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कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः फिर कहीं धूप आ रही होगी

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः फिर कहीं धूप आ रही होगी

सुबह हो रही है, शाम आ रही है

लगता है जी रहे हैं, जान जा रही है

बोलते हैं ऐसे, कहने को बहुत कुछ है

हारी-थकी-सी बानी मन में समा रही है

मन हुआ है बेखुद पर दिल धड़क रहा है

यूँ जाते-जाते जैसे कुछ जान आ रही है

रुक रही हैं साँसें और देह तप रही है

राख की ढेरी से ज्यों आँच जा रही है

राख की ढेरी में ध्रुव बीनने को क्या है

उसकी राह देखो जाँ जिस पे आ रही है


आग जब रूप ढा रही होगी

फिर कहीं धूप आ रही होगी

बूँद-सी उठके किसी तिनके पर

ज़मी ख़ुद को उठा रही होगी

ये लहरें मछलियों-सी तड़पे हैं

ज़िन्दगी ऐसे आ रही होगी

वक़्त की ज़ुल्फ उड़ाती वो हवा

तेरे दामन पे छा रही होगी

आस्माँ शब्द में उतरता है

ध्रुव कोई बात आ रही होगी


फिर कहीं सुबह हो रही होगी

फिर कहीं रात घिर रही होगी

मौत के साथ ध्रुव कहाँ जाये

ज़िन्दगी फिर बुला रही होगी

पेटिंगः ऋतु साहू