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तीसरी लहर से बचने का तरीका - संदीप पुंडरीक

तीसरी लहर से बचने का तरीका  - संदीप पुंडरीक


क्या कोरोना महामारी की तीसरी लहर करीब है? क्या यह दूसरी लहर की तुलना में अधिक जानलेवा साबित होगी? क्या इससे बचा जा सकता है? हालांकि, तीसरी लहर के समय का निर्धारण और विस्तार का सटीक आकलन मुश्किल जान पड़ता है, मगर पहली दो लहरों के अनुभवों से इसके असर का अनुमान लगाया जा सकता है। ये अनुभव तीसरी लहर से निपटने के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं को तैयार करने की नींव बन सकते हैं।

साल 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए द कॉलिशन फोर डिजास्टर रीजिल्यंट इन्फ्रास्ट्रक्चर (सीडीआरआई) ने हाल में इस बाबत एक कार्यपत्र जारी किया है। इसमें जो अनुमान लगाया गया है, वह दूसरी लहर के विस्तार और समय-निर्धारण के वैज्ञानिक मूल्यांकन, भारत व दूसरे देशों के अनुभव और महामारी विज्ञानियों की सलाह पर आधारित है। इसमें उन कदमों की सिफारिश भी की गई है, जो अगली लहर के आने पर मरीजों को पर्याप्त बिस्तर और ऑक्सीजन सुनिश्चित करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा उठाए जाने चाहिए।

इस कार्यपत्र में तीन हालात दिए गए हैं- मौजूदा दशा (जिसमें राज्यों में टीकाकरण समान गति से जारी रहेगा और तीसरी लहर छह महीने के बाद आएगी), आशावादी नजरिया (जिसमें टीकाकरण की गति बढे़गी और तीसरी लहर सात महीने के बाद आएगी) और चुनौती (जिसमें टीकाकरण की गति कम हो जाएगी और तीसरी लहर बहुत पहले शुरू हो जाएगी)। हालांकि, वायरस के म्यूटेट, यानी रूप बदलने की सूरत में, जब वायरस पूर्व में हुए संक्रमण और टीकों से लोगों में बनी एंटीबॉडी को भी भेद सकता है, ये अनुमान गलत भी साबित हो सकते हैं।

तीसरी लहर में संक्रमितों की संख्या दो अन्य मापदंडों पर भी निर्भर कर सकती है- पूर्व में संक्रमित हो चुके लोग, और जिन लोगों को अगले कुछ महीनों में टीका लग सकता है। चूंकि इन दोनों श्रेणी के लोगों में संक्रमण का खतरा काफी कम होगा, इसलिए जिन लोगों को टीका नहीं लगा होगा और जो पूर्व में संक्रमित नहीं हुए होंगे, वे तीसरी लहर में सबसे अधिक असुरक्षित होंगे।

इतना ही नहीं, माना यह भी गया है कि हर राज्य में बीमारी के शीर्ष पर जाने का समय अलग-अलग होगा, इसलिए ऑक्सीजन की मांग प्रतिदिन 6,200 मीट्रिक टन से लेकर 8,500 मीट्रिक टन के बीच हो सकती है। हालांकि, सभी राज्यों में एक साथ बीमारी के अपने चरम पर जाने की आशंका नहीं है, फिर भी यदि ऐसा हुआ, तो हमें रोजाना 13,800 मीट्रिक टन से लेकर 20,600 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की जरूरत हो सकती है। इसलिए, हमें अधिकतम संभाव्य जरूरत के हिसाब से ऑक्सीजन की अपनी तैयारी करनी चाहिए। एक और महत्वपूर्ण अनुमान यह है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश में ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है, जिनमें संक्रमण का खतरा अधिक है, इसलिए इन सातों राज्यों में दो-तिहाई ऑक्सीजन की जरूरत पड़ सकती है।

