कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः गूँजती है कोई ऊब

 कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः गूँजती है कोई ऊब


नहीं आया तैरना

नाव खेना भी नहीं

अकेला रह गया पानी


उड़ना भूल गया

झर गये हैं पंख

अकेली रह गयी हवा


ठिठक जाता है स्पर्श

अँगुलियों की पोरों पर

अकेली उदास है पृथ्वी


कुछ कह नहीं पाता

अकेला रह जाता आकाश


टूटकर गिर जाती आवाज़

अकेली गूँजती रहती ऊब


ठहरी है घटते नयनों में

अकेली दूर तक प्रतीक्षा


कहाँ जा रहा हूँ

चल भी रहा हूँ कि नहीं

अकेले रह गये हैं पाँव