breaking news New

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -नेशनल इमरजेंसी जैसे हालात के लिए जिम्मेदार कौन?

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -नेशनल इमरजेंसी जैसे हालात के लिए जिम्मेदार कौन?

-सुभाष मिश्र

कोरोना की बिगड़ती स्थिति और इससे उपजे जन आक्रोश और जन आपदा के चलते आज देश में नेशनल इमरजेंसी जैसे हालात निर्मित हो गये हैं। देश की सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं इसका संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार से चार बिन्दुओ पर जवाब मांगा है। आक्सीजन, टीकाकरण और दवाई की सप्लाई से लेकर लाकडाउन को लेकर सरकार क्या सोच रही है। सरकार के पास इस राष्ट्रीय आपदा से निपटने का क्या प्लान है। दिल्ली में बैठे बहुत से हुकुमरानों, अमीरजादो को पहली बार मालूम हुआ की उन्हें आक्सीजन कहीं और से मिलती है। वे दूसरे राज्यों की आक्सीजन पर सांस ले रहे हैं। जिस गृह मंत्रालय और उनके माननीय मंत्री जी को बैठकर आपदा प्रबंधन पर कानून बनाकर व्यवस्थाएं दुरुस्त करनी चाहिए थी, वे चुनाव रैली में लगे हुए हैं। प्रधानमंत्री का चुनाव क्षेत्र बनारस से लेकर देश की राजधानी के हाल बेहाल है। सब जगह कोरोना प्रकोप चरम पर है और सरकारें आक्सीजन तलाश रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह कदम तब उठाया है जब बहुत से राज्यों की हाईकोर्ट ने स्वयं संज्ञान लेकर या जनहित याचिकाओं के जरिए राज्य और केंद्र सरकार से जवाब तलब किया। अलग-अलग न्यायालयों में जारी आदेश, निर्देश के कारण कहीं अराजकता और भ्रम की स्थिति निर्मित न हो जाए, इस कारण से तो कहीं सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान तो नहीं लिया है? अभी चार दिन पहले ही इलाहबाद हाईकोर्ट ने जब उत्तर प्रदेश सरकार को पांच बड़े शहरों में लाकडाउन का आदेश दिया तो इसे उत्तरप्रदेश सरकार ने मानने से इंकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और सुप्रीम कोर्ट ने फि़लहाल इस पर रोक लगा दी।

देश में आज जब नेशनल इमरजेंसी जैसे हालात निर्मित हो गये हैं तब यह सवाल खड़ा हो रहा है की इसके लिए कौन क़सूरवार है। जब कोरोना महामारी हमारे देश में जनवरी 2020 में आ गई थी और हमें पता था की हमें इसके लिए वेंटिलेटर और आक्सीजन की जरूरत होगी, तो हम सवा साल तक हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे रहे? जब सारी दुनिया के बीच जब ये आशंका थी कि दूसरी लहर आएगी तो देश से 9,294 मीट्रिक टन आक्सीजन निर्यात क्यों किया। अब जब देश के अस्पतालों में आक्सीजन इमरजेंसी आन पड़ी है और लोग आक्सीजन की कमी से दम तोड़ रहे हैं तब 50,000 मीट्रिक टन ऑक्सीजन आयात करने की कोशिश के क्या मायने है। केन्द्र सरकार ने कहा था की मार्च 2020 में देश भर के सरकारी अस्पतालों में 162 आक्सीजन प्लांट लगाए जा रहे हैं, जो सीधे वेंटिलेटर तक आक्सीजन सप्लाई करेंगे। वो प्लांट कहाँ लगे हैं सरकार बताये। कोरोना की पहली लहर में जिन कोरोना वारियर्स का फूल-माला, बाजे-गाजे के साथ स्वागत किया गया था, उन्हें मरने क्यों छोड़ दिया गया। यह महामारी उस लापरवाही का नतीजा तो नहीं जहां हमने कोरोना संक्रमण से ठीक होकर घर जाने वालों पर फूलों की वर्षा कर यह बताने की कोशिश की थी हम कोरोना से जीत गये, कोरोना हार गया।