अगर मौजूदा दशा वाले हालात बने रहते हैं, तो उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल को देश भर की कुल आवश्यकता 16,387 मीट्रिक टन में से सबसे ज्यादा क्रमश: 3,076 मीट्रिक टन, 1,818 मीट्रिक टन और 1,344 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की दरकार हो सकती है। इसीलिए पूरे देश में प्रेशर स्विंग ऐड्सॉप्र्शन ऑक्सीजन संयंत्र स्थापित करने की योजना पर काम किया जाना चाहिए, न कि तमाम राज्यों में समान रूप से ऑक्सीजन के बंटवारे पर। इसके अलावा, जिन राज्यों के पास औद्योगिक ऑक्सीजन उत्पादन की सुविधाएं नहीं हैं, उन्हें अपनी ऑक्सीजन क्षमता बढ़ानी चाहिए। पेपर यह भी सुझाव देता है कि औद्योगिक ऑक्सीजन उत्पादन करने वाले राज्यों के लिए 60 फीसदी ऑक्सीजन आरक्षित किया जाना चाहिए, शेष 40 फीसदी ऑक्सीजन उन राज्यों को भेजना चाहिए, जहां इसकी कमी है। अगर ऐसा नहीं किया जाता है, तो विशेषकर उत्तर और पूर्वोत्तर राज्यों में क्षमता-विस्तार चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

सभी राज्यों में, खासतौर से जहां कमी का अंदेशा अधिक है, ऑक्सीजन उत्पादन क्षमता, गहन देखभाल इकाइयों (आईसीयू) और ऑक्सीजन बेड बढ़ाने के लिए मौजूदा समय का इस्तेमाल करना चाहिए। औद्योगिक ऑक्सीजन पर पूरी तरह से निर्भरता अच्छी नहीं। राज्यों को यह कोशिश करनी चाहिए कि हालात खराब होने पर भी वे आत्मनिर्भर बने रह सकें। बेशक, महामारी विज्ञान के मॉडल दूसरी लहर की भविष्यवाणी नहीं कर सके थे, पर दो से तीन हफ्ते पहले उसने ‘पीक’ के बारे में सटीक रूप में बता दिया था। यह संकेत है कि अगर किसी राज्य में मामले बढ़ते हैं, तो उसके पास ‘पीक’ की तैयारी करने के लिए दो से तीन सप्ताह का समय होगा।

ऑक्सीजन के अतिरिक्त स्रोत बनाने के अलावा इसकी आपूर्ति शृंखला पर भी जोर देना जरूरी है। ऑक्सीजन टैंकर, भंडारण, सिलेंडर आदि की व्यवस्था होनी चाहिए। यहां ‘हब ऐंड स्पोक’ मॉडल कारगर हो सकता है, जिसमें क्षेत्रीय केंद्रों में उचित भंडारण सुविधा के साथ-साथ ऑक्सीजन को एक से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए अच्छी वितरण-व्यवस्था हो।

ऑक्सीजन वार्ड और आईसीयू के लिए प्रशिक्षित कर्मियों की कमी तीसरी लहर से निपटने में बाधक बन सकती है।

इसके अलावा भी स्वास्थ्यकर्मियों को कई अन्य सहायता की दरकार होती है। लिहाजा, मेडिकल और पैरा-मेडिकल छात्रों, आपदा मित्रों, एनसीसी कैडेट व विज्ञान या जीव विज्ञान की पृष्ठभूमि वाले होमगार्ड के जवानों को स्वास्थ्यकर्मियों की मदद के लिए तैयार किया जाना चाहिए। राज्य सरकारें स्टेडियम, सामुदायिक हॉल, अद्र्ध-निर्मित इमारतों और पार्किंग स्थलों में अस्थाई अस्पताल भी बना सकती हैं। और अंत में, मरीजों को डॉक्टरी सलाह आदि देने के लिए ऑनलाइन व्यवस्था की जानी चाहिए। यह सही है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने कई अभिनव डिजिटल कदम उठाए हैं, लेकिन एक साझा ऑनलाइन मंच से न सिर्फ मरीजों को सलाह दी जा सकती है, बल्कि उन्हें टीकाकरण के बारे में अपडेट किया जा सकता है, और अस्तपालों में बेड की उपलब्धता आदि के बारे में बताया जा सकता है। यह ऑनलाइन व्यवस्था ऑक्सीजन की उपलब्धता और आवश्यकता, ऑक्सीजन टैंकरों की आवाजाही, कार्यबल की उपलब्धता, और दवाई की निगरानी करके नीति-निर्माता को बेहतर कदम उठाने में मदद कर सकती है। सभी मौजूदा प्रणालियों और डाटाबेस को एक जगह समन्वित किया ही जाना चाहिए। जाहिर है, अपने यहां तीसरी लहर आए या न आए, लेकिन यह एक मौका है कि हम अपने स्वास्थ्य ढांचे को बेहतर बना सकते हैं, ताकि ऐसी अभूतपूर्व स्वास्थ्य चुनौतियों का बखूबी सामना कर सकें।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)