प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-मौत ने धर दबोचा एक चीते की तरह

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-मौत ने धर दबोचा एक चीते की तरह


दुष्यंत कुमार का एक शेर है-
मौत ने तो धर दबोचा, एक चीते की तरह
जि़ंदगी ने जब छुआ, तो फ़ासला रखकर छुआ ।


ये कोरोना संक्रमण का समय है। यह अवसाद का समय है। यह खुद को बचाये रखने का, समझाए रखने का और ढाढस बंधाये रखने का समय है। यह आर्थिक संकट और मानसिक संत्रास का समय है। यह सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के महिमा मंडन, राजनीतिकरण का समय है। ये एक आत्महत्या को सती प्रथा की तरह महिमामंडित करने का समय है। यह मनुष्य की जिजीविषा को डिगाने का समय है। यह चुप रहने का, मीडिया में वाहियात बहसों को सुनने का समय है। यह लोकसभा में प्रश्नकाल टाले जाने का समय है। यह सत्ता प्रतिष्ठानों के विरूद्घ ना बोले जाने का समय है। ये आत्महत्याओं के लिए विवश होने का समय है। यह तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद मनुष्यता को बचाये रखने का भी समय है।
हमारे समाज में प्रचलित मिथक के अनुसार, 84 लाख योनियों के बाद मनुष्य का जन्म मिलता है। मनुष्य बाकी प्राणियों से इसलिए अलग है क्योंकि वह एक सामाजिक प्राणी है। अपनी सामाजिकता के चलते मनुष्य उत्सवधर्मी और यायावर है। मनुष्य के भीतर की जिजीविषा उसे विपरीत से विपरीत परिस्थिति में भी जीवित रखती है।

कवि शैलेन्द्र की रचना हमें मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में भी जीने के लिए प्रेरित करती है।
तू जि़न्दा है तो जि़न्दगी की जीत में यकीन कर,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर !
ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन,
ये दिन भी जाएंगे गुजऱ, गुजऱ गए हज़ार दिन।


हमारे यहां आत्महत्या को ना तो कानूनी मान्यता है, ना ही इसे समाज स्वीकारता है। इसके बावजूद अवसाद के किसी नाजुक क्षण में बहुत सारे लोग आत्महत्या की सोचते हैं या आत्महत्या कर लेते हैं। किसानों की आत्महत्या, दहेज न दे सकने वाले परिवार की बेटियों की आत्महत्या, गरीब आदमी की जीवन से निराश में की गई आत्महत्या दरअसल आत्महत्या नहीं हत्या है। ऐसी सारी आत्महत्याओं को देखने का हमारा नजरिया अलग होना चाहिए। इस तरह की आत्महत्याओं को हत्या की श्रेणी में मानकर उन लोगों की, उस व्यवस्था की पड़ताल करनी चाहिए जो इस हत्यारी स्थितियों के लिए जिम्मेदार हैं।

कोरोना संक्रमण के इस समय में आत्महत्या बढ़ी है। लोग अनिश्चितता से परेशान होकर आत्महत्या कर रहे हैं। अभी तक कोरोना के कारण देश में 3000 से ज्यादा आत्महत्याएं हो चुकी है। पिछले छह माह से अधिक का समय हो गया लोगों को अपने घर की चारदीवारी के भीतर सिमटे हुए। ऐसे बहुत सारे लोग जो कोरोना वायरस के कहर के चलते महीनों तक घरों में बंद रहने के बाद बाहर निकल रहे हैं, उन्हें बहुत कुछ बदला-बदला नजर आ रहा है। घर और दुनिया के बीच तालमेल के इस असहज से माहौल में लोग डिप्रेशन में आकर आत्महत्या तक के बारे में सोच रहे हैं। खराब सेहत, बेरोजगारी, आर्थिक संकट तथा रोजाना की चिंताओं, सामाजिक जीवनचर्या से कटे होने के कारण लोगों की मानसिक समस्याओं को बढ़ा दिया है। ऐसे में बहुत से लोगों में चिड़चिड़ापन आ गया है। यह चिड़चिड़ापन सब ओर देखा और महसूस किया जा सकता है।

