प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ये मायने तो नहीं

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ये मायने तो नहीं


हमारा संविधान हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। इसी अधिकार में मीडिया को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिलती है। मीडिया के लिए अलग से और कोई प्रावधान नहीं है। यह स्वतंत्रता भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत निहित है। हमारा अनुच्छेद-19 (1) (ए) कहता है कि सभी नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार होगा। अनुच्छेद-19 (2) के तहत कुछ प्रतिबंध भी लगाए गये हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सुदर्शन टीवी द्वारा प्रशासनिक जेहाद के नाम से बनाये जा रहे कार्यक्रम के प्रोमो देखकर उसके प्रसारण पर रोक लगाई है। सुदर्शन टीवी द्वारा सरकारी सेवा में मुस्लिम समुदाय के सदस्यों की घुसपैठ की साजिश का पर्दाफाश करने की बात कही थी।

पिछले कुछ समय से मीडिया में जानबूझकर यह खबर प्रसारित की जा रही है कि भारतीय प्रशासनिक, पुलिस और अन्य सेवा में मुस्लिम समुदाय के जिन लोगों का चयन हो रहा है, वे बाद में एक तरह का प्रशासनिक जेहाद पैदा करेंगे। दरअसल, यह खबर जानबूझकर फैलाई जा रही है। हमारे देश में फूट डालो राज करो का जो फार्मूला अंग्रेज द्वारा फैलाया गया था, कुछ लोग उसे जीवित रखकर अपनी रोटी सेंकना चाहते हैं। यह देखा गया है कि जब-जब शासक वर्ग जनता की आम जरूरतों को हल करने में असफल होता है, और आर्थिक विकास की नैय्या डांवाडोल होती है, तब तक शासक वर्ग अपनी असफलताओं को छिपाने के लिये इस तरह के उपक्रम करता है। बहुत बार राष्ट्रवाद को एक विचारधारा की तरह इस्तेमाल किया जाता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने नेशनलिज्म शीर्षक से आजादी के समय जो लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने इस कथित राष्ट्रवाद को लेकर गांधीजी तक की आलोचना की है, उसमें उन्होंने आगाह किया था कि यह राष्ट्रवाद आगे चलकर फ़ासिज़्म को जन्म देगा।

सुदर्शन टीवी के यूपीएससी जिहाद पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए इसके बचे हुए एपिसोड के प्रसारण पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस तरह के कार्यक्रमों से यूपीएसी की परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर लांछन लगा है। सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बैंच ने कहा है कि एक स्थिर लोकतांत्रिक समाज की इमारत और अधिकारों और कर्तव्यों का सशर्त पालन समुदायों के सह अस्तित्व पर आधारित है। कोई टीवी चैनल को इस बात की इजाजत नहीं दी जा सकती है कि वह यह कहे कि मुस्लिम नागरिक शासकीय सेवाओं में घुसपैठ कर रहे हैं।

दरअसल, हमारे देश की मीडिया के बुनियादी स्वरुप और संरचना में 1990 के बाद जो बदलाव आया है, उसमें मीडिया में पूंजी की प्रधानता हो गई है। मीडिया इस समय अपने कथित हितों के लिए वह सब करने पर आमदा है जिससे उसे लगता है कि उसकी टीआरपी बढ़ेगी, शासक वर्ग, बहुसंख्यक समाज खुश होगा। हम सब जानते हैं कि दंगे का कारण धर्म नहीं होता। दंगा भड़काने के लिए धार्मिक भावनाओं का उपयोग किया जाता है। दंगे आकस्मिक भी नहीं होते, वे तैयारी के साथ कराए जाते हंै। कोरोना संक्रमण के प्रारंभ में हमारे इसी गोदी मीडिया ने तब्लीगी जमात को आधार बनाकर हिन्दू-मुस्लिम दंगा करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यदि उस समय देश की तालाबंदी नहीं होती तो पता नहीं कहां-कहां दंगे होते। पूरे तब्लीगी समाज को जो कि कोरोना से वैसे ही जूझ रहा था जैसे आज पूरा देश जूझ रहा है, उसे मानव बम बताने की कोशिश हुई। मीडिया में जिस तरह आज सुशांत, रिया, कंगना रनौत मामला छाया हुआ है, उसी तरह तब्लीगी समाज को खलनायक बनाकर मुस्लमानों को अपमानित करने, बहिष्कृत करने की नाकाम कोशिशें हुई। यह तो हमारी सदियों की साझा संस्कृति और जनमानस है, जो इस तरह की चालों को खूब समझता है। कबीर के समय से 'हिन्दू तुरकन भई लराईÓ की बात जानते हुए आमजन मिल-जुलकर रहते हैं। जब धर्म के सम्प्रदाय बन जाते हैं तो निहित स्वार्थ वाले इसका उपयोग अपने हितों के लिए करते हैं। हमारा गोदी मीडिया लगातार देश को हानि पहुंचाने वाली खबरें प्रसारित करता है। जब कोर्ट ने तब्लीगी जमात के पक्ष में बात कही तो ये खबर मीडिया में नहीं दिखी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) को जमीयत उलमा-ए-हिंद और अन्य अल्पसंख्यक संगठनों द्वारा दायर याचिका पर जवाब देने के लिए कहा, ताकि तबलीगी जमात घटना को मीडिया को सांप्रदायिकता से रोकने के लिए केंद्र को निर्देश देने की मांग की जाए। जो कोविड-19 के प्रसार से जुड़ा हुआ है। मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे के नेतृत्व वाली खंडपीठ ने पीसीआई और केंद्र से पूछा कि केबल टेलीविजन नेटवर्क अधिनियम, 1995 की धारा 19 और 20 के तहत मीडिया चैनलों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जा सकती है?