देश में कोरोना संक्रमण की भयावहता को देखते हुए राष्ट्रीय आपदा जैसी स्थिति नि:संदेह निर्मित हो चुकी है। यह ठीक है कि यह वक्त आरोप-प्रत्यारोप का नहीं है, लेकिन इस स्थिति के लिए जवाबदारी तो तय करनी होगी। जनता की बेपरवाही, नासमझी या अनुशासनहीनता पर दोष थोपकर सत्ता स्वयं इससे बच नहीं सकती। जनवरी 2020 को कोरोना की दस्तक के बाद सवा साल के पूरे समय अगर लोगों ने वायरस को लेकर लापरवाही बरती तो देश के शीर्ष नेतृत्व ने भी गम्भीरता पूर्वक जि़म्मेदारी निभाने का प्रमाण नहीं दिया। दूसरी लहर की आशंका पहले भी थी, मगर उससे निपटने के लिए स्वास्थ्य प्रणाली को पर्याप्त सक्षम बनाने की कोई तैयारी नहीं कि गयी। यह आपराधिक लापरवाही है। लेकिन सत्ता का अहंकार इसे स्वीकार नहीं करेगा।

जि़म्मेदार लोकतांत्रिक सत्ता उपलब्धियों का श्रेय लेने के साथ अपनी नाकामियों के लिये पश्चात्ताप करने से संकोच नहीं करती। 1962 के चीनी आक्रमण के समय हमारी सेना ने वीरता के साथ हालात का मुकाबला किया। मगर पराजय की हताशा में राजनीतिक नेतृत्व ने अपनी भूलों को स्वीकार भी किया।

तब राजनीतिक विपक्ष और बुद्धिजीवियों के अलावा स्वयं भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन ने भी अपनी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने चीन पर आसानी से विश्वास करने और ज़मीनी राजनीतिक हकीकत की अनदेखी के लिए सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। संसद में हुई बहस में रक्षा मंत्री कृष्णमेनन और थल सेनाध्यक्ष जनरल कौल मुख्य रूप से निशाने पर थे। लेकिन प्रधानमंत्री पं. नेहरू जि़म्मेदारी से बच नहीं सकते थे। उन्होंने ख़ुद संसद में खेदपूर्वक कहा था, हम आधुनिक दुनिया की सच्चाई से दूर हो गए थे और एक बनावटी माहौल में रह रहे थे, जिसे हमने ही तैयार किया था। इस ईमानदार स्वीकारोक्ति से प्रधानमंत्री की गरिमा नष्ट नहीं हो गयी थी। लोकतंत्र में उन्होंने अपनी जवाबदेही कबूल की थी। तब देश की जनता ने दिल खोल कर राष्ट्रीय आपदा कोष में हाथ खोल कर योगदान दिया, यहाँ तक कि महिलाओं ने अपने गहने उतार कर दान किये थे। इस तरह विपत्ति में घिरे राष्ट्र की एकजुटता का जज़्बा पैदा हुआ था और सैनिकों की हौसला अफजाई हुई थी।

आज लगभग यही स्थिति है। देश कोरोना से लड़ रहा है, और 1962 के सिपाही आज स्वास्थ्य कर्मियों के रूप में अस्पतालों में पीडि़तों की रक्षा के लिए जूझ रहे हैं। 1962 में युद्ध सामग्री और उन्नत हथियारों की कमी थी। आज स्वास्थ्य-सुविधाओं की गम्भीर कमी है। विडम्बना यह है कि इसके प्रबंध में नाकामी की जि़म्मेदारी लेने के नैतिक साहस की भी कमी है। पीएम केयर्स के नाम पर कॉरपोरेट घरानों से चंदा इक_ा करने वाले राष्ट्रीय नेतृत्व में  उदारता होती तो बिना हिसाब के यह धनराशि पिछले सवा साल के समय में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार में खर्च हो चुकी होती। दूरदर्शिता बरती गई होती तो जनता इस बेकद्री से मौत के मुँह में न समाने लगती। संकट को नजर अंदाज करने की बजाए, जनता का ही आह्वान किया गया होता तो 1962 की उदारता की सहज ही वापसी हो गई होती। तब ये दिन नहीं देखने पड़ते।