मनोचिकित्सकों का मानना है कि लंबी अनिश्चितता के दौर ने लोगों को अधिक चिड़चिड़ा बना दिया है। जो लोग हल्की-फुल्की चिंता की समस्या से जूझ रहे थे, उनकी परेशानी थोड़ी गंभीर हो गई है। इस तरह की परेशानी बढऩे से खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार भी पनपने लगते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, हर 40 सेकेंड में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है। हर साल लगभग 8 लाख से ज्यादा लोग आत्महत्या कर लेते हैं। जबकि इससे भी अधिक संख्या में लोग आत्महत्या की कोशिश करते हैं।

मनोचिकित्सकों का कहना है कि लॉकडाउन के बाद से हर 10 में से 7 मरीज़ों ने कहा है कि उन्होंने लॉकडाउन में आत्महत्या करने के विचारों को महसूस किया है। प्री-लॉकडाउन समय के बाद से ऐसे केसेस में बहुत ही साफ़ और तेजी से वृद्धि देखी गयी है। पहले हर 10 में से 5 से 7 मरीज इस तरह के विचारों को महसूस करते थे। मार्च से यह लगभग 70 प्रतिशत बढ़ा है। अवसाद के कई कारण है जैसे कि कई काम करने वाले प्रोफेशनल्स ज्यादातर अनियमित काम करने के घंटों, काम का स्ट्रेस, पर्सनल स्पेस की कमी की शिकायत करने लगे हैं। क्योकि इस समय वे अपने पार्टनर के साथ रह रहे होते हैं और वे इस समय घर से काम कर रहे होते हैं। उनमें से ज्यादातर अपने माता-पिता और परिवारों, दोस्तों से दूर शहर में रह रहे हैं। परिवार के साथ न रहने से लोगों के बीच स्ट्रेस और एंग्जाइटी का लेवल बढ़ रहा है।

2018 में किए गए 134516 आत्महत्याओं में से 66 प्रतिशत लोग ऐसे थे, जिनकी वार्षिक आय 1 लाख रुपये या उससे कम थी। शैक्षिक स्थिति और व्यवसाय के टूटने से पता चलता है कि माध्यमिक स्तर तक शिक्षित और दिहाड़ी मजदूरों के पास अपनी संबंधित श्रेणियों में आत्महत्या करने के लिए सबसे बड़ा शेयर था।

ऐसे समय में जब भारत में बेरोजगारी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीबी) के आंकड़ों से पता चला है कि 2019 में बेरोजगारी के कारण कम से कम 2,851 लोगों ने खुद को मार लिया। आंकड़ों के अनुसार, 2019 में भारत में कुल 1,39,123 आत्महत्याएं दर्ज की गईं। 2018 की तुलना में 3.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जिसमें 1,34,516 आत्महत्याएं देखी गईं।

2018 में, 2,741 व्यक्तियों ने बेरोजगारी के कारण खुद को मार डाला, जो कुल आत्महत्याओं का 2 प्रतिशत था। आत्महत्याओं की संख्या में महाराष्ट्र सबसे ऊपर है, जबकि बेरोजगारी के कारण आत्महत्या के मामले में कर्नाटक दूसरों से आगे था। यह दूसरी बार है जब कर्नाटक ने बेरोजगारी के कारण देश में सबसे अधिक आत्महत्याएं दर्ज की है।

