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कुम्भ स्नानः यह जल किसका दान है...

कुम्भ स्नानः यह जल किसका दान है...

ध्रुव शुक्ल


लाखों लोग कुम्भ मेले में ऐसे आ रहे हैं जैसे उन्हें किसी सुदूर यात्रा की तैयारी करना हो। पर जीवन तो मेले में आकर ठहरा हुआ-सा लग रहा है ... कोई किसी को कहीं नहीं ले जा रहा। जो जहाँ डुबकी मारता है वहीं खड़ा दिखायी देता है।

कुम्भ नहाते हुए लगता है कि यह विश्व एक बहुत बड़ा भण्डारा है जो नदियों के किनारे सबको पाल-पोस रहा है। पता नहीं हमारे जीवन के लिए यह अन्न किसका दान है। गंगा में स्नान करने से अतृप्ति कहीं बह नहीं जाती, वह तो जल की शीतलता पाकर नयी भूख-प्यास की आग लगाती है। जिसे बुझाने के लिए जीवन में संयम का सेतु बाँधना पड़ता है।

यह जल किसका दान है जो सबकी प्यास बुझाने के लिए करीब से बह रहा है। यह सूरज किसका दान है जो गंगा के जल पर अपनी किरनें बिखेर रहा है। यह हवा किसका दान है जो गंगा की लहरों पर हमारी नौकाओं के पाल सँभाल रही है। यह आकाश किसका दान है जिसने गंगा के जल को अपने रँग में रँग लिया है। यह पृथ्वी किसका दान है जिस पर न जाने कबसे गंगा बह रही है।

हम दानी नहीं, हम तो कुछ देर गंगा के किनारे ठहरे हुए यात्री भर हैं। हम इस जल को अपनी अस्थियों के अलावा और कुछ भी दान करने में समर्थ नहीं।

पूरे कुम्भ मेले में यही सुनायी देता है - भगवान तुम्हारा भला करे। कोई बाबा लोगों की भलाई का जिम्मा अपने ऊपर नहीं लेता। जब भगवान के अलावा कोई किसी का भला कर ही नहीं सकता तो दुनिया में भलाई करने का इतना कारोबार क्यों चल रहा है? धर्मध्वजाधारी, नेता और समाज सेवक चढ़ावा, चन्दा इकट्ठा करके आखिर किसकी भलाई कर रहे हैं?

प्रतीत होता है कि भगवान ने सबका भला करने के लिए अपने आपको सूर्य, पृथ्वी, आकाश, वायु और जल में स्थापित किया है। ये पाँचों सबमें समाकर सबकी मदद कर रहे हैं।भगवान की मदद पाने के लिए सबमें भगवान की स्थापना करना चाहिए तभी वह सबमें सबके लिए प्रकट हो सकेगा। गंगा से उठायी हरेक अञ्जुरी के जल में वही तो झिलमिला रहा है।