सुदर्शन टीवी के इस ताजा मामले में उनके अधिवक्ता यह तर्क देने से बाज नहीं आते हैं कि चैनल इसे राष्ट्रहित में एक खोजी खबर मानता है। पूरा देश जानता है कि यूपीएसी की परीक्षा का पैटर्न क्या है, उसमें चयन की प्रक्रिया क्या है? यहां किसी की जाति, धर्म देखकर चयन नहीं होता। इस परीक्षा के माध्यम से आज तक जितने ब्यूरोकेट, पुलिस अफसर चयनित हुए हैं उनकी राष्ट्रभक्ति पर कभी भी किसी को कोई संदेह नहीं हुआ। यह कोई खोजी पत्रकारिता तो नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुदर्शन टीवी का इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य मुस्लिम समुदाय को कलंकित करने का है। हम केवल टीवी एक्ट के तहत गठित प्रोग्राम कोड के पालन को सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हैं। हमारी राय है कि हम पांच प्रतिष्ठित नागरिकों की एक समिति नियुक्त करें जो इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए कुछ मानकों तय कर सकती है। हम कोई राजनीतिक विभाजनकारी प्रकृति नहीं चाहते हैं और हमें ऐसे सदस्यों की आवश्यकता है जो प्रशंसनीय कद के हों।

मीडिया आज खुद न्यायालय, जज और जांच एजेंसी हो गई है। जिन मुद्दों, जिन बातों को उठाना चाहिए वे हमारे मीडिया से नदारद हैं। जो लोग सही मुद्दे, बातें उठाना चाहते हैं, या उठाते हैं इनकी आवाज दबा दी जाती है। वही मीडिया संस्थाएं सुरक्षित हैं, मजे में हंै, जो सत्ता के साथ हां जी, हां जी बोल रही है। वैसे देखा जाए तो वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में जिसमें 180 देश शामिल है, हमारा स्थान 142 है। हम भूटान, नेपाल और श्रीलंका जैसी इतनी स्वतंत्रता भी अपने यहां की मीडिया को नहीं देते। हमारे नेता मीडिया में उनके खिलाफ छपी खबरो पर असहिष्णुता दिखाते हैं। हमारे जानने की आजादी, सूचना प्राप्त करने की आजादी पर लगातार कुठाराघात हो रहा है। तरह-तरह से मीडिया को, उसकी अभिव्यक्ति की आजादी को रोकने के प्रयास हो रहे हैं। इसके ठीक उलट बहुत सारी मीडिया जिसमें सोशल मीडिया के बहुत सारे प्लेटफार्म शामिल है, वहां पर अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर ऐसा कुछ कहा जा रहा है जो आजादी नहीं होकर अराजकता, उन्माद की श्रेणी में आता है। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष एम.काटजू ने कहा है कि टेलीविजन और रेडियो को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया या एक समान नियामक संस्था के दायरे में लाने की आवश्यकता है। अपने आपको चौथा स्तंभ, जनता की आवाज बताने वाले मीडिया को इस समय आत्मचिंतन की जरूरत है। यदि मीडिया से जुड़े लोग अपने अघोषित आकाओं की जुबान बोलते रहे, उनके एजेंडे पर काम करते रहे तो जनता ऐसी मीडिया को खारिज कर देगी। यह पत्रकारिता नहीं प्रोपेगेंडा है।