लॉकडाउन अवधि में ज्यादा समय से घर पर रहे लोग और बीमारी के खौफ के चलते बार-बार हाथ धोना, जूते, चप्पल, कपड़े बिस्तर, किचन, घर की साफ-सफाई को दिन भर करते रहने ओसीडी के दायरे में आता है। ऐसे करने वाले लोगों के दिमाग में यह घर कर जाता है कि उनका कोई काम अधूरा (छूट) गया है। जिसे करने के लिए वह बार-बार आतुर रहते हैं। जिसे मना करने या फिर समय से न कर पाने पर चिड़चिड़ापन आने लगता है।
'हाथ धो लो, नहीं तो कोरोना हो जाएगा, घर से बाहर आने पर नहाने की जिद, रूक-रूक कर साफ-सफाई करना कामकाजी महिलाओं, बच्चों के साथ वृद्धजनों की आदत में शुमार हो रहा है। ऐसा न करने तथा इसे रोकने पर उनके स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ रहा है। इस तरह के 10 फीसदी मरीज मनोरोग चिकित्सक के यहां पहुंच रहे है। इस तरह की बीमारी को ओसीडी (ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर) कहते हैं। ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी) का शिकार होकर 10 फीसदी तक मरीज पहुंच रहे है। इस तरह के मरीजों के कारण घरों में लड़ाई-झगड़े भी हो रहे हैं। ओपीडी में पहुंचने वाले ऐसे मरीजों में लगातार सफाई करने की लत के साथ चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है। इसके कारण घर में वाद-विवाद भी हो रहा है। इतना हीं नहीं ऐसे मरीज साफ-सफाई के कारण लोगों से दूरियां बनाकर चलते हं।

ग्लैमर और फैशन की दुनिया में अचानक से आये अवरोध के चलते भी बहुत से ऐसे लोग जो इस इंडस्ट्रीज से जुड़े थे। जिन्होंने ये पहली बार नहीं हुआ इसके पहले डिप्रेशन के चलते आत्महत्या की। गुरुदत्त के ज़माने से लेकर है विजयलक्ष्मी, मोनाल नवल, संतोष जोगी, जिया खान, साईं प्रशांत, कुशाल पंजाबी, प्रीक्षा मेहता आदि अवसाद के शिकार हुए हैं।

इसके अलावा हम अपने आसपास की बात करें तो छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में सोमवार देर रात कारोबारी अनिल गुप्ता ने अपार्टमेंट की चौथी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। कारोबारी को पिछले कई दिनों से सर्दी-खांसी और बुखार था और इलाज नहीं मिल पा रहा था। ऐसे ही राजनांदगांव, दुर्ग में भी हुआ।

समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद रामगोपाल यादव ने राज्यसभा में कोरोना के कारण बढ़ती बेरोजगारी और मानसिक अवसाद का मुद्दा सदन में उठाया। रामगोपाल यादव का कहना है कि कोरोना के कई फैक्ट्रियां बंद हो गई हैं। इससे यहां काम करने वाले लोग और फैक्ट्री के मालिक दोनों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई है। कोरोना के कारण बेरोजगारी की समस्या भी बढ़ी है, जिससे लोगों के मन में मानसिक तनाव और अवसाद बढ़ा है। इस वजह से आत्महत्या के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। नोएडा का उदाहरण देते हुए सपा सांसद ने कहा कि पिछले चार-पांच महीने में नोएडा में कोरोना 44 लोगों की मौत हुई है, लेकिन आत्महत्या के कारण 165 लोगों की जान गई है।

हमारे प्रधानमंत्रीजी ने कोरोना संक्रमण के प्रारंभिक समय में नारा दिया था कि जान है तो जहान है। लोगों ने अपनी जान की चिंता की जहान को भूलने लगे। पर जब ये संक्रमण लंबा खिंचा तो लोगों ने जहान के बारे में सोचना शुरू किया जहां बहुत ही अनिश्चितता और निराशा भरा वातावरण है। ऐसे में भीतर से टूटे हुए लोगों को मौत मेहबूबा नजर आने लगी। हमारी प्रकृति हमें बताती है कि हर रात के बाद सुबह आती है। हमें सुबह की प्रतिक्षा करनी चाहिए बजाय मौत के अंधियारे को गले लगाने के।
जो दिल को तसल्ली दे, वो साज़ उठा लाओ
दम घुटने से पहले ही, आवाज़ उठा लाओ।