कोरोना संक्रमण में एक दिन के सर्वाधिक आंकड़ों में आज हमने अमेरिका को पीछे छोड़ दिया। हमारे देश में एक दिन में 3 लाख 14 हजार से ज्यादा कोरोना संक्रमित पाये गये। कोरोना से मरने वालों को लेकर आमजनों में यह धारणा बनती जा रही है, कि मरने वालों की संख्या बहुत अधिक है, किन्तु इससे कम बताया जा रहा है। सरकारें लोगों के बीच पैनिक ना फैले और उनकी नाकामी न दिखाई दे, इसके लिए ऐसा कर रही है। लोगों का मानना है कि श्मशान कब्रिस्तान में जितनी लाशे जलाने, दफनाने आ रही है, मरने वालों की संख्या उससे कम बताई जा रही है।

दिल्ली सहित बहुत से राज्यों के अस्पतालों में आक्सीजन इमरजेंसी आ गई है। यदि इन राज्यों के अस्पतालों को समय पर आक्सीजन नहीं मिली तो बहुत से मरीज बेमौत मारे जायेंगे। उड़ीसा से दिल्ली आक्सीजन एयरलिफ़्ट की जा रही है। आक्सीजन का कोटा केंद्र सरकार राज्यों को आबंटित करती है। हमारे देश में आपदा प्रबंधन को लेकर किसी तरह के गंभीर प्रयास नहीं होने का नतीजा है कि हम आज अस्पतालों में बेड, आक्सीजन सिलेंडर, वेंटिलेटर, जीवन रक्षक दवाईयों के लिए तरस रहे हैं। यदि कहीं यह उपलब्ध है भी तो इनकी कालाबाजारी हो रही है।

राष्ट्रीय आपदा के समय भी केद्र राज्य और सत्तापक्ष, विपक्ष एक-दूसरे पर दोषा रोपण कर अपना पल्ला झाडऩा चाहता है। केंद्र की मोदी सरकार अपने अडियल रवैय्ये को छोड़कर विपक्ष सहित सभी को अपनाकर सबकी बात सुननी चाहिए। हमने देखा है कि तीन नए कृषि कानून संशोधन बिल को लेकर सरकार ने किस तरह का रवैय्या अपनाया। सरकार की इस दृष्टधर्मिता की वजह से किसान आज भी आंदोलनरत है। इस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं संज्ञान लेकर एक कमेटी बनाई थी जिसे आंदोलनरत किसानों ने खारिज कर दिया। किसानों का मसला और आंदोलन वहीं का वहीं है। कई बार सरकार और उससे सहमति रखने वाले लोग, संस्थाएं समझती है कि किसी आंदोलन को इतना लंबा चलाओ की वह खुद ही खत्म हो जाए। लोगों की याददाश्त और संघर्षशीलता के इस खेल में पारंगत नेता, उद्योगपति इस टेक्टीस का भी सहारा लेते हैं।

देश में 6 हाईकोर्ट उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश ,दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता और सिक्किम में इस समय कोरोना के मुद्दे को लेकर सुनवाई चल रही है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का स्वत: संज्ञान लेकर केंद्र सरकार से चार मुद्दो पर स्पष्टीकरण मांगा जिनमें आक्सीजन की सप्लाई, जरूरी दवाओं की सप्लाई, वैक्सीनेशन का तरीका, लाकडाउन लगाने का राज्यों का अधिकार शामिल है।
इसमें पहले मुंबई हाईकोर्ट ने कहा कि हम इस बुरे समाज का हिस्सा होने पर शर्मिदा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार से कहा कि गिड़ गिड़ाइए, उधार लीजिए या चुराइए लेकिन आक्सीजन लेकर आइये। दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को जमकर फटकार लगाते हुए इंडस्ट्रीज को आक्सीजन की सप्लाई फोरम बंद करने कहा।

इन सारी क़वायदों के बीच सच्चाई यह है की आज पूरे देश में एक अराजकता और दहशत का वातावरण निर्मित हो गया है जिसके लिए बहुत हद तक केन्द्र की सरकार, उसके ब्यूरोक्रेसी और राज्यों के वो लोग भी जि़म्मेदार हैं जो अपने राज्य में वे सब कुछ कर सकते थे, पर वह भी नहीं किया।