथकड़ियाँ

उठे क़दमों में बांधी जायेंगी

जंजीरों से लदी सब बेड़ियाँ

चलेंगी गोलियाँ

दबायी जायेंगी

ज़मीनों से उठी सब बोलियाँ


फिर कैसे बने लोहे से हल की फाल

बैलगाड़ी के चके की हाल

बीच में तलवार जैसी धार

कैसे पायें लोहे की नदी से पार?


इससे पहले कि 

यह लोहे का नाग डस ले

उसको गलाकर फिर रचें हम

गेंती, फावड़े, खुरपी

हँसिए-हथौड़े और